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देश के बुनियादी क्षेत्र का सूर्योदय

विनायक चटर्जी /  November 06, 2018

देश की कई प्रमुख परियोजनाओं का वित्त पोषण कर रही है जापान सरकार। भारत और जापान सरकार के रिश्ते के संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विनायक चटर्जी

 
भारतीय अर्थव्यवस्था पर चीन के प्रभाव को लेकर काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। बीते कुछ दशक के दौरान भारत और चीन के व्यापारिक रिश्तों का नाटकीय विस्तार और चीन से सस्ती वस्तुओं की आवक ने देश के औद्योगिक क्षेत्र को काफी प्रभावित किया है। देश में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जो चीन के आर्थिक मॉडल से प्रत्यक्ष प्रभावित नहीं हुआ हो। इसके बावजूद जब बुनियादी ढांचे की बात आती है तो हाल के वर्षों में चीन नहीं बल्कि जापान ने इस क्षेत्र के बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। अहमदाबाद-मुंबई बुलेट टे्रन परियोजना और बहुप्रशंसित दिल्ली मेट्रो जैसी परियोजनाओं में प्रत्यक्ष निवेश के साथ-साथ जापान ने देश की कई बुनियादी परियोजनाओं में निवेश प्रतिबद्धता जताई है। ऐसी खबरें भी नियमित अंतराल पर आती रहती हैं। परंतु इन सुर्खियों से परे वास्तविक आंकड़े कहीं अधिक स्पष्ट जानकारी देते हैं। जापान सरकार देश की कई प्रमुख बुनियादी परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में धन प्रदान कर रही है। 
 
वर्ष 2010-11 और 2016-17 के बीच देश को विदेशी सरकारों और बहुपक्षीय संस्थानों से 700 करोड़ डॉलर की जो बाहरी सहायता प्राप्त हुई, उसका करीब एक चौथाई हिस्सा जापान से आया। 165.9 करोड़ डॉलर की यह राशि, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक द्वारा जताई गई क्रमश: 131 करोड़ डॉलर और 141 करोड़ डॉलर की प्रतिबद्धता से कहीं अधिक है। यह नाटकीय बदलाव एक दशक से भी कम समय में हुआ है। वर्ष 2010-11 तक भारत को जापान की सहायता कुल मदद का बमुश्किल 7 फीसदी होती थी। यह विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक से बेहद कम थी। 
 
भारत को इस अवधि में जापान से जो सहायता मिली है, उसमें भी राशि से कहीं अधिक अहम है उसका समय। गत दशक के आखिरी वर्षों में बुनियादी क्षेत्र में निवेश में नाटकीय उतार-चढ़ाव देखने को मिला। बिजली संयंत्रों में ठहराव आ गया और सड़क परियोजनाएं रुक गईं। इस बात को लेकर चिंता उत्पन्न हो गई कि ये परियोजनाएं शायद कभी पूरी ही न होने पाएं। दूसरे शब्दों में कहें तो जापान का पैसा सही समय पर हमें मिला। यह कहना गलत होगा कि यह आर्थिक चक्र से अप्रभावित रहा है। परंतु यह निजी निवेश की तुलना में कम चक्रीय साबित हुआ है, कम से कम अब तक। 
 
जापान से आने वाले निवेश के समन्वय का काम जाइका (जापान इंटरनैशनल कोऑपरेशन एजेंसी) करती है। वर्ष 2008-09 से भारत में जाइका के कुल निवेश में 85 प्रतिशत बुनियादी क्षेत्र में आया है। इसमें से 64 प्रतिशत निवेश परिवहन में, 12 प्रतिशत पानी के क्षेत्र में और 9 प्रतिशत ऊर्जा क्षेत्र में आया है। इस धन का एक तिहाई हिस्सा देश के छह शहरों में मेट्रो परियोजनाओं में निवेश किया गया है। भारत अब जाइका से धन पाने वाला सबसे बड़ा देश है। जाइका जिन शर्तों पर ऋण देता है वे बेहद आकर्षक हैं। कई मामलों में तो ब्याज दर एक फीसदी से भी कम है। पुनर्भुगतान की अवधि दशकों तक विस्तारित है। परंतु एक नकारात्मक बात यह है कि ऐसे तमाम ऋण कुछ शर्तों के साथ आते हैं। शर्त के मुताबिक अक्सर अनुबंधों का एक खास हिस्सा जापानी कंपनियों को देना होता है। यह ऋण राशि के करीब 30 फीसदी के बराबर होता है। परंतु यह भी कतई अवांछित नहीं है क्योंकि ये कंपनियां अपने साथ ढेर सारी विशेषज्ञता लाती हैं। दिल्ली मेट्रो परियोजना का क्रियान्वयन जितनी तेजी से हुआ उससे हम इस बात को समझ सकते हैं। 
 
चीन के साथ तुलना स्वाभाविक है क्योंकि यह बात ध्यान देने लायक है कि भारत में जापान के निवेश का नाटकीय विस्तार एकदम निशंक है जबकि भारत में चीन के निवेश और व्यापार के साथ तमाम चिंताएं जुड़ी रहती हैं। इसका संबंध कुछ हद तक दोनों के रिश्तों की प्रकृति के अंतर से भी है। भारत और चीन का व्यापार, भारत और जापान के व्यापार की तुलना में कई गुना अधिक है। दिलचस्प बात है कि इसने भारत में जापान के निवेश को प्रभावित नहीं किया है। जापान के लिए यह काम नया नहीं है। सन 1960 के दशक से ही जापान निवेश, तकनीक हस्तांतरण और व्यापारिक सहायता की मदद से दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं की सहायता करता रहा है। सन 1980 और 1990 के दशक में जब शेष विश्व ने चीन पर ध्यान देना शुरू ही किया था, तब जापान चीन में सबसे बड़ा विदेशी निवेशक बन चुका था। निश्चित तौर पर दक्षिण पूर्वी एशिया से जापान के आर्थिक रिश्तों में जापान आगे था और बाकी के देश उसका अनुसरण कर रहे थे।
 
परंतु दिलचस्प बात यह है कि उन देशों और भारत में उसके निवेश में एक अंतर है। दक्षिण पूर्वी एशिया और चीन में उसका निवेश खाद्य, कपड़ा एवं वस्त्र, वाहन, रसायन, मशीनरी और धातु आदि क्षेत्रों में विस्तारित था। जैसा कि हमने पहले भी कहा भारत में जापान का निवेश कहीं अधिक ठोस था। यह मोटे तौर पर बुनियादी ढांचा क्षेत्र में किया गया निवेश था। इस बार राजनीतिक घटक भी एक अलग पहलू है। चीन के उदय में जादुई भूमिका निभाने के बाद जापान सरकार ने एशियाई क्षेत्र में चीन की आर्थिक और भूराजनैतिक भूमिका को संतुलित करने का प्रयास आरंभ किया। इस क्षेत्र में दोनों देशों की सरकारों को अपने हित एक जैसे प्रतीत होते हैं। क्या जापान का निवेश आने वाले दिनों में भारतीय बुनियादी ढांचा क्षेत्र की तस्वीर में और बड़ा बदलाव लाने वाला साबित होगा? दोनों देशों के बीच उच्च स्तर पर जिस तरह मित्रता बढ़ रही है, उसे देखते हुए तो इसका जवाब हां प्रतीत होता है।
 
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।)
Keyword: india, japan, economy,,
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