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क्रेडिट रेटिंग से ही न कर लें निवेश का फैसला

संजय कुमार सिंह /  November 11, 2018

आईएलऐंडएफएस और उसकी सहयोगी कंपनियों ने हाल में भुगतान में जो चूक (डिफॉल्ट) की, उससे क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा दी गई रेटिंग में लोगों का भरोसा हिल गया है। इस समूह के ऋण साधनों की रेटिंग कुछ ही महीनों में एएए से डी (डिफॉल्ट) तक लुढ़क गई। इसलिए जो निवेशक सीधे बॉन्ड में निवेश करते हैं, उन्हें कुछ और सतर्कता बरतने की जरूरत है।

 
क्रेडिट रिपोर्ट पढि़ए
 
किसी ऋण साधन में निवेश करने से पहले उसे रेटिंग देने वाली एजेंसी की वेबसाइट पर जाइए और साधन के जरिये रकम उगाहने वाली कंपनी की क्रेडिट रिपोर्ट निकाल लीजिए। इस रिपोर्ट में रेटिंग दी होती है, जिससे पता चलता है कि कंपनी में अपना बकाया यानी ऋण योजना के जरिये निवेशकों से लिया गया कर्ज चुकाने की कितनी क्षमता है। इक्रा में मुख्य रेटिंग अधिकारी अंजन घोष कहते हैं, 'यदि कोई निवेशक कंपनी की ताकत और कमजोरियों के बारे में तथा उसकी रेटिंग के प्रमुख आधारों के बारे में जानना चाहता है तो उसे रिपोर्ट में समूची जानकारी मिल जाएगी।'
 
क्रेडिट रिपोर्ट में रेटिंग की आगे की संभावना भी दी जाती है। केयर रेटिंग्स की वरिष्ठ निदेशक रेवती कस्तूरे बताती हैं, 'संभावना यानी आउटलुक से पता चलता है कि रेटिंग किस दिशा में जाएंगी और रेटिंग एजेंसी को भविष्य में कंपनी की रेटिंग किस तरह बदलती दिख रही है।' तीन तरह के आउटलुक होते हैं - स्थिर, सकारात्मक और नकारात्मक। यदि किसी कंपनी का स्थिर या स्टेबल आउटलुक होता है तो इसका मतलब है कि एजेंसी को अगली समीक्षा में भी वही रेटिंग बरकरार रहने की उम्मीद है। यदि आउटलुक सकारात्मक या पॉजिटिव है तो एजेंसी को कंपनी की साख सुधरने की उम्मीद दिखती है और ऐसा हुआ तो रेटिंग बेहतर भी की जा सकती है। क्रेडिट रिपोर्ट में कंपनी के वित्त तथा लाभदेयता, तरलता यानी नकदी और कर्ज चुकाने की क्षमता जैसे पैमानों की झलक भी होती है। रिपोर्ट में यह दिया होता है कि कंपनी को अतीत में कब कौन सी रेटिंग दी गई है। कस्तूरे का कहना है, 'इससे निवेशकों को पता लगता है कि कंपनी की रेटिंग अतीत में नीचे गिरी थीं या ऊपर चढ़ी थीं।'
 
प्रदर्शन के पैमाने भी देखें
 
निवेशकों को क्रेडिट डिफॉल्ट एनालिसिस नाम का पैमाना जरूर देखना चाहिए, जो रेटिंग एजेंसियों की वेबसाइट पर दिया जाता है। इससे पता चलता है कि कंपनी ने उसी क्षेत्र की दूसरी कंपनियों के मुकाबले किस तरह का प्रदर्शन किया है। डिफॉल्ट यानी भुगतान में चूक की दर से पता चलता है कि किसी निश्चित अवधि में विभिन्न रेटिंग श्रेणियों (एएए, एए आदि) में कितनी बार डिफॉल्ट हुआ है। मान लीजिए कि एए श्रेणी में किसी एजेंसी की क्रेडिट डिफॉल्ट दर 0.9 है। इसका मतलब है कि एजेंसी ने अगर 1,000 ऋण योजनाओं को एए रेटिंग दी है तो पिछले तीन साल में उनमें से 9 ने भुगतान में चूक की है। डिफॉल्ट की दर जितनी कम हो उतना बेहतर है। क्रिसिल रेटिंग्स के अध्यक्ष गुरप्रीत छटवाल कहते हैं, 'डिफॉल्ट दर से आपको पता चलता है कि रेटिंग एजेंसी अपना काम कितनी अच्छी तरह से कर रही है। विभिन्न रेटिंग एजेंसियों के डिफॉल्ट आंकड़ों की तुलना करने से आपको अहसास हो जाएगा कि किस एजेंसी की रेटिंग अधिक भरोसेमंद है।' जैसे-जैसे आप बेहतर रेटिंग श्रेणी में जाएंगे वैसे-वैसे ही डिफॉल्ट दर कम होनी चाहिए।
 
रेटिंग एजेंसियों की तुलना के लिए निवेशक स्थिरता के पैमाने का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। अगर तीन साल पहले 100 कंपनियों को एएए रेटिंग दी गई है और उनमें से 98 की रेटिंग अब भी एएए है तो इसका मतलब है कि एजेंसी में 98 फीसदी स्थिरता है। कस्तूरे कहती हैं, 'रेटिंग की स्थिरता जितनी ज्यादा होगी, रेटिंग एजेंसी का प्रदर्शन भी उतना ही बेहतर होगा क्योंकि इसका मतलब है कि रेटिंग में घटबढ़ कम रही है।' घोष की राय है कि रेटिंग की स्थिरता को रेटिंग के स्तर से भी जोडऩा चाहिए। वह कहते हैं, 'ऊंची रेटिंग वाली योजनाओं को अधिक स्थिर होना चाहिए।' क्रिसिल ए अथवा उससे अधिक रेटिंग वाली कंपनियों की रेटिंग में घटबढ़ की तीव्रता का पैमाना भी रखती है। छटवाल बताते हैं, 'ए या उससे ऊंची श्रेणी में अगर दो श्रेणी से अधिक डाउनग्रेड होता है तो हम उसे उच्च तीव्रता वाली रेटिंग कार्रवाई मानते हैं। यदि कोई रेटिंग एजेंसी रेटिंग में इस तरह का फेरबदल अक्सर करती है तो समझ लीजिए कि वह अपना काम ठीक से नहीं कर रही है।' उनका कहना है कि अगर कोई एजेंसी किसी कंपनी पर नजर रखे हुए है तो कंपनी की स्थिति में आने वाले बदलाव की सूचना उसे नियमित रूप से देनी चाहिए ताकि उच्च तीव्रता वाली रेटिंग कार्रवाई की जरूरत ही नहीं रह जाए।
 
जांचें एजेंसियों में रेटिंग
 
जब कोई कंपनी सार्वजनिक निर्गम पेश करती है तो उसे दो रेटिंग बतानी पड़ती हैं। मगर उसके दूसरे ऋण निर्गम आदि भी हो सकते हैं, जिनके लिए उसे अतीत में रेटिंग दी गई होगी। हो सकता है कि जो बॉन्ड वह पेश कर रही है, उसे एए+ रेटिंग मिली हो। लेकिन अतीत में उसके दूसरे बॉन्डों पर एए या एए- रेटिंग भी मिली हो सकती है। छटवाल बताते हैं, 'कंपनी सार्वजनिक निर्गम के दस्तावेज में यह जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है। निवेशकों को विभिन्न रेटिंग एजेंसियों की वेबसाइट पर जाना चाहिए और कंपनी की सभी मौजूदा योजनाओं की रेटिंग जांचनी चाहिए। संस्थागत निवेशकों की तरह उन्हें भी देखना चाहिए कि सबसे कम रेटिंग कौन सी है।'
 
लगाएं अलग-अलग दांव
 
रेटिंग प्रणाली में एक बड़ी खामी होती है। सेबी में पंजीकृत निवेश सलाहकार और पर्सनलफाइनैंसप्लान डॉट इन के संस्थापक दीपेश राघव कहते हैं, 'कंपनियां रेटिंग पाने के लिए भुगतान करती हैं, जिसकी वजह से हितों का टकराव पैदा हो जाता है। यदि कोई एजेंसी किसी कंपनी को खराब रेटिंग देती है तो कंपनी दूसरी एजेंसी के पास चली जाती है। इसीलिए जब तक कंपनियां खुद रेटिंग पाने के लिए रकम देती हैं तब तक आप रेटिंग पर पूरी तरह यकीन नहीं कर सकते।' नियामक भी बैंकों और म्युचुअल फंडों से अच्छी तरह जांच-पड़ताल करने के लिए कहते हैं। सीधे निवेश कर रहे छोटे निवेशक को खास तौर पर सतर्कता बरतनी चाहिए। कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह सलाह देते हैं, 'यदि आप किसी बेहद प्रतिष्ठित कंपनी के ऋण पत्रों में निवेश कर रहे हैं तो आप केवल रेटिंग पर भरोसा कर सकते हैं। लेकिन अगर कंपनी बहुत साख वाली नहीं है तो आपको अलग से छानबीन करनी पड़ेगी।' शाह यह भी कहते हैं कि बहुत अधिक ऋण ले चुकी कंपनी में वह निवेश नहीं करते हैं। राघव आगाह करते हैं कि गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के गैर परिवर्तनीय ऋण पत्रों (एनसीडी) में जोखिम भी ज्यादा होता है। वह कहते हैं, 'कम अवधि के लिए कर्ज लेने और लंबी अवधि के लिए कर्ज देने की उनकी आदत का मतलब है कि कम अवधि के ऋण पत्रों के रोल-ओवर में नाकामी से डिफॉल्ट की नौबत आ जाएगी।' 
 
शाह की सलाह है कि जो छोटे या खुदरा निवेशक खुद जोखिम का अंदाजा नहीं लगा सकते, उन्हें म्युचुअल फंड का रास्ता पकडऩा चाहिए। वह कहते हैं, 'म्युचुअल फंड में विविधीकरण का फायदा मिलता है। कुछ फंडों का निवेश आईएलऐंडएफएस में था, लेकिन उनके कुल निवेश का वह कुछ प्रतिशत ही था।' रिलायंस म्युचुअल फंड में मुख्य निवेश अधिकारी - स्थिर आय निवेश अमित त्रिपाठी कहते हैं, 'गहन शोध, बाजार की खबरों, कारोबार और वित्तीय माध्यमों से जांच की सुविधा होने के कारण हमारे पास बेहतर सूचना होती है।' वह ऐसी फंड कंपनी के साथ जाने की सलाह देते हैं, जिसके पास बेहतर क्रेडिट अनुसंधान टीम हो और छानबीन करने के लिए लोग भी हों।
Keyword: IL&FS, fund, share, LIC, sidbi, इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंस सर्विसेज,
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