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नई नहीं रिजर्व बैंक और सरकार के बीच की रार

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  November 11, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आरक्षित कोष को लेकर उसके और सरकार के बीच इस समय रस्साकशी चल रही है, मगर ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। अब से 32 साल पहले वर्ष 1986 में भी ऐसा ही टकराव देखने को मिला था। उस समय एस वेंकिटरमणन को नया वित्त सचिव बनाया गया था। उन्होंने सरकार की वित्तीय स्थिति की पूरी जांच-पड़ताल की और पाया कि सरकार के पास धन की भारी कमी है। उसके बाद वेंकिटरमणन ने सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी के दो संभावित स्रोतों की पहचान की। 

 
पहला ऊंचे सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) का परंपरागत स्रोत था। इसके तहत आरबीआई को सरकार को सस्ता ऋण देना पड़ता। दूसरा विकल्प अधिशेष कहे जाने वाले आरबीआई के लाभ थे। उस समय आरबीआई के गवर्नर आर एन मल्होत्रा थे। वह वर्ष 1982 से 1985 तक वित्त सचिव रह चुके थे। जब उन्हें वेंकिटरमणन का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने दोनों ही विकल्पों को खारिज करते हुए एक लंबा नोट लिखा। मल्होत्रा ऊंचे एसएलआर के खिलाफ थे। इसके पीछे उनका तर्क था कि इससे बैंकों के पास मझोले और बड़े उद्योगों को कर्ज देने के लिए बहुत कम धनराशि बचेगी, जिन्होंने निवेश की बड़ी योजना बनाई थीं और उन्हें बड़ी मात्रा में कार्यशील पूंजी की दरकार थी। उन्होंने कहा कि यह अच्छा विचार नहीं है। 
 
उन्होंने आरबीआई के लाभ को हस्तांतरित करने के मुद्दे पर लिखा कि ये अन्य सार्वजनिक कंपनियों के सामान्य लाभ से 'अलग' हैं। उन्होंने कहा कि ये अनुमानित हैं। मल्होत्रा ने कहा कि अगर उन्होंने लाभ हस्तांतरित भी कर दिए तो ये सरकार को आरबीआई के ऋणों में बढ़ोतरी के समान होंगे। उन्होंने कहा कि ज्यादा राशि के हस्तांतरण को 'संसाधन बढ़ाने का जरिया' नहीं माना जाना चाहिए। इस नोट के आखिर में मल्होत्रा ने सीधे प्रधानमंत्री के सामने अपना पक्ष रखने का फैसला किया। लेकिन कुछ वजहों से राजीव गांधी ने अंतिम क्षणों में बैठक रद्द कर दी। इस वजह से मल्होत्रा को वित्त मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष के सामने अपनी बात कहने के लिए मजबूर होना पड़ा। वेंकिटरमणन बहुत नाराज थे, लेकिन वह कुछ नहीं कर सकते थे। इस वजह से मामला शांत हो गया। 
 
राजीव के लिए मुश्किल 
 
हालांकि मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। वर्ष 1988 में वित्तीय स्थिति बदतर हुई तो वेंकिटरमणन ने यह मामला फिर से उठाया। वर्ष 1987 में भयंकर सूखा पड़ा, जिससे यह वर्ष अर्थव्यवस्था के लिए बहुत खराब साबित हुआ। उस साल चीनी और खाद्य तेलों का बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ा। चीनी और खाद्य तेलों का खाद्य बास्केट में मोटा भारांश है। इन आयातों का भुगतान लघु अवधि का कर्ज लेकर किया गया, जो तेजी से बढऩे लगा था। यह वर्ष राजीव गांधी के लिए राजनीतिक रूप से भी बहुत खराब साबित हुआ। उनकी मूल टीम पूरी तरह बिखर चुकी थी। उनके निकट राजनीतिक सहयोगियों में से तीन अरुण नेहरू, अरुण सिंह और वीपी सिंह सरकार से बाहर चले गए थे। बोफोर्स घोटाले का मामला गर्म था और खुद राजीव गांधी पर रिश्वत लेने के आरोप थे। वह कुछ राज्यों में चुनाव भी हार चुके थे। उस साल एक समय उनके और राष्ट्रपति जैल सिंह के बीच टकराव भी रहा। राष्ट्रपति जैल सिंह ने यह जगजाहिर कर दिया कि वह राजीव गांधी को हटा सकते हैं। सीधे-सीधे कहें तो राजीव राजनीतिक और अर्थव्यवस्था के स्तर पर गंभीर संकट में थे। इन्हीं परिस्थितियों में वेंकिटरमणन को और धन जुटाने का जिम्मा सौंपा गया। 
 
लाभ हस्तांतरण मांग हुई तेज 
 
सरकार की शिकायत यह थी कि आरबीआई शुरू से ही हर साल 2.10 अरब रुपये के लाभ का हस्तांतरण करता आ रहा है। उसे लगा कि सरकार के स्वामित्व वाले आरबीआई को अपना लाभ क्यों अपने पास रखना चाहिए? सरकार का मानना है कि आरबीआई यह लाभ मुद्रा की छपाई के सॉवरिन कार्य की वजह से अर्जित कर पाता है। वेंकिटरमणन ने तो आरबीआई को यहां तक कह दिया कि वह चाहते हैं कि सरकार को आधा लाभ दिया जाए।  मल्होत्रा ने फिर इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि आरबीआई यह भार वहन नहीं कर सकता क्योंकि उसकी आंतरिक लागत में बढ़ोतरी हुई है, जबकि आय में कमी आई है। उन्होंने इसके लिए कुछ अन्य कारण भी गिनाए। वह कुल लाभ के एक निश्चित प्रतिशत के हस्तांतरण पर अडिग थे। उन्होंने कहा कि यह बेहद खराब विचार है क्योंकि इससे सांविधिक कोषों के लिए आवंटन में भारी कमी आएगी। लेकिन वेंकिटरमणन बहुत चतुर थे। उन्होंने अप्रवासी भारतीयों (एनआरआई) से उधार लिया और यह देनदारी आरबीआई के सिर मढ़ दी। इससे ठीक वही हुआ, जो शुरुआती सुझाव को मानने पर होता। सरकार को धन मिल गया और आरबीआई को यह बोझ उठाना पड़ा। 
 
उस समय वित्त मंत्रालय में जो तीन तीन अधिकारी थे, वे एक के बाद एक आरबीआई के गवर्नर बने। इन अधिकारियों में से एक मुख्य आर्थिक सलाहकार बिमल जालान, दूसरे संयुक्त सचिव वाई वी रेड्डी और तीसरे एक निदेशक दुव्वुरी सुब्बाराव थे।  वेंकिटरमणन दिसंबर, 1990 में आरबीआई के गवर्नर बने। उन्होंने जो काम सबसे पहले किए, उनमें से एक मल्होत्रा की नीति को पलटना था। आरबीआई ने तत्काल आरबीआई को 3.50 अरब रुपये का हस्तांतरण किया। तब से धन का हस्तांतरण बढ़ रहा है। यह 2015 में 630 अरब रुपये की ऊंचाई तक पहुंच गया है। इसी वजह से यह नाटकीय घटनाक्रम चल रहा है।
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