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कठिन समय

संपादकीय /  November 06, 2018

 विश्व व्यापार के लिए यह समय अत्यंत कठिनाई भरा है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह किसी तरह के तनाव के बिंदु से गुजर रहा है। वैश्वीकरण की व्यापक प्रवृत्ति जिसकी शुरुआत सन 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में हुई थी और जिसने सन 2000 के दशक के आरंभ में विश्व व्यापार संगठन में चीन के शामिल होने के साथ गति पकड़ी, अब उस पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। भविष्य पर नियंत्रण को लेकर दो बड़े रुझानों में टकराव देखने को मिल रहा है। पहला, बड़े वैश्विक व्यापार नेटवर्क की किफायत और स्थिरता ने व्यापारयोग्य वस्तुओं की कीमतों को अप्रत्याशित रूप से कम कर दिया और गुणवत्ता तथा उपलब्धता में इजाफा भी किया। दूसरी बात, राजनेताओं पर मतदाताओं का दबाव बना है कि वे व्यापार नीति में संशोधन करें ताकि रोजगारों का संरक्षण किया जा सके और नए रोजगार तैयार किए जा सकें। इस बीच बड़े क्षेत्रीय व्यापारिक धड़ों के साथ बातचीत चल रही है। यह सब शायद उस राजनीतिक पूंजी के शर्त पर हो रहा है जो अन्यथा सुधारों और विश्व व्यापार संगठन में नई जान फूंकने के काम में इस्तेमाल की जा सकती थी। 

 
दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत ने विश्व व्यापार के भविष्य के शिल्प को आकार देने का कोई खास प्रयास नहीं किया। बीते वर्षों में विश्व व्यापार संगठन में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। उसने सबसे अधिक महत्त्व अपने गैर किफायती हो चुके कृषि खरीद तंत्र को बचाने को दिया। इसके लिए उसने डब्ल्यूटीओ के नियमों तक को ताक पर रख दिया। जबकि इसके बजाय उसे किसानों की आय बढ़ाने में सहयोग करने के लिए आधुनिक व्यवस्था अपनाने पर काम करना चाहिए। ऐसा करना डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुरूप भी है। इस सीमित रुख की कीमत भी स्पष्टï है। भारत विश्व व्यापार में अलग-थलग पड़ चुका है। विश्व व्यापार का अधिकांश हिस्सा मुक्त व्यापार समझौतों और क्षेत्रीय संगठनों मसलन यूरोपीय संघ, उत्तर अटलांटिक मुक्त व्यापार समझौते, दक्षिण एशियाई देशों के संघ आदि से संचालित है। भारत इनमें से किसी का सदस्य नहीं है। नए व्यापारिक तंत्र के साथ रिश्ता कायम न कर पाने की भारत की अक्षमता भी स्पष्टï है। निर्यात में हालिया और अपेक्षाकृत अस्थिर चढ़ाव के बाद भारत का निर्यात वर्ष 2014 के बाद से ही सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में लगभग स्थिर रहा है। यह नितांत अस्वाभाविक है। दशकों में कभी भारतीय निर्यात में इस प्रकार का ठहराव देखने को नहीं मिलेगा। इस पूरी अवधि में अधिकांश वक्त रुपया अधिमूल्यित रहा है। परंतु यह इस ठहराव की इकलौती वजह नहीं हो सकती। 
 
कई जटिल समस्याएं भी हैं जो अब सामने आ चुकी हैं। उनमें सबसे अहम हैं भारतीय राज्य और निजी क्षेत्र दोनों की नए बाजार और नए कारोबारी तंत्र में प्रवेश करने की अनिच्छा। उदाहरण के लिए भारत नई कारोबारी व्यवस्था को आकार देने की दिशा में क्यों नहीं बढ़ रहा है? विश्व व्यापार वार्ताओं में चीन के अलग-थलग पडऩे के बाद भारत के पास ऐसा करने का अवसर है। सितंबर के आखिर में यूरोपीय संघ, अमेरिका और जापान के व्यापार मंत्रियों की न्यूयॉर्क में बैठक हुई जहां अतिशय क्षमता और बाजार विरोधी सरकारी नीतियों के कारण उपजी विसंगतियों को दूर करने के साझा एजेंडा पर बात हुई। उन्होंने यह भी कहा कि वे डिजिटल संरक्षणवाद और जबरिया प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर भी ध्यान देना चाहते हैं। भविष्य के व्यापार को आकार देने वाले इन विषयों पर भारत क्या सोचता है? सरकार अपने हितों को बचाने और बढ़ावा देने के लिए क्या सोच रही है? केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय को इसका जवाब देना चाहिए।
Keyword: world trade,,
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