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कृषि कारोबार कर रहीं एफपीसी कंपनियां दूर कर सकती हैं संकट

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  November 06, 2018

किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी) का प्रसार जितनी तेजी से हो रहा है वह इन कंपनियों के प्रति किसानों के बढ़ते विश्वास का स्पष्ट संकेत है। इससे पता चलता है कि किसानों को एफपीसी के जरिये अपनी आय में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।  वर्ष 2010 में महज 70 की संख्या में मौजूद एफपीसी की तादाद अब बढ़कर करीब 1,050 हो चुकी है जो सालाना 44 फीसदी की चक्रवृद्धि बढ़ोतरी को दर्शाता है। इन छोटी कंपनियों में से करीब आधी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में ही मौजूद हैं। बाकी जगहों पर एफपीसी का रफ्तार पकडऩा अभी बाकी है। वैसे कृषि के लिहाज से प्रगतिशील राज्यों में एफपीसी की संख्या धीरे-धीरे बढऩे लगी है। 

 
एफपीसी का मुख्य कार्य सदस्य किसानों की तरफ से कारोबार करना है। वे अपनी सदस्य संख्या और कुशल प्रबंधन के चलते लाभ की स्थिति में होती हैं। संगठित समूह होने से इन कंपनियों की कृषि उत्पादों की खरीद एवं सेवाओं में मोलभाव की क्षमता अधिक होती है। इससे लेनदेन की लागत भी कम होती है और वे बड़े बाजारों तक अपनी पहुंच बना लेती हैं। वे निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के साथ भागीदारी के लिए भी अधिक सक्षम होती हैं। आज के समय में कृषि के लगभग सभी क्षेत्रों और बागवानी, पौधरोपण, दुग्धपालन, मुर्गापालन और मत्स्यपालन जैसे सहयोगी क्षेत्रों में एफपीसी काम कर रही हैं। यह काफी अहम है कि उनमें से करीब 25 फीसदी कंपनियां फसलों की कटाई के बाद के प्रसंस्करण एवं मूल्य-संवद्र्धन कार्यों से जुड़ी हुई हैं। उनमें से कुछ कंपनियां ऑर्गेनिक उत्पादों के कारोबार से भी जुड़ी हुई हैं जिनकी बाजार में ऊंची कीमत मिलती है।
 
इन नवोन्मेषी संस्थाओं का उदय होने का यह मतलब नहीं है कि भारतीय कृषि का निगमीकरण शुरू हो गया है। हालांकि यह कॉर्पोरेट संस्कृति और कृषि क्षेत्र में पेशेवर प्रबंधन के आगाज की ओर निश्चित रूप से इशारा करता है। संकल्पना के स्तर पर एफपीसी असल में सहकारी समितियों और निजी कंपनियों का मिला-जुला स्वरूप हैं जिसमें दोनों की खासियत स्वीकार की गई हैं लेकिन खामियों को तिलांजलि दी गई है। जहां भागीदारी, संगठन और सदस्यता का ढांचा काफी हद तक सहकारी समितियों से मेल खाता है, वहीं कारोबारी नजरिया और रोजमर्रा के कामकाज की प्रवृत्ति निजी कंपनियों की तरह है।
 
हालांकि एफपीसी में निजी क्षेत्र या सरकार की कोई इक्विटी होल्डिंग नहीं होती है। इन कंपनियों के शेयरों की शेयर बाजारों में खरीद-फरोख्त भी नहीं होती है। लिहाजा इन कंपनियों का स्वरूप कभी भी सार्वजनिक या सार्वजनिक लिमिटेड कंपनियों की तरह नहीं हो सकता है। ऐसे में शेयर बिक्री के जरिये किसी अन्य व्यावसायिक समूह द्वारा इनके अधिग्रहण का खतरा भी नहीं है। वर्ष 2002 में कंपनी अधिनियम 1956 में संशोधन कर नया खंड 9ए जोड़ा गया ताकि किसानों के लिए ऐसी कंपनियों के गठन का प्रावधान किया जा सके। इसी नियम के तहत इन कंपनियों का पंजीकरण भी किया जाता है।
 
एफपीसी को लघु किसान कृषि-व्यवसाय कंसोर्टियम और नाबार्ड जैसी एजेंसियों के जरिये समर्थन दिया जाता है। केंद्र एवं कुछ राज्य सरकारें भी एफपीसी की वृद्धि के लिए मददगार नीतिगत परिवेश मुहैया कराने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि इस तरह के कदमों की अब भी जरूरत है ताकि जमीनी स्तर के किसान संगठनों का प्रभावी दस्ता बनाया जा सके। इंडियन जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के अगस्त 2018 के अंक में प्रकाशित अनिर्वाण मुखर्जी और उनके सहयोगियों के एक समीक्षात्मक लेख में जिक्र है कि कई मायनों में एफपीसी के साथ सहकारी समितियों की तरह बरताव नहीं होता है। सहकारी समितियों को मिलने वाली कई तरह की रियायतें, कर छूट, सब्सिडी और अन्य लाभों का दायरा अभी तक एफपीसी तक नहीं विस्तारित हो पाया है। अभी कुछ समय पहले ही उर्वरक मंत्रालय ने खाद निर्माताओं को सलाह दी है कि वे सहकारी समितियों के लिए निर्धारित मानकों की ही तर्ज पर एफपीसी को भी अपनी डीलरशिप आवंटित करें। 
 
किसानों के कारोबारी प्रतिष्ठान के तौर पर गठित एफपीसी को वित्तीय संस्थानों से कार्यशील पूंजी जुटाने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है क्योंकि उनके पास जमानत देने लायक परिसंपत्ति भी नहीं होती है। उनकी शेयर पूंजी भी आम तौर पर कम ही होती है। हालांकि उनके शेयरधारक सदस्यों को किसानों की तरह रियायती दर पर बैंक कर्ज लेने की सुविधा मिलती है लेकिन उनके सम्मिलित प्रयासों से बनी एफपीसी को इसी तरह की ब्याज छूट देने का प्रावधान नहीं है। इससे भी बुरी बात यह है कि बाकी क्षेत्रों में स्टार्टअप के लिए दी जा रही कई तरह की सरकारी सुविधाएं कृषि क्षेत्र की एफपीसी कंपनियों को नहीं मिलती हैं।
 
किसानों की भागीदारी वाली इन कंपनियों के साथ इस तरह का भेदभाव अस्वीकार्य है। इससे प्रतिस्पद्र्धी बाजार में इन कंपनियों की संपोषणीयता खतरे में पड़ जाती है। कृषि आय बढ़ाने में एफपीसी कंपनियों की भूमिका को देखते हुए सरकार को इन्हें भरपूर समर्थन देना चाहिए। कृषि लागत में कटौती, मूल्य-संवद्र्धन और कारगर मार्केटिंग तरीकों से ये कंपनियां कृषि क्षेत्र के लिए काफी मददगार हो सकती हैं। असल में, एफपीसी कृषि को आधुनिक बनाने, इसकी लाभपरक क्षमता बढ़ाने और कृषि क्षेत्र में व्याप्त असंतोष को दूर करने में एफपीसी बेहद अहम हो सकती हैं। 
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon,,
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