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विरल आचार्य के भाषण के व्यापक निहितार्थ

देवाशिष बसु /  November 12, 2018

आरबीआई और वित्त मंत्रालय की खींचतान असली मुद्दा नहीं है। संस्थाओं के गठन एवं पोषण के साथ ही ज्ञानी एवं बुद्धिमान लोगों को इनका नेतृत्व भी करना होगा। बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और वित्त मंत्रालय के रिश्तों में अचानक आई तीव्र गिरावट 26 अक्टूबर को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के भाषण के बाद से ही पिछले तीन हफ्तों से आर्थिक जगत में चर्चा का मुद्दा बनी हुई है। आचार्य ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा था, 'केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान करने वाली सरकारों को देर-सबेर वित्तीय बाजारों के कोप का भाजन बनना पड़ता है, आर्थिक समस्या पैदा होती है और फिर सरकार के पास एक महत्त्वपूर्ण नियामकीय संस्थान को कमतर करने वाले दिन पर अफसोस जताने का ही मौका रह जाता है।'
 
सत्ता में बैठे नेता और उनके करीबी लोग खुद को सर्वशक्तिमान समझने लगते हैं लिहाजा आचार्य की टिप्पणी आने के फौरन बाद वित्त मंत्री और उनके आसपास के लोग आक्रोशित प्रतिक्रियाएं देने लगे। इस कोलाहल में यह भुला दिया गया कि आचार्य के भाषण की कहीं व्यापक जटिलता है और आरबीआई से इतर की संस्थाओं पर भी यह लागू होता है। हो सकता है कि नेताओं और बाबुओं ने पूरा भाषण न पढ़ा हो या उनमें उठाए गए बिंदु अत्यधिक गूढ़ या असुविधाजनक लगे हों। असल में, 6,020 शब्दों के अपने भाषण में आचार्य का उठाया पहला बिंदु ही यह था कि किस तरह का शासन समृद्धि लेकर आता है? उन्होंने डैरन एसमोगलु और जेम्स रॉबिनसन के कार्य (व्हाई नेशन फेल्स) को उद्धृत करते हुए कहा कि संस्थानों की गुणवत्ता ही देशों की आर्थिक सफलता या असफलता को अलग करती है।
 
आचार्य ने कहा, 'समावेशी आर्थिक एवं राजनीतिक संस्थान निर्णय-निर्माण में बहुलता लेकर आते हैं जिससे विधि का शासन सुनिश्चित करने और प्रतिभा एवं रचनात्मकता के पोषण में मदद मिलती है। इस तरह के संस्थानों की उपस्थिति में अर्थशास्त्र और राजनीति बदलाव की आशंका से बेअसर पदाधिकारियों के समूह की बंधक नहीं बनती है। इसके उलट होने पर ये संस्थान देश के आर्थिक एवं वित्तीय संसाधनों तक सत्ताधारी अभिजनों की ही पहुंच सीमित कर देते हैं, परिवर्तन एवं नवाचार की राह में रोड़े अटकाते हैं और आगे चलकर देश की क्षमता के क्षरण एवं निष्क्रियता का कारक बनते हैं।'
 
भारत में आप हर जगह इसी तरह की स्थिति देख सकते हैं। (मैं इसे उगाही करने वाला राज्य कहना पसंद करता हूं।) राजस्व विभाग, पुलिस, न्यायपालिका और सबसे बढ़कर कारोबार, बैंक, शिक्षा, परिवहन और ढांचागत क्षेत्र एïवं स्वास्थ्य देखभाल के बड़े हिस्से पर या तो राज्य या फिर उसके दोस्ताना पूंजीवादियों का व्यापक नियंत्रण देखने को मिलता है। दोस्ताना पूंजीवादियों को बैंकों और ऋण बाजार से कर्ज जुटाने में कोई समस्या नहीं होती है। न्यायिक प्रणाली तक भी संपन्न लोगों की पहुंच बहुत आसान होती है। यह एक उगाही करने वाला राज्य है जो लागत, शुल्क एवं करों में कटौती नहीं करेगा जबकि इनका सर्वाधिक असर गरीबों पर होता है। 
 
पिछले 70 वर्षों में उगाही करने वाली इस संरचना में बदलाव बहुत धीमी गति से आए हैं। हरेक परिवर्तन किसी संकट से निपटने या बहुस्तरीय एजेंसियों एवं निजी संस्थानों के दबाव में ही किए गए हैं। लेकिन अंतर्निहित ढांचे में कोई बदलाव नहीं आया है। भ्रष्टाचार के बड़ा रूप अख्तियार करने के साथ नेता, बाबू और पूंजीपति इस व्यवस्था में और ज्यादा घुलमिल चुके हैं। यहां तक कि मनमोहन सिंह जैसे विद्वान प्रधानमंत्री को भी हालात के चलते अपनी असहायता स्वीकार करनी पड़ी। मनमोहन ने यह माना था कि उनके सामने घटित केंद्रीकृत भ्रष्टाचार 'गठबंधन धर्म' का अपरिहार्य परिणाम था।
 
इस तरह की उगाही करने वाली शक्तियों के खिलाफ चहारदीवारी का काम वे संस्थान ही करते हैं जिन्हें विधि के शासन का पालन करने और अपने क्षेत्र के जानकार लोगों यानी टेक्नोक्रेट द्वारा संचालित होने का स्पष्ट आदेश मिला होता है। यह अंतर्निहित संघर्ष को समाप्त कर देता है। जहां नेता चुनावों को ध्यान में रखते हुए हमेशा जल्दबाजी करने, शॉर्टकट अपनाने और लोकलुभावन कदम उठाने में यकीन रखते हैं वहीं टेक्नोक्रेट व्यापक परिप्रेक्ष्य में दीर्घकालिक परिणामों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाते हैं। यह आरबीआई के ब्याज दरें कम रखने जैसे सतही मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय कहीं अधिक गंभीर एवं गहरा मुद्दा है।
 
इस पर टिप्पणी करना आचार्य के क्षेत्र का विषय नहीं है कि अन्य संस्थानों का नेतृत्व संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों के पास है या नहीं। एसमोगलु और रॉबिनसन यह कह चुके हैं कि किसी देश की समृद्धि के पीछे उसके मजबूत संस्थान ही होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत इस मामले में किस स्थिति में है? तमाम महत्त्वपूर्ण संस्थानों में पद खाली पड़े हुए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों से लेकर बीमा लोकपाल, सूचना आयुक्तों और प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण में भी शीर्ष पद रिक्त हैं। इसी तरह राष्ट्रीयकृत बैंकों में नियंत्रण एवं संतुलन स्थापित करने वाले कामगार एवं अधिकारी निदेशकों के भी पद रिक्त चल रहे हैं।
 
फिर बात सक्षमता और संस्थान को सशक्त करने वाले लोगों के चयन की आती है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच छिड़ी गंदी सार्वजनिक जंग बेहद खराब लक्षण को अभिव्यक्त करती है। वित्त मंत्रालय में तैनात सचिव स्तर के अधिकारियों को भी अपने कार्यक्षेत्र के बारे में बहुत कम ही पता होता है। इसी तरह वित्त, बीमा, स्वास्थ्य देखभाल जैसे विशेषीकृत संस्थानों का नेतृत्व संभाल रहे आईएएस संवर्ग के सामान्यज्ञ अधिकारियों को टेक्नोक्रेट की तुलना में बहुत कम जानकारी ही होती है। असलियत तो यह है कि हमारे नेता कोई संकट न आने तक अपने विषय के जानकारों की जरूरत ही नहीं महसूस करते हैं। मौजूदा सरकार के मंत्रिमंडल में एक ईमानदार डॉक्टर भी शामिल है लेकिन उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय का दायित्व नहीं मिला है। विदेश सेवा के अधिकारी के तौर पर समूचा करियर बिता देने वाले शख्स को शहरी विकास मंत्रालय का जिम्मा दिया गया है। शिक्षा मंत्रालय पहले उस व्यक्ति को सौंपा गया था जो स्नातक भी नहीं था और उसे शैक्षणिक मूल्यों एवं व्यवस्था की बहुत कम समझ ही थी लेकिन उसने तमाम बुद्धिजीवियों को हिलाकर रखा। असली मुद्दा आरबीआई बनाम वित्त मंत्रालय न होकर ऐसी संस्थाओं का गठन एवं संवद्र्धन है जिनका नेतृत्व जानकार एवं समझदार लोगों के पास होना सुनिश्चित किया जा सके। आचार्य की टिप्पणियां इस मामले में हमारी खामियों को एक बार फिर उजागर करती हैं। 
 
(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं)
Keyword: RBI, viral acharya, urjit patel, fund, bank,,
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