बिजनेस स्टैंडर्ड - क्या है कंपनी निदेशक मंडल की भूमिका?
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क्या है कंपनी निदेशक मंडल की भूमिका?

अजय शाह /  November 08, 2018

कंपनियों के निदेशक मंडल के सदस्यों की भूमिका पिछले काफी समय से चर्चा में है। इस विषय पर विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजय शाह

 
निदेशक मंडल यानी बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स के कामकाज और उसकी भूमिका में नए सिरे से रुचि ली जा रही है। बोर्ड के कुछ काम तो ऐसे हैं जो तमाम निजी संस्थानों और सरकारी एजेंसियों में एक समान हैं। बोर्ड का काम है प्रबंधन को हर स्तर पर जवाबदेह बनाना। सरकारी व्यवस्था में बोर्ड की प्रक्रिया के चार पहलुओं में संशोधन करना होता है। अगर संस्थान पर प्रबंधन का नियंत्रण होता है तो यह जोखिम है कि प्रबंधन आलस बरतेगा, भ्रष्ट होगा या बिना किसी व्यवस्थित नीति के काम करेगा। इसके लिए मजबूत व्यवस्था वही होगी जहां संगठन के संचालन का काम बोर्ड के पास हो। संचालन और प्रबंधन दो अलग-अलग बातें हैं। प्रबंधन रोजमर्रा का कामकाज देखता है लेकिन यह काम बोर्ड की निगरानी में किया जाता है। हम अक्सर बोर्ड को समरूप इकाई के रूप में देखते हैं जबकि यह दो अलग-अलग लोगों का समूह है। इसमें प्रबंधन निदेशक भी होते हैं। ये निदेशक मंडल के वे सदस्य होते हैं जो संस्थान के पूर्णकालिक प्रबंधक भी होते हैं। इनके अलावा गैर प्रबंधन निदेशक (एनएमडी) भी होते हैं जो बाहरी होते हैं। बोर्ड की प्रक्रिया यह है कि एनएमडी प्रबंधन पर दबाव बनाएं कि वह बेहतर प्रदर्शन करे। 
 
बोर्ड का अस्तित्व तीन समस्याओं की वजह से है। प्रबंधन हमेशा यह दावा करता है कि हालात ठीक हैं और किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं है। प्रबंधन अपने निर्णयों से प्रेम करता है जो अक्सर इस तरह लिए जाते हैं जो उनके लिए सुविधाजनक होते हैं। प्रबंधन विस्तृत ब्योरों में कहीं खो जाता है। प्रबंधन हमेशा यह दावा करता है कि चीजों को समझने के लिए उनका हिस्सा बनना पड़ता है। एनएमडी के पास तीन स्तर होते हैं जिनकी मदद से इन समस्याओं को हल किया जा सकता है। वे रिपोर्टिंग के ठोस तरीके निर्धारित करते हैं, जो संगठन का सही प्रदर्शन सामने लाते हैं। वे समीक्षा करते हैं और प्रदर्शन के लिए प्रबंधन को जिम्मेदार ठहराते हैं। वे संगठन की नीति तैयार करने में प्रत्यक्ष योगदान करते हैं। वे संगठन का वह डिजाइन तैयार करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं जिसके जरिये नीति को आगे बढ़ाया जाता है। 
 
इन कारकों के काम करने के लिए बोर्ड में एनएमडी का बहुमत होना आवश्यक है। यह भी जरूरी है कि चेयरमैन स्वयं मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) न हो। एक अच्छे बोर्ड ढांचे में एक सीईओ, तीन डिप्टी और कम से कम पांच एनएमडी होते हैं। इस तरह बोर्ड कुल मिलाकर नौ सदस्य होते हैं। या फिर एक सीईओ, दो डिप्टी और कम से कम चार एनएमडी के अलावा सात सदस्य बोर्ड में होते हैं। आदिम किस्म के देशों में तानाशाहों का शासन होता है। एक उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता कई मस्तिष्कों के बीच बंटी रहती है। इसके परिणाम अधिक बेहतर होते हैं। इसी प्रकार अगर तानाशाही वृत्ति का सीईओ हो तो भी सात या नौ सदस्यों के बोर्ड में अधिकार वितरण अच्छे नतीजे देता है। सात या नौ सदस्य मिलकर सोचते हैं, बहस करते हैं और ऐसे में वे किसी एक व्यक्ति से बेहतर नतीजे दे सकते हैं। एक मजबूत संस्थान की यही पहचान है कि उसका सीईओ संस्थान के बारे में बात करते वक्त 'मैंÓ का प्रयोग नहीं करता। किसी देश को सत्ता में साझेदारी की बुनियादी समझ विकसित करने में कई दशक का वक्त लग जाता है। इसी प्रकार किसी संगठन के लिए भी यह काम सीखना मुश्किल है जहां कई दिमाग मिलकर निर्णय लें। 
 
ये तमाम विचार एक सरकारी संस्थान में चार घुमावों के साथ नजर आते हैं।  पहला, एनएमडी के लिए सरकारी व्यवस्था में प्रबंधन को जवाबदेह ठहराना मुश्किल होता है। वहां वित्तीय प्रदर्शन का तर्क काम नहीं करता। आईएलऐंडएफएस के बोर्ड के लिए राजस्व, बाजार हिस्सेदारी, मुनाफा, इक्विटी पर रिटर्न और शेयर कीमत आदि के रूप में गिरावट का आकलन करना आसान था। इसके विपरीत बोर्ड के लिए भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड के प्रदर्शन का आकलन कर पाना मुश्किल है। इसलिए सेबी के बोर्ड को गुणात्मक और मात्रात्मक आकलन तय करने के लिए काफी प्रक्रियाओं की स्थापना करनी होगी। 
 
अगर आरबीआई केवल मौद्रिक नीति पर काम करे तो संभव है कि वह अपने प्रदर्शन का आकलन मुद्रास्फीति के लक्ष्य से विचलन के आधार पर कर सके। किसी संस्थान को तभी जवाबदेह ठहराया जा सकता है जबकि उसका लक्ष्य सहज और सामान्य हो। भ्रामक और विरोधाभासी लक्ष्य जवाबदेही की दृष्टि से अच्छा नहीं होता है और उसके लिए बोर्ड को बहुत सक्रिय होना पड़ता है। दूसरा, एक निजी संस्थान में मुनाफे की प्रेरणा देने वाले कारक प्रभावी होते हैं। बोर्ड सीईओ को मुनाफे में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार मानता है और सीईओ लागत को न्यूनतम करने का काम करता है। एक सरकारी संस्थान में मुनाफे की प्रेरणा नहीं होती और अधिकारों के मनमाने इस्तेमाल की प्रेरणा से संगठनात्मक ढांचा खराब होता है। बोर्ड को संगठनात्मक ढांचे में सीधी रुचि लेनी चाहिए और हर विभाग की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। लागत में कमी और विधि सम्मत व्यवहार तय करना बोर्ड का काम है। 
 
तीसरा, एक संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी निजी व्यक्ति को केवल कानूनी शक्तियों का प्रयोग करके ही रोका जा सकता है। यह कानूनी विधायी शक्तियों से आता है। परंतु नियामकों के पास कानून या नियमन तैयार करने का अधिकार होता है। इसके तहत निजी व्यक्तियों को भी विवश किया जा सकता है। यह एक विशिष्ट स्थिति है जहां राज्य की शक्ति निर्वाचित व्यक्तियों को हस्तांतरित की जाती है। इन निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए राजनेता के रूप में व्यवहार करके बाजार में विभिन्न प्रतिद्वंद्वियों को प्रश्रय देने लगता है। वे आलस कर सकते हैं और भ्रष्टाचार कर सकते हैं।
 
इस समस्या को हल करने के लिए सभी नियमन बनाने का काम बोर्ड के पास होना चाहिए। नियमन बनाने वाली परियोजना की शुरुआत के पहले बोर्ड की मंजूरी की आवश्यकता जरूरी है। स्टाफ को एक औपचारिक, पारदर्शी और मशविरे वाली प्रक्रिया तैयार करनी चाहिए। इसकी सहायता से नियमन तैयार किया जाना चाहिए। दस्तावेजीकरण का यह काम होने के बाद बोर्ड में इस पर दोबारा चर्चा होनी चाहिए और नियमन को मंजूरी दी जानी चाहिए।  चौथा, नामित निदेशकों का मसला। कई सरकारी संस्थानों में नामित निदेशक होते हैं। मोटे तौर पर यह व्यवस्था कारगर नहीं रही है। नामित निदेशक आमतौर पर खामोश और निष्क्रिय रहते हैं और केवल अपने मातृ संगठन के हित को बढ़ावा देने के लिए ही पहल करते हैं। इससे मूल्यवर्धन नहीं होता है और यह व्यवस्था बदलनी चाहिए। 
 
(लेखक नई दिल्ली स्थित नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 
Keyword: company, board of directors,,
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