बिजनेस स्टैंडर्ड - बस्तर की जमीन से बज रही चुनावों की रणभेरी
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बस्तर की जमीन से बज रही चुनावों की रणभेरी

आर कृष्णा दास /  11 11, 2018

चुनावी समर

बिजनेस स्टैंडर्ड बस्तर की जमीन से बज रही चुनावों की रणभेरीछत्तीसगढ़ राज्य में बस्तर जिले के विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात पर अपना निकॉन कैमरा थामे प्रमोद कुमार मौर्य की नजरें पर्यटकों को तलाश रही हैं। भारत के सबसे चौड़े झरने के आगे एक तस्वीर उतारने पर मौर्य को 30 रुपये मिल जाते हैं। बमुश्किल 20-22 साल उम्र वाले मौर्य ऐसे इलाके से हैं, जिसकी छवि बहुत खराब है। उनका गांव नक्सल प्रभावित क्षेत्र के काफी भीतरी हिस्से में बसा है और मुख्यधारा से बिल्कुल कटा हुआ है। मगर मौर्य बातों का सिरा पकडऩा और जोडऩा बखूबी जानते हैं।

मौर्य के इलाके में लोगों को बेशक नंगे पांव ही चलना पड़ता है, लेकिन वह खुद झरने पर अच्छा कारोबार करते हैं। सैलानियों से बात शुरू होते ही वह अपनी खींची तस्वीरें दिखाने लगते हैं और ज्यादातर सैलानी उनसे तस्वीर खिंचाने को राजी हो जाते हैं। मौर्य बताते हैं, 'रोजाना 250-300 रुपये की कमाई हो जाती है। सर्दियों में सैर-सपाटे का सीजन आता है तो कमाई 4-5 गुना हो जाती है।' मगर अब उनका कारोबार घटता जा रहा है क्योंकि स्मार्टफोन ने उसकी सूरत बहुत बदल दी है। फिर भी मौर्य घबराते नहीं हैं। वह उस समय भी नहीं घबराए थे, जब उनके नजदीक बन रही बड़ी इस्पता संयंत्र परियोजना का काम बंद कर दिया गया था, जबकि उससे उनका कारोबार बढ़ सकता था और नौजवानों को रोजगार मिल सकता था।

चित्रकोट से केवल 9 किलोमीटर दूर लोहंडीगुडा गांव में टाटा स्टील कंपनी एक बड़ी परियोजना पर काम कर रही थी जो बस्तर क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को बदल सकती थी। कंपनी ने साल 2005 में 195 अरब रुपये का एकदम नया संयंत्र स्थापित करने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एक करार किया था। इकाई स्थापित करने के लिए 10 गांवों की 2,043 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जाना था और उसकी सालाना इस्पात उत्पादन क्षमता 55 लाख टन रहने का अनुमान था। इसके लिए साल 2008-09 में भूमि अधिग्रहण का काम शुरू किया गया। कुल जमीन में से 1,764.61 हेक्टेयर निजी जमीन थी जिस पर 1,707 किसानों का मालिकाना हक था। 

कंपनी ने प्रत्यक्ष तौर पर किसानों से भूमि अधिग्रहण नहीं किया और स्थानीय प्राधिकरण यह कार्य कर रहा था। टाटा स्टील ने किसानों के मुआवजे के लिए 69 करोड़ रुपये जमा कराए थे। जमीन अधिग्रहण के बाद राज्य सरकार को यह जमीन कंपनी को सौंपनी थी।  फिलहाल 1,165 किसानों को मुआवजा मिला, जिसमें 42 करोड़ रुपये बांटे जा चुके हैं। इस अधिग्रहण के लिए बड़ी राशि के वितरण के बावजूद अधिग्रहण कागजों पर ही है और न तो भूमि सीमांकन किया गया है और न ही कब्जा लिया गया है।

इसी बीच दंतेवाड़ा जिले की बैलाडिला पहाडिय़ों में टाटा स्टील को आवंटित लौह अयस्क खदानों में अयस्क लगातार बढ़ता गया। कंपनी निर्धारित अवधि में काम निपटाने में विफल रही और जमीन का पट्टा रद्द कर दिया गया। इन खदानों में उच्च गुणवत्ता का इस्पात बनाने वाला 10.8 करोड़ टन कच्चा माल रखा है, जिसका उपयोग बस्तर संयंत्र के निर्माण में किया जाना था। लेकिन नक्सलियों के डर ने कंपनी को इस क्षेत्र में आने से रोक दिया और जुलाई 2016 में कंपनी ने आधिकारिक तौर पर इस परियोजना को बंद करने की घोषणा कर दी। 

टाटा स्टील बस्तर से जा चुकी है और वाद-विवाद ही बाकी रह गया है। विपक्षी पार्टियां इस मामले को उछालकर बड़ा चुनावी मुद्दा बना रही है जबकि सत्तारूढ़ भाजपा इसे दबाने में लगी है। मौर्य को भी इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता।  वह कहते हैं, 'कंपनी आ जाती तो ठीक रहता, नहीं आई तो भी फर्क नहीं पड़ता।' मौर्य के माता-पिता जंगल से सामग्री इकट्ठा करके अपनी कमाई करते हैं। इस्पात संयंत्र को लेकर यहां  अधिकतर लोग इसी तरह का उदासीन रवैया रखते हैं, जिसने कांग्रेस को चकित कर दिया है। 

12 नवंबर को होने जा रहे पहले चरण के मतदान को देखते हुए कांग्रेस इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है। पहले चरण में बस्तर के 12 निर्वाचन क्षेत्रों के अलावा राजनांदगांव जिले के 6 विधानसभा क्षेत्रों में मतदान होना है। जनजातीय वोटों पर पकड़ कमजोर होने से भाजपा और कांग्रेस के लिए बस्तर जिले के चुनाव परिणाम काफी महत्त्वपूर्ण साबित होंगे। साल 2008 में 11 सीटों पर कब्जा जमाने वाली सत्तारूढ़ पार्टी को 2013 में केवल 4 सीटों से संतोष करना पड़ा था। चुनावों में कांग्रेस इस इलाके पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगी और भाजापा भी यहां अपनी स्थिति में सुधार करने के लिए आतुर है। हालांकि टाटा स्टील का संयंत्र बंद होने से किसी भी पार्टी को लाभ नहीं हुआ। 

राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र बाजपेयी कहते हैं, 'जब इस परियोजना की घोषणा की गई थी तो बस्तर के लोग काफी उत्साहित थे क्योंकि यह क्षेत्र के विकास में एक बड़ा मील का पत्थर था।' वह कहते हैं कि परियोजना अब बंद हो चुकी है लेकिन यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं है। बाजपेयी कहते हैं कि यह परियोजना जमीन पर आ भी जाती तो इसका फायदा मोटे तौर पर बस्तर के बजाय चित्रकोट क्षेत्र तक ही सीमित होता। राजनीतिक विश्लेषक पवन दुबे भी इससे सहमत हैं। वह कहते हैं, 'हैरत की बात है कि टाटा स्टील बस्तर में कभी चुनावी मुद्दा नहीं रहा।' कुछ दूसरे ऐसे कारण भी हैं जिनके चलते इस्पात संयंत्र लोगों के बीच बहस का मुद्दा बन ही नहीं पाया। अहम बात है कि किसानों को जमीन का मुआवजा भी मिल गया और जमीन भी उनके पास ही रही। दुबे कहते हैं कि संयंत्र से प्रभावित किसानों में से कई अब भी खेती करके कमा रहे हैं।

मगर कांग्रेस भी आसानी से हार मानने वाली नहीं है। चित्रकोट  निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा चुने जाने की कोशिश कर रहे कांग्रेस विधायक दीपक बैज कहते हैं, 'आदिवासियों से छल किया गया और उनकी जमीनें हड़प ली गई हैं।' वह कहते हैं कि परियोजना बंद होने पर जमीन के वास्तविक मालिक अपनी जमीनें वापस चाहते हैं। बैज इस मुद्दे पर ग्रामीणों को संगठित कर रहे हैं।  भाजपा गेंद को दूसरे पाले में डाल रही है। भाजपा प्रत्याशी लच्छूराम कश्यप कहते हैं, 'जमीन का उपयोग किसी दूसरी परियोजना को लाने में किया जाएगा और इससे क्षेत्र में विकास की नई लहर दिखेगी।' चाहे जो भी हो, सत्ताविरोधी लहर को नाकाम करने के लिए भाजपा विकास के एजेंडा का ही सहारा ले रही है।
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