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मंदा है अचल संपत्ति का बाजार आने वाले दिनों में सुधार के आसार

संदीप कुमार /  November 08, 2018

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल हो या दूसरे बड़े शहर हों, अचल संपत्ति कारोबार की दिक्कतें कहीं भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इस उद्योग ने पिछले दो वर्ष में एक के बाद एक कई झटके झेले। सबसे पहले नोटबंदी आई, उसके बाद रेरा (रियल एस्टेट विनियमन एवं विकास अधिनियम) आया और आखिर में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने इसे परेशान कर दिया। इसके बाद भी रियल्टी उद्योग से जुड़े लोग आने वाले दिनों में कुछ सुधार देखने की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी थी तो उद्योग की उम्मीदें बढ़ गई थीं और ऐसा लग रहा था कि अचल संपत्ति के क्षेत्र में जल्द ही सुधार आएगा। लेकिन अलग-अलग कारणों से रियल्टी की हालत पतली होती गई और इस समय भी इससे जुड़ी अनिश्चितताएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं। जिस अचल संपत्ति उद्योग को कभी बेनामी धन को ठिकाने लगाने का बड़ा जरिया माना जाता था, वहां नोटबंदी के बाद काला पैसा आना बिल्कुल रुक गया। बाजार से नकदी बाहर हो गई तो संपत्तियों के दाम भी धड़ाम हो गए। रेरा आने के बाद तो एक परियोजना की रकम का इस्तेमाल दूसरी परियोजनाओं में होना भी बंद हो गया।

 
हालांकि इन घटनाओं से रियल्टी उद्योग पहले के मुकाबले साफ और कुछ पारदर्शी हुआ, लेकिन कई परियोजनाएं लटक गईं। अलबत्ता वास्तविक ग्राहकों की कमी कभी नहीं रही। कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) की भोपाल इकाई के प्रवक्ता और अचल संपत्ति कारोबारी मनोज सिंह मीक ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'राजधानी भोपाल में ही इस समय तकरीबन 6,000 फ्लैट तैयार हैं और ग्राहकों का इंतजार कर रहे हैं। इसी तरह 30,000 से अधिक फ्लैट निर्माणाधीन भी हैं।' भोपाल जैसे शहरों में अचल संपत्ति को अब भी निवेश का जरिया नहीं माना जाता। यह बाजार असल में जरूरतमंद ग्राहकों का बाजार है और उस लिहाज से फ्लैटों की यह तादाद कम नहीं कही जा सकती। 
 
रियल्टी उद्योग जीएसटी को अपना तो चुका है, लेकिन उसको लेकर शिकायतें कम नहीं हैं। मीक कहते हैं कि जीएसटी 'एक राष्टï्र एक कर' की अवधारणा पर खरा नहीं उतरता। पहले माना जा रहा था कि जीएसटी लागू होने पर स्टांप शुल्क की व्यवस्था खत्म हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। स्टांप शुल्क में लगातार बढ़ोतरी और अब जीएसटी के बाद पूरा बोझ ग्राहकों पर ही पड़ रहा है। जीएसटी अचल संपत्ति क्षेत्र पर लागू नहीं है लेकिन वर्क कांट्रैक्ट पर 12 फीसदी जीएसटी चुकाना पड़ता है। 
 
क्रेडाई, भोपाल के अध्यक्ष वासिक हुसैन कहते हैं कि राज्य में 11 फीसदी स्टांप शुल्क और 12 फीसदी जीएसटी लगाया जाता है यानी 23 फीसदी कर। इस तरह 20 लाख रुपये का मकान खरीदने पर ग्राहक को 4.60 लाख रुपये इन्हीं दोनों पर खर्च करने पड़ते हैं। हुसैन कहते हैं कि ऐसे मार्जिन पर तो कोई कारोबार सफल हो ही नहीं सकता। भोपाल जैसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले शहर में यह छोटी रकम नहीं है। वह कहते हैं कि जवाहरलाल नेहरू नैशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन (जेएनएनआरयूएम) के दौर में स्टांप शुल्क को घटाकर 5 फीसदी करने की बात कही गई थी, लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ। आने वाले दिनों में अचल संपत्ति क्षेत्र जीएसटी के दायरे में आया तभी प्रॉपर्टी की कीमतें कुछ हद तक आकर्षक हो सकती हैं। 
 
भोपाल जैसे शहरों में पहले सिंगलेक्स, ड्यूप्लेक्स जैसे मकानों की ही मांग थी, जो जमीन पर बने हों। चार मंजिल तक की लोराइज इमारतें भी थीं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम थी। वर्ष 2009-10 के बाद से यहां मिडराइज (छह मंजिला) इमारतों का चलन तेजी से बढ़ा। इससे रिहायशी इमारतों की संख्या अचानक बहुत बढ़ गई, जिसका उलटा असर हुआ। बाजार भी कई वजहों से मंदी का शिकार हो गया और खरीदार नदारद हो गए।  जानकारों का कहना है कि भोपाल में आवासीय परिसंपत्तियों का द्वितीयक बाजार यानी पुरानी संपत्तियां बेचने या किराये पर उठाने का बाजार नई संपत्तियों के बाजार की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। उस पर मंदी का कोई असर ही नहीं है। भोपाल के बड़े बिल्डरों में शुमार चिनार ग्रुप के निदेशक सुनील मूलचंदानी कहते हैं कि मंदी ने मोटे तौर पर 30 लाख रुपये या इससे अधिक मूल्य की परिसंपत्तियों को ही प्रभावित किया है। वह कहते हैं कि 20 लाख रुपये से कम मूल्य वाली परियोजनाओं की अब भी अच्छी मांग है, लेकिन दिक्कत यह है कि शहरी इलाके में इस श्रेणी में बहुत अधिक परियोजना नहीं हैं। ऐसी गिनी-चुनी परियोजनाएं चल रही हैं और उन्हें अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है।
 
परियोजनाओं की लागत बढऩे और फ्लैट महंगे होने के लिए वह काफी हद तक कलेक्टर गाइडलाइन के तहत होने वाले इजाफे को वजह मानते हैं। मूलचंदानी कहते हैं कि वर्ष 2012 के बाद से कलेक्टर गाइडलाइन दरों में सालाना औसतन 12 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई है। इसने परिसंपत्ति कीमतों को बहुत हद तक प्रभावित किया है। कई स्थानों पर वास्तविक कीमत कम है और कलेक्टर गाइडलाइन में दरें बहुत ज्यादा हैं, जिससे हालात काफी पेचीदा हो गए हैं। मूलचंदानी कहते हैं कि भोपाल में वाणिज्यिक परिसंपत्तियों का बाजार अच्छा है क्योंकि इनकी उपलब्धता कम है और मांग बहुत अधिक। भोपाल के प्रमुख इलाकों में कलेक्टर गाइडलाइन दरों की बात करें तो महाराणा प्रताप नगर (एमपी नगर) जोन 1 में आवासीय और वाणिज्यिक दोनों तरह की जमीन 1.20 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर उपलब्ध है। अरेरा हिल्स इलाके में यह दर क्रमश: 66,000 तथा 99,000 रुपये प्रति वर्गमीटर है और मानसरोवर कॉम्प्लेक्स में आवासीय प्रॉपर्टी 85,000 रुपये तथा वाणिज्यिक परिसंपत्ति 1,27,500 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर उपलब्ध है।
 
यह भी सच है कि रेरा के आगमन के बाद अचल संपत्ति उद्योग को फायदा पहुंचाा है। इसमें स्थिरता आई है क्योंकि किसी भी परियोजना के लिए जुटाई रकम का दुरुपयोग बंद हो गया है। इतना ही नहीं, इससे परियोजनाओं के समय पर पूरा होने की संभावना काफी बढ़ गई है। हालांकि मध्य प्रदेश के संपत्ति बाजार में पेच बहुत हैं, लेकिन लगभग सभी बड़े कारोबारी इस बात पर एकमत हैं कि प्रदेश में नई सरकार आने के बाद कारोबारी रुझान में सुधार देखने को मिल सकता है। मीक कहते हैं कि सरकार किसी भी पार्टी की हो, लेकिन नई सरकार बनने से एक खास किस्म की ऊर्जा देखने को मिलती है जो इस कारोबार को गति प्रदान कर सकती है। हुसैन कहते हैं कि कारोबारी मिजाज में पहले की तुलना में कुछ सुधार दिख रहा है लेकिन उसके लिए कोई बाहरी कारक जिम्मेदार नहीं है। वह कहते हैं कि मांग में जो भी सुधार देखने को मिल रहा है या जो भी नए फ्लैट, प्रतिष्ठïान आदि बिक रहे हैं, उनके पीछे बाजार के कारक ही काम कर रहे हैं। बिल्डर ग्राहकों के बोझ में कुछ हिस्सा अपने ऊपर ले रहे हैं, जिससे नए मकान बिक पा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश में कुल 1957 आवासीय परियोजनाएं रेरा में पंजीकृत हैं। राजधानी भोपाल में 300 से अधिक आवासीय परियोजनाएं चल रही हैं। 
Keyword: real estate, property, GST, RERA, madhya pradesh,,
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