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सरकार-आरबीआई विवाद धारा 7 से किसका फायदा?

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  November 08, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7 पिछले कुछ समय से काफी चर्चा में है। इसके इस्तेमाल को लेकर कई तरह की चिंता जताई गई जो काफी हद तक उचित भी प्रतीत होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने भले ही आरबीआई अधिनियम की धारा 7 का इस्तेमाल कर आरबीआई गवर्नर से मशविरा करने की बात कही हो लेकिन भविष्य में उसका इस्तेमाल कर केंद्रीय बैंक को निर्देश देना वित्तीय क्षेत्र के लिए सही नहीं होगा। ऐसा करने से देश के केंद्रीय बैंक और बैंकिंग नियामक की छवि को धक्का पहुंचेगा। 

 
आरबीआई अधिनियम की धारा 7 केंद्र सरकार को यह अनुमति देती है कि वह जनहित में जरूरी समझने पर समय-समय पर केंद्रीय बैंक  को निर्देश दे। इसके लिए अहम शर्त यह है कि ऐसे निर्देश आरबीआई गवर्नर से मशविरे के बाद जारी किए जाने चाहिए। अतीत में किसी सरकार ने इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया। ऐसा नहीं है कि आरबीआई और सरकार के बीच पहले मतभेद नहीं हुए। ऐसा हुआ है लेकिन उन्हें बिना धारा 7 का इस्तेमाल किए हल कर लिया गया।  इस धारा का प्रयोग करना जोखिम भरा है। एक बार सरकार ने यह सिलसिला शुरू कर दिया तो समस्या पैदा हो सकती है। अगर गवर्नर सरकार के कदमों से पहले सहमत नहीं था तो वह इस धारा के इस्तेमाल से हुए मशविरे में क्यों सहमत होने लगा? माना जा सकता है कि सरकार गवर्नर का मशविरा लेकर अपनी मर्जी का निर्देश जारी कर देगी। 
 
केवल दुर्लभ में दुर्लभतम मामलों में आरबीआई गवर्नर सरकार के विचार या उसकी सोच से सहमत होगा। अगर ऐसा होता है तो केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता को गहरा झटका लगेगा। सवाल यह पूछा जाएगा कि अगर धारा 7 के प्रयोग के पहले आरबीआई की राय अलग थी तो मशविरे के बाद उसने राय क्यों बदली? यह भी एक वजह है कि अतीत में आरबीआई के गवर्नरों ने ऐसे हालात ही नहीं बनने दिए कि सरकार धारा 7 के प्रयोग के बारे में सोचे भी। जब भी मतभेद होता, आरबीआई गवर्नर और वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री साथ बैठकर बात करते या फोन पर चर्चा करते। ऐसे मशविरे में गवर्नर अपना रुख स्पष्ट करते और सरकार भी अपना नजरिया रखती। अंत में आरबीआई सरकार के सुझाए रास्ते पर चलने को सहमत हो जाता। 
 
यह भी संभव है कि सरकार धारा 7 के तहत आरबीआई गवर्नर के साथ मशविरे के बाद अपने कदम पीछे खींच ले और कहे कि वह गवर्नर की व्याख्या से सहमत है। उस स्थिति में सरकार की विश्वसनीयता जाएगी और आलोचक कह सकते हैं कि वित्तीय बाजारों में व्याप्त अनिश्चितता से बचा जा सकता था। चाहे जो भी हो लेकिन धारा 7 का प्रयोग केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता, सरकार की विश्वसनीयता और वित्तीय बाजारों के सहज कामकाज, तीनों के लिए जोखिम भरा है। यही वजह है कि इतने वर्षों कभी इसका प्रयोग नहीं किया गया। 
 
परंतु धारा 7 का एक और पहलू है। हालांकि सरकार ने अतीत में इस प्रावधान का इस्तेमाल करके कोई निर्देश जारी नहीं किया है लेकिन सरकार को इसकी मौजूदगी का लाभ मिला है। क्योंकि  इस प्रावधान की मौजूदगी के चलते ही रिजर्व बैंक हमेशा दबाव में रहा और बातचीत के लिए आगे आया। ऐसे में सरकार के लिए इस धारा ने उद्देश्यपूर्ति का काम बखूबी किया है। यह अत्यंत विरोधाभासी है। आरबीआई अधिनियम में इस धारा को शामिल करने की वजह एकदम उलटी थी। इसे इसलिए शामिल किया गया था ताकि सरकार अगर आरबीआई पर अपना निर्णय थोपना चाहे तो उसकी जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। भारतीय रिजर्व बैंक का इतिहास के पहले वॉल्यूम (1935-1951) में धारा 7 को यह स्पष्ट करने के लिए एकदम वांछित माना गया कि जब सरकार गवर्नर की राय के विपरीत काम करे तो वह यह समझ ले कि संबंधित कदम की पूरी जिम्मेदारी भी सरकार को ही लेनी होगी। 
 
अतीत में कई मौकों पर आरबीआई पर यह दबाव डाला गया कि वह सरकार की इच्छा के मुताबिक काम करे लेकिन सरकार ने कभी ऐसे कदमों की जिम्मेदारी नहीं ली। मिसाल के तौर पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में 2008 से 2014 तक बैंकों की ओर से बेतहाशा ऋण जारी करने का निर्णय सरकार का था जिसके कारण बैंकों को भारी भरकम फंसे हुए कर्ज से जूझना पड़ा। सरकार ने इस बेतहाशा ऋण वितरण को लेकर केंद्रीय बैंक की चिंताओं को एकदम किनारे कर दिया। केंद्रीय बैंक चाहता था कि इन ऋणों का इस्तेमाल निवेश और वृद्घि को गति देने के लिए किया जाए। 
 
अगर आरबीआई ने उस वक्त आगे बढ़कर केंद्र की संप्रग सरकार से यह कह दिया होता कि अगर वह नियामकीय सहिष्णुता चाहती है तो वह निर्देश जारी करने के लिए धारा 7 का प्रयोग कर सकती है। अगर ऐसा किया गया होता तो बाजार में उथलपुथल मच गई होती लेकिन कम से कम केंद्रीय बैंक पर यह आरोप तो नहीं लगता कि उसने अत्यधिक नियामकीय सहनशीलता का परिचय दिया है।  क्या अब वक्त आ गया है कि यह समझ लिया जाए कि आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के मूल उद्देश्य का नकारा जाना ठीक नहीं? धारा 7 का निर्माण इसलिए किया गया था ताकि आरबीआई के हितों की रक्षा की जा सके। अगर केंद्रीय बैंक यह मानता है कि सरकार द्वारा मशविरे के बाद उस पर नीति को थोपना सही नहीं है तो उसे सरकार को धारा 7 का इस्तेमाल करके निर्देश जारी करने देना चाहिए ताकि वह अपने कदमों की जवाबदेही ले और इसके परिणाम भी भुगते। परंतु यह भी सच है कि धारा 7 के इस्तेमाल से आरबीआई साफ बच जाएगा और सरकार उसे अपनी पसंद के कदम उठाने के लिए मजबूर नहीं कर सकेगी। 
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