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तय ढांचे में स्वायत्तता

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 09, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और सरकार के बीच का विवाद सार्वजनिक होने के बाद कुछ इस तरह की बातें सामने आ रही हैं: टकराव से बचा जाना चाहिए और दोनों को पीछे हट जाना चाहिए, व्यवस्था में और अधिक नकदी की जरूरत को लेकर सरकार की बात में दम है, राजकोषीय परिस्थितियों को नियंत्रण में रखने के लिए आरबीआई के भंडार का इस्तेमाल करना सही नहीं है, आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड को राजनीतिक लोगों से भर देने के बाद अब इस बोर्ड से वे निर्णय लेने को कहना जो अब तक प्रबंधन के हवाले होते थे, कतई सही नहीं है और इससे बचा जाना चाहिए। बोर्ड निगरानी और दिशानिर्देश दे सकता है लेकिन तकनीकी मसलों पर निर्णय लेने का काम पेशेवर प्रबंधन पर छोड़ दिया जाना चाहिए। व्यापक संदर्भ में देखें तो आरबीआई का पक्ष लिया जा रहा है लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि केंद्रीय बैंक को अधिक लचीला रुख अपनाना चाहिए और चर्चा को लेकर खुलापन दिखाना चाहिए। एक अन्य नजरिया भी है। वह कि आरबीआई के पास पर्याप्त भंडार है और उसे इसे सरकार को सौंप देना चाहिए क्योंकि यह भंडार आखिर उसी का है। तमाम विफलताओं के बावजूद केंद्रीय बैंक के प्रबंधन की जवाबदेही पर्याप्त नहीं रही है। इसलिए आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। आरबीआई को अपने मुख्य कामों पर ध्यान देना चाहिए। शेष कार्य उसे बाजार नियामकों और सरकार पर छोड़ देने चाहिए। 

 
दोनों पक्षों को पीछे हटने की सलाह सबसे समझदारी भरी बात है लेकिन ऐसा करना कई वजह से आसान नहीं है। पहली बात तो यह कि अर्थव्यवस्था पर वास्तव में दबाव है। दूसरा, आरबीआई की भूमिका और उसके कामकाज को लेकर व्यापक बहस पिछले कुछ समय से चल रही है और उसे हल करना जरूरी है क्योंकि यह जब तब सर उठा लेती है। इसका ताजा उदाहरण भुगतान तंत्र को लेकर उपजी समस्या है। तीसरा कारक यह है कि रिजर्व बैंक के मौजूदा गवर्नर का रुख तो कड़ा है ही, उनके साथ संवाद की बहुत अधिक गुंजाइश भी नहीं है। पहले के गवर्नरों के मिजाज में भी सख्ती थी लेकिन वे बातचीत और संवाद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। पिछले गवर्नर को जिस प्रकार (कार्यकाल के अंत में) हटना पड़ा उसे देखते हुए सरकार इस बार वैसा कोई कदम उठाने की इच्छुक नहीं दिख रही है। 
 
यही वजह है कि सरकार अगली बोर्ड बैठक में तमाम मसलों पर चर्चा करना चाहती है। अगर दो डिप्टी गवर्नरों के हालिया भाषणों की भाषा और उनके तेवर को देखा जाए तो ऐसा लगता है कि आरबीआई के शीर्ष अधिकारियों के रुख में कड़ाई आ रही है। अगर बोर्ड प्रबंधन पर दबाव बनाता है तो उसे आरबीआई गवर्नर और प्रमुख डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के इस्तीफे के लिए तैयार रहना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो इसके चौतरफा नकारात्मक प्रभाव होंगे। यह बात ध्यान में रखनी होगी कि सरकार को अभी भी मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद के लिए योग्य व्यक्ति की तलाश है। विवादित माहौल में नए गवर्नर की तलाश करना और डिप्टी गवर्नर पद के लिए एक अन्य स्तरीय अर्थशास्त्री की तलाश करने का अर्थ शायद यह होगा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक अन्य अधिकारी को गवर्नर बनाना और यह उम्मीद करना कि वह सरकार की बात सुनेगा। प्रभावशाली हलकों से यह आलोचना सुनने को मिलती आई है कि सरकार वरिष्ठï आर्थिक पदों पर तैनाती के लिए विदेशों से प्रत्याशी चुन रही है। ऐसे में योग्य प्रत्याशी का चयन करना भी मुश्किल काम होगा, हालांकि आंतरिक पदोन्नति के रूप में इस समस्या का समाधान तलाश किया जा सकता है।
 
ऐसे हालात में सबसे अच्छा जवाब यही है कि कुछ कूटनीतिक लेनदेन कर मामला हल किया जाए। बोर्ड को व्यवस्था में और अधिक नकदी के पक्ष में सलाह देनी चाहिए। क्या आरबीआई के पास देने लायक अधिशेष है या नहीं, ऐसे तकनीकी मसलों को परखने के लिए एक समिति नियुक्त की जानी चाहिए। सरकार को अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके उन सरकारी बैंकों को पूंजी देनी चाहिए जिनके पास नकदी की कमी है। ऊर्जित पटेल को भी यह याद करना चाहिए कि कैसे मनमोहन सिंह सन 1980 के दशक में बतौर गवर्नर एक फर्जी विदेशी बैंक को शाखा चलाने का लाइसेंस देने के खिलाफ थे। जब सरकार ने इस पर जोर दिया और बैंक लाइसेंसिंग का काम आरबीआई से छीनने की धमकी दी तो सिंह (जिन्होंने अपना इस्तीफा भी दे दिया था) ने संस्थागत क्षति होने देने के बजाय पीछे हटना ठीक समझा। फिलहाल पटेल के समक्ष वैसे ही हालात हैं।
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