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जीवन से सबक

संपादकीय /  November 12, 2018

येल विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के आधार स्तंभों में से एक टी एन श्रीनिवासन का गत शनिवार को चेन्नई में निधन हो गया। यह खबर दुखद तो है ही, यह एक अवसर भी है कि हम उनके लंबे करियर पर एक नजर डालें और आज के भारत में आर्थिक नीति पर विचार-विमर्श की स्थिति पर भी गौर करें। वह 85 वर्ष के थे और पिछले छह दशक से अधिक समय से अपने विषय के अग्रणी अध्येता थे। उनका पहला बड़ा काम 'तकनीक के चयन' की समस्या पर था। सन 1961 में प्रकाशित इस काम में उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला था कि विकासशील देशों के लिए कौन से तकनीकी चयन श्रेष्ठï हैं। यह लगभग उसी समय की बात है जब अमत्र्य सेन भी इसी समस्या पर काम कर रहे थे। अपनी पीढ़ी के कई अन्य लोगों की तरह श्रीनिवासन ने भी कई भारतीय विश्वविद्यालयों, योजना आयोग और साथ-साथ पश्चिम के कई आर्थिक संस्थानों में काम किया। यह बात ऐसे समय में विचारणीय है जब विदेशों में शिक्षित अर्थशास्त्रियों पर हमले किए जा रहे हैं और कहा जा रहा है कि वे जो सलाह देते हैं वे भारत के लिए उपयुक्त नहीं हैं। बहरहाल अधिकांश लोग यह मानेंगे कि श्रीनिवासन की नीतिगत सलाह भारत के लिए प्रासंगिक भी थी और महत्त्वपूर्ण भी। 

 
जगदीश भगवती और पद्मा देसाई के साथ मिलकर उन्होंने सन 1970 के दशक के आरंभ से ही बाजार के अनुकूल वृहद आर्थिक सुधारों को अपनाने की हिमायत शुरू कर दी थी। उनकी यह बात करीब एक दशक तक दूर की कौड़ी बनी रही। आखिरकार देश की केंद्रीय योजना और लाइसेंस राज आधारित विकास की राह पर चलते हुए हम सन 1991 के आर्थिक सुधारों तक पहुंचे। वृहद आर्थिक असंतुलन ही इन सुधारों की सबसे प्रमुख वजह रहा। बहरहाल, सुधार की हिमायत करने वालों की दलीलों को कम करके नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने सहमति तैयार की और ऐसा अकादमिक कार्य किया और जो आगे चलकर सन 1991 और 1993 के बीच तेजी से उठाए गए कदमों का आधार बना। श्रीनिवासन ने स्वयं देश के बाहरी क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किया। सन 1970 के दशक में अपने काम से उन्होंने यह दिखाया था कि इंदिरा गांधी द्वारा रुपये के विवादास्पद अवमूल्यन से व्यापार घाटे के अस्थायित्व की समस्या से निपटने में मदद मिली थी। कुछ मायनों में सन 1991 के सुधार में भी श्रीनिवासन की नीतिगत प्राथमिकताओं की झलक मिली। 
 
इसके बावजूद यह कहा जा सकता है कि वे सुधार अधूरे थे क्योंकि राजकोषीय सुधार पर ध्यान नहीं दिया गया था। उत्पादन के कारक बाजार में मोटे तौर पर कोई बदलाव नहीं किया गया था जबकि वित्तीय क्षेत्र में कुछ उदारीकरण किया गया था। बुनियादी ढांचा विकास से जुड़ा सवाल भी मोटे तौर पर अनिर्णय की स्थिति में छोड़ दिया गया था।  श्रीनिवासन ने सन 2000 के दशक के आरंभ में इनमें से पहले, यानी राजकोषीय सुधार के मुद्दे को उठाया। उन्होंने एक बार फिर उन लोगों के खिलाफ मजबूत दलील तैयार कीं जो कह रहे थे कि तेज वृद्घि का अर्थ यह है कि सार्वजनिक घाटे और ऋण को महत्त्वहीन मान लिया जाए। सार्वजनिक व्यय पर समुचित ध्यान देने की वजह से ही राजकोषीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम सामने आया। 
 
श्रीनिवासन तथा उनकी पीढ़ी के अन्य दिग्गजों (जिनमें सेन और भगवती शामिल हैं) के करियर हमें यह याद दिलाते हैं कि एक सफल नीति निर्माण में विश्व स्तरीय मानकों पर अकादमिक प्रशिक्षण पाने वालों के काम और उनकी दलीलों को स्थान मिलना चाहिए। इस बीच अर्थशास्त्रियों को भी चाहिए कि वे प्रासंगिक नीतिगत बहस में हिस्सा लें। आदर्श स्थिति में उन्हें ऐसी सुस्पष्टïता और ऐसा हुनर पैदा करना चाहिए जो श्रीनिवासन की लेखनी की पहचान बन चुका था। 
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