बिजनेस स्टैंडर्ड - वर्गीय पहचान को लेकर मोदी सरकार का रुझान
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वर्गीय पहचान को लेकर मोदी सरकार का रुझान

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  November 11, 2018

आज से पांच वर्ष पहले मैंने अपने एक आलेख में एक विशिष्ट समस्या की बात कही थी जो देश के रसूखदार बुर्जुआ वर्ग से संबंधित थी और जिसे लेकर सार्वजनिक बहस की आवश्यकता थी। यह समस्या थी शासक वर्ग और अधिकारसंपन्न वर्ग की। शासक वर्ग में राजनेता, नौकरशाह, न्यायपालिका, पारंपरिक बौद्धिक वर्ग और पत्रकार, पुलिस तथा सैन्य बलों के प्रमुख आदि आते हैं जबकि अधिकार प्राप्त वर्ग में वे लोग आते हैं जो औपचारिक प्रतिष्ठानों से अलग हैं लेकिन आर्थिक रूप से संपन्न हैं। इसमें कारोबारी जगत के लोग, नए पेशेवर खासतौर पर आईटी और बैकिंग क्षेत्र के लोग तथा शासक वर्ग के लोगों की नई पीढ़ी के साथ विभिन्न प्रतिष्ठानों की मदद से काम करने वाले कार्यकर्ता शामिल हैं।

 
कहने का तात्पर्य यह है कि इन दोनों वर्गों में कुछ खास समानता नहीं थी। ये अलग-अलग संप्रभु गणराज्यों की तरह थे जो एक दूसरे के प्रति संदेह और शत्रुता की भावना रखते। बीते पांच वर्षों के दौरान देश ने एक बार फिर 7 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर हासिल की है और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हम इस अपेक्षाकृत सहज समीकरण से आगे निकल आए हैं। ये दोनों बुर्जुआ वर्ग अलग-अलग तो हैं लेकिन इनकी प्रकृति बदल गई है। इनमें से पूर्ववर्ती ने अपना बुर्जुआपन समाप्त करने में कड़ी मेहनत की है। राजनेता और नौकरशाह अब कहीं अधिक सहज नजर आते हैं। वे पांच सितारा होटलों में आते-जाते, पार्टियों में शिरकत करते और शराब या बढिय़ा भोजन के दौर चलाते नहीं दिखते। मोदी युग में यह प्रतिष्ठान किताबों से नहीं बल्कि जमीनी तौर तरीकों से ताकत लेता है।
 
दूसरी किस्म के बुजुर्आ में भी बदलाव देखा गया है क्योंकि ये मोदी-भाजपा सरकार के रुख से खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। इन्हें मौजूदा सरकार रूखी, असंस्कृत, अनुदार और हिंदी बोलने वाले देहातियों की लगती है। दोनों में विचलन आया है। कॉर्पोरेट वर्ग अधिकार प्राप्त वर्ग से दूर हुआ जबकि शीर्ष न्यायपालिका ने उसका स्थान ले लिया। इसमें शामिल होने वाली एक नई श्रेणी पत्रकारों-सामाजिक कार्यकर्ताओं की है। आगे चलकर आपको भी लगेगा कि यह इतना सहज नहीं है जितना प्रतीत होता है। 
 
हम अपनी सुविधा के लिए इसे कांवडिय़ा बनाम हैलोवीन वर्ग का संघर्ष कह सकते हैं। आपने मॉनसून के मौसम में लाखों शिवभक्त कांवडिय़े देखे होंगे जो गंगा से पवित्र जल एकत्रित करने हरिद्वार जाते हैं। वहीं, हैलोवीन एक अमेरिकी त्योहार है जिसे अब समाज का ऊपरी तबका न केवल वर्गीय पहचान के रूप में बल्कि एक स्वच्छ त्योहार के रूप में अपना रहा है। जरा इसकी तुलना शोर-शराबे और धुएं से भरी दीवाली, हुड़दंग भरी होली, नदियों और समुद्रों को अपवित्र करने वाली पूजा और अन्य कर्मकांडों, रक्त से सनी बकरे आदि से कीजिए। कहने का मतलब यह है कि इन कांवडिय़ों जैसों को सभ्य कैसे बनाया जा सकता है? हम जिन दो वर्गों के बारे में बात कर रहे हैं उनसे जुड़ी चिंताएं भी लगभग समान हैं लेकिन उनको हल करने का तरीका विरोधाभासी है। एक को यानी सरकार को खुद पर यकीन है जबकि दूसरे वर्ग को अपने संसाधनों पर। उदाहरण के लिए निजी डीजल जनरेटर, बोरवेल, निजी सुरक्षा, स्कूल, अस्पताल, विमान कंपनियां और कारें। परंतु साफ कहें तो दोनों को सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, रेल और सार्वजनिक परिवहन से कोई लेनादेना नहीं।
 
मोदी के कार्यकाल के पांचवें वर्ष में सरकारी तंत्र लोकलुभावन अधिक नजर आ रहा है, वह मध्य वर्ग और निचले वर्ग के अपने मतदाताओं से सीधा संवाद कर रही है, वह इस बात को लेकर सतर्क है कि उसके अधिक वोट कहां हैं। वह आर्थिक और बौद्धिक बुर्जुआ वर्ग को एक गौण महामारी के रूप में देखती है। यानी सभी आलोचकों को शैतान के रूप में प्रस्तुत करना। यही वजह है कि अपने विश्वासपात्रों से ताकत हासिल करने वाली यह सरकार पश्चिमीकृत, हिंदू विरोधी अदालतों और उनके निर्णयों का तिरस्कार करती है।
 
अगर आप राजनीति से इसका प्रतिरोध निकलने की राह देख रहे हैं तो आप निराश होंगे। इस विषय पर दोनों दलों में आपसी सहमति है। सबरीमला और दीवाली के पटाखों को लेकर अदालती फैसलों की आलोचना में जहां भाजपा और उसके वैचारिक साथी मुखर रहे, वहीं कांग्रेस खामोश रही। इनके विरोधाभास जब तब सामने आते रहते हैं।  दिक्कत यह है कि उनकी आधुनिकता पार्टी के नजरिये से सहमति के आड़े आती है और राजनीति उनकी उदारता पर पहरे लगाती है। आखिरकार केरल तथा अन्य जगहों पर बड़ी तादाद में हिंदू मतदाता हैं जो अदालत के आदेश से नाराज हैं। वे आस्था और मंदिरों के मामले में सरकार के चयनित हस्तक्षेप से भी नाखुश हैं। वहीं तीन तलाक मसले पर वह या उनकी पार्टी उतनी उदारता नहीं दिखाएगी जितनी भाजपा दिखा रही है। दोनों पक्षों में यह पाखंड बराबर मौजूद है।
 
मुख्यधारा के अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों की तरह (हम वाम दलों को इनमें शामिल नहीं करते) कांग्रेस ने भी दीवाली के पटाखों और आईपीसी की धारा 377 पर खामोशी बरती। उनको पता है कि उनके वोट कहां हैं। ज्यादातर कांवडिय़ा वर्ग में। ऐसे में उपरोक्त आदेशों से इस वर्ग में तो निराशा ही उत्पन्न होगी। आप स्वच्छ भारत अभियान के तर्ज पर सुधारों का संदेश उन तक ले जा सकते हैं लेकिन तब क्या आपको वोट मिलेंगे? दूसरा सवाल यह कि आप सामाजिक सुधारक हैं या राजनेता? कांवडिय़ा वर्ग के लिए आस्था और आध्यात्मिकता एक अनसुलझी पहेली है। ऐसा ही मसला राष्ट्रवाद का है। इससे अजीब विडंबनाएं तैयार होती हैं। मसलन कुछ अदालती आदेशों की अवमानना होती है और कुछ आदेशों को वापस लेने के बाद भी उनका पालन जारी रखा जाता है। सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान के अदालती आदेश को बाद में वापस ले लिया गया लेकिन उस मसले पर सभी दलों की खामोशी देखिए। कई सिनेमाहॉल अब तक उसे बंद करने का साहस नहीं जुटा पाए हैं क्योंकि अधिकांश लोगों को इससे कोई शिकायत नहीं है। अपने राष्ट्रगान के लिए एक मिनट से भी कम समय तक खड़े रहने में भला किसी को क्या दिक्कत हो सकती है?
 
इसके बाद बात गोवध से होती हुई नक्सलवाद तक चली जाती है। महाराष्ट्र पुलिस द्वारा पकड़े गए कथित रूप से माओवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वालों को लेकर मुख्यधारा के विपक्ष ने शुरुआती सहानुभूति के बाद मोटे तौर पर चुप्पी साधे रखी है। अब मोदी ने बस्तर में कांग्रेस को 'शहरी नक्सल' का हिमायती करार दिया। कांग्रेस को पता नहीं है कि इस पर कैसे प्रतिक्रिया दी जाए? अगर वह कहती है कि लोग किसी भी विचारधारा में यकीन कर सकते हैं और बिना हथियार उठाए क्रांति के लिए भी काम कर सकते हैं तो कांवडिय़ा रुझान वाले इस विचार को खारिज कर देंगे। अगर वह छत्तीसगढ़ के मतदाताओं को याद दिलाती है, जहां उसका समूचा शीर्ष नेतृत्व नक्सल हमले में साफ हो गया था और जिसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सशस्त्र माओवादियों को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था तो वह बौद्घिकों को नाराज कर देगी। इतना ही नहीं उसकी पार्टी के नेता राज बब्बर ने गत सप्ताह उन्हें क्रांतिकारी कहकर पुकारा, पार्टी इसे कैसे स्पष्ट करेगी। पहले भी दिग्विजय सिंह इनके खिलाफ पी चिदंबरम की कार्रवाई को शिथिल कर चुके हैं। 
 
अब यह समूह अधिक प्रभावी है। उन्हें सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना भी आ गया है। इतना ही नहीं वे वास्तविक सत्ता और मुख्यधारा की राजनीति से दूर भी हैं। गहरे दबाव में काम कर रहे एक उदार लोकतंत्र के लिए यह अच्छी खबर नहीं है।  भाजपा उनको शत्रु के रूप में देखती है और कांग्रेस उन्हें एक बोझ समझती है। बदले में वे भाजपा को लोकतांत्रिक विद्वेष से देखते हैं और मोदी को बिना मूंछ का नया हिटलर मानते हैं। उनके लिए कांग्रेस भ्रमित, समझौतापरक और हिंदूवादी पार्टी है जिसका नेता मंदिर-मंदिर घूम रहा है और अपनी जनेऊ दिखा रहा है। एक राज्य को छोड़ दें तो वाम का सफाया हो चुका है। वे अंग्रेजी मीडिया अैर ट्विटर और अपनी हैलोवीन पार्टियों तक सिमट कर रह गए हैं। उनमें से कुछ इन पार्टियों में राहुल और मोदी बनकर आए तो कुछ अन्य सोमाली समुद्री डकैत बनकर। एक ने तो अपने चेहरे पर काला रंग पोतकर उस पर ग्रेटर नोएडा लिख रखा था।  मुझे बताया गया कि राफेल के रूप में सजकर आना भी इस हैलोवीन पर्व में देखा गया। परंतु मेरी जानकारी में कोई भी कांवडिय़ा बनकर नहीं आया। 
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