बिजनेस स्टैंडर्ड - रेटिंग एजेंसियों में स्वच्छता जरूरी
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रेटिंग एजेंसियों में स्वच्छता जरूरी

श्यामल मजूमदार /  November 09, 2018

क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के हितों के टकराव तथा तमाम अन्य वजहों से उनकी विश्वसनीयता में अत्यधिक कमी आई है। इस पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कुछ संभावित हल सुझा रहे हैं श्यामल मजूमदार 

 
क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों पर सबसे बड़ा अभियोग सन 2010 में उस समय लगा था जब अमेरिका में वित्तीय संकट की जांच कर रहे वित्तीय संकट जांच आयोग ने मूडीज को 'ट्रिपल ए फैक्टरी' कहकर संबोधित किया था। आयोग का इशारा गाहेबगाहे कंपनियों को ट्रिपल ए की उत्कृष्टï रैंकिंग देने की उसकी प्रवृत्ति की ओर था। संभवत: यही वजह थी कि मूडीज के शेयर की कीमतों में सन 2000 से 2007 के बीच छह गुने का इजाफा हुआ। हालांकि मूडीज तथा अन्य समकक्षों ने कहा था कि उन्होंने सबक सीख लिया है और अपनी तमाम प्रक्रियाओं में संशोधन किया है। इसके बावजूद क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के कामकाज को लेकर असहजता का माहौल बना रहा। 
 
यह गनीमत ही है कि भारत में मूडीज और फिच (भारत में यह स्थानीय साझेदारों के साथ काम करती है) समेत किसी भी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी को अब तक 'फैक्टरी' कहकर संबोधित नहीं किया गया है लेकिन रेटिंग संबंधी निर्णयों पर लगातार उठ रहे सवालों के कारण उनको काफी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इसकी ताजा वजह है इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस) तथा उसकी अनुषंगियों का। आईएलऐंडएफएस को महज 45 दिन के भीतर ट्रिपल ए (एएए) से जंक (डी) रेटिंग पर ला दिया गया। इससे यह चिंता स्वाभाविक तौर पर उठी कि रेटिंग देने वालों ने जानबूझकर देरी की। उनका इरादा क्या था, इसकी गहराई से पड़ताल की जानी चाहिए लेकिन यह स्पष्टï है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां समय पर संकेत देने में नाकाम रहीं। आईएलऐंडएफएस पर भारी कर्ज था और वह पूंजी नहीं जुटा पा रही थी लेकिन तब भी वे ध्यान नहीं दे पाए। यह बात किसी से छिपी नहीं थी क्योंकि कंपनी की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च, 2018 को समाप्त हुए वर्ष में आईएलऐंडएफएस का अल्पावधि का ऋण 30 प्रतिशत बढ़कर 13,500 करोड़ रुपये हो गया। 
 
देश की के्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के कमजोर प्रदर्शन से क्या सबक मिलता है? इसे कई तरह से देखा जा सकता है। यह अक्षमता भी हो सकती है और हितों के टकराव को लेकर पर्याप्त सूचना का न होना भी। इनमें से आखिरी बात सबसे अधिक परेशान करने वाली है। हालांकि सभी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां कहती हैं कि हितों के टकराव का मसला उन पर लागू नहीं होता है क्योंकि वे पहले ही अपने रेटिंग कारोबार को गैर रेटिंग कारोबार से अलग कर चुकी हैं। परंतु आरोप तो बरकरार हैं। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां निवेशकों द्वारा प्रयुक्त रेटिंग का इस्तेमाल करती हैं लेकिन उनका अधिकांश राजस्व उपयोगकर्ताओं से आता है। यह रेटिंग शुल्क के रूप में भी आता है और अन्य सेवाओं के भुगतान के रूप में भी। यह अपने आप में हितों का टकराव उत्पन्न करता है। 
 
रमीन पी बागई और बो बेकर द्वारा फरवरी 2016 में प्रस्तुत किए गए शोध पत्र में विस्तृत आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। इसमें गैर रेटिंग सेवाओं के अलावा जारीकर्ताओं और भारत में काम कर रही रेटिंग एजेंसियों के भुगतान प्रवाह का आकलन किया गया ताकि देखा जा सके कि क्या यह टकराव क्रेडिट रेटिंग को प्रभावित करता है। इसके नतीजे चौंकाने वाले हैं। किसी फर्म से गैर रेटिंग राजस्व हासिल करने वाली क्रेडिट रेटिंग एजेंसी उस फर्म को उन एजेंसियों की तुलना में अधिक बेहतर रेटिंग देता है जिन्हें ऐसी सेवाओं के लिए किसी तरह का भुगतान नहीं किया जाता है। राजस्व में बढ़ोतरी के साथ यह प्रभाव बढ़ता चला जाता है। 
 
आंकड़ों से पता चलता है कि जारीकर्ता रेटिंग करने वाले के राजस्व में जितना योगदान करता है, औसतन उसे उतनी ही अच्छी रेटिंग मिलती है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि रेटिंग श्रेणी के भीतर डिफॉल्ट दरें उन फर्म के लिए अधिक हैं जिन्होंने गैर रेटिंग सेवाओं का भुगतान किया है। इससे संकेत मिलता है कि बेहतर रेटिंग का अर्थ कम ऋण जोखिम नहीं है। कुलमिलाकर लेखकों का यही मानना था कि हितों का टकराव स्पष्ट नजर आ रहा था। ऐसे दिक्कतदेह नतीजों के बावजूद लगता नहीं कि इस मॉडल को रद्द किया जाएगा। अमेरिका में जहां सबप्राइम संकट के बाद इसकी तीखी आलोचना हुई लेकिन वहां भी इसे त्यागा नहीं गया। इसकी वजह भी हैं। इस मॉडल में हितों का टकराव तो है लेकिन तथ्य यह है कि इसके स्थानापन्नों में और भी ढेर सारी कमियां हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका में प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने जांचकर्ता-भुगतान मॉडल पर विचार किया लेकिन उसे अपनाया नहीं।
 
ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि अगर निवेश रेटिंग के लिए भुगतान करेंगे तो रेटिंग तक केवल उनकी ही पहुंच होगी जो भुगतान करते हैं। तब निवेशक अपने निवेश की गुणवत्ता को अन्य कंपनियों के समक्ष परख नहीं पाएंगे क्योंकि शायद वे उन रेटिंग एजेंसियों के लिए भुगतान करने को तैयार न हों जिनमें वे निवेश नहीं करते। सरकार या नियामक द्वारा रेटिंग के लिए भुगतान के अन्य मॉडल को अव्यावहारिक पाया गया। इसका तात्पर्य यह है कि ये मॉडल आने वाले कुछ दिनों तक बरकरार रहेगा। ऐसे में चिंता को हल करने का इकलौता तरीका है प्रक्रिया में अधिक से अधिक पारदर्शिता लाना। बाजार नियामक ने इस दिशा में कुछ काम किया है लेकिन अभी काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है। 
 
नियामक इन एजेंसियों की वैधानिक जवाबदेही बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर रेटिंग में धोखाधड़ी या लापरवाही की वजह से निवेशक को नुकसान होता है तो सेबी उसके हर्जाने का भागी बना सकता है। परंतु पूरी तैयारी किए बिना ऐसा करने से ये एजेंसियां अदालत का रुख कर सकती हैं और कह सकती हैं कि ये रेटिंग तो केवल विचार हैं। बहरहाल, सबसे बड़ा सुधार होगा इन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों से यह कहना कि वे अपनी रेटिंग संस्था और गैर रेटिंग कारोबार को अलग-अलग कर लें ताकि इनके बीच होने वाले हितों के टकराव से बचा जा सके। जानकारी के मुताबिक बाजार नियामक योजना बना रहा है कि दोनों के बीच शेयरधारिता के अलावा कोई रिश्ता न हो। इसके अलावा गैर रेटिंग कारोबार से लाभांश या मुनाफा ऐसी कंपनी को नहीं आना चाहिए जो रेटिंग कारोबार में हो। सेबी को इसका तेजी से क्रियान्वयन करना चाहिए।
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