बिजनेस स्टैंडर्ड - धुंधली चादर से निजात पाने के लिए करनी होगी मशक्कत
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धुंधली चादर से निजात पाने के लिए करनी होगी मशक्कत

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  November 05, 2018

अपने आसपास की हवा को सूंघिए और फिर आपको पता चल जाएगा कि मैं किस बारे में बात कर रही हूं? तथ्य यह है कि पहले की तुलना में इस साल जहरीली हवा को लेकर लोगों में अधिक जागरूकता देखी जा रही है। कोई भी इस समस्या को खारिज नहीं करता है और यह कोई छोटी बात नहीं है। सच तो यह है कि पिछले साल तक भी वायु प्रदूषण से लोगों के मरने की बात को लेकर फुसफुहाट भरे स्वर सुनाई देते थे। मैं यह बात इसलिए कह रही हूं कि हमें अदालतों के भीतर और बाहर इन दलीलों को चुनौती पड़ी थी।

 
यह भी एक तथ्य है कि स्वास्थ्य पर प्रदूषण के प्रभावों को लेकर खुलकर बातें होने लगी हैं लेकिन अब भी इस दिशा में उठाए जाने वाले कदमों को लेकर कम सक्रियता ही दिख रही है। हालांकि यह नहीं कह सकते हैं कि इस दिशा में कुछ हो ही नहीं रहा है लेकिन जो भी होता है वह लंबी जद्दोजहद के बाद होता है। हरेक समाधान का यह कहकर विरोध किया जाता है कि इससे समस्या का छोटा हिस्सा, महज एक फीसदी ही प्रभावित होता है। इसके अलावा सार्वजनिक स्वास्थ्य के इस संकट से निपटने की तीव्रता और गंभीरता को बढ़ाने की मंशा भी नहीं दिखती है।
 
सवाल है कि क्या हुआ है और क्या किए जाने की जरूरत है। सबसे पहले कुछ बुनियादी बातों पर गौर करते हैं। दिल्ली में प्रदूषण के खुद के स्रोत हैं जिन पर काबू पाने की जरूरत है। प्रदूषण के ठंड के मौसम में ही बढऩे का कारण केवल पंजाब एवं हरियाणा के किसानों का पराली जलाना ही नहीं है। ठंड के दौरान मौसम के प्रतिकूल हालात होने से वातावरण में ठंडी हवा का आवरण बन जाता है, नमी के चलते प्रदूषणकारी तत्त्व बढ़ जाते हैं और कम प्रवाह होने से प्रदूषित हवा फैल भी नहीं पाती है। यही वजह है कि प्रदूषण के स्रोत पूरे साल बने रहने के बावजूद ठंड के समय प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ जाता है।
 
दूसरा, कुछ कदम उठाए गए हैं और उन्हें आगे भी जारी रखना होगा। इस साल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में प्रदूषण नियंत्रण के लिए के लिए एक समग्र कार्य योजना बनाई गई है जिसमें प्रदूषण के  सभी स्रोतों पर करीबी नजर रखी गई है और जिम्मेदार एजेंसियों के लिए समयसीमा भी तय की गई है। अब हमें इसे जारी रखना चाहिए। हमारे पास प्रदूषण फैलाने वाले कारकों के बारे में साक्ष्य भी हैं लिहाजा हमें 'दूसरे' पर दोष लगाने में समय गंवाने की जरूरत नहीं है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने हाल ही में दिल्ली और इसके पड़ोसी इलाकों के लिए उत्सर्जन संबंधी आंकड़े जारी किए हैं। यह पहले से ही ज्ञात उस बात की पुष्टि करता है कि दिल्ली शहर और एनसीआर में प्रदूषण की मुख्य वजह वाहनों की भीड़ है। दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण में वाहनों के उत्सर्जन का योगदान 40 फीसदी से अधिक है।
 
वाहनों की श्रेणी में भी भारी वाणिज्यिक वाहन (ट्रक) और टैक्सी जैसे निजी वाणिज्यिक वाहनों का प्रमुख अंशदान है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि ओला या उबर की एक टैक्सी औसतन 400 किलोमीटर का सफर करती है जबकि निजी वाहनों की औसत दूरी 55 किलोमीटर प्रतिदिन की है। राहत की बात यह है कि अधिकांश वाहन टैक्सी सीएनजी पर चलते हैं, डीजल पर नहीं। लेकिन अपेक्षाकृत साफ ईंधन पर चलने के बावजूद प्रदूषण में इनका शुद्ध अंशदान अधिक है। इससे दिल्ली के भीतर ट्रकों का प्रवेश रोकने की जरूरत है और उसके अलावा बसों एवं मेट्रो सेवाओं का संयोजन कर निजी वाहनों एवं टैक्सी की संख्या में भी कटौती करने पर ध्यान देना होगा। इसका यह भी मतलब है कि टैक्सी एवं ऑटो रिक्शा जैसे वाहन स्वच्छतम ईंधन एवं तकनीक का इस्तेमाल करें क्योंकि वे रोजाना लंबी दूरी तय करते हैं जिससे प्रदूषण फैलाने की आशंका भी अधिक रहती है। इस पहलू से सभी परिचित हैं और अब इस दिशा में कार्रवाई की जरूरत है। 
 
प्रदूषण फैलाने वाला दूसरा प्रमुख स्रोत उद्योग है। वर्ष 2010 से 2018 के दौरान प्रदूषण में इसकी हिस्सेदारी 48 फीसदी रही है। इसकी वजह यह है कि दिल्ली-एनसीआर में हजारों छोटी औद्योगिक इकाइयां हैं जो पहले पेट कोक और अब कोयले का इस्तेमाल करती हैं। अदालत में कई महीनों तक चली लड़ाई के बाद इस इलाके में पेट कोक का इस्तेमाल प्रतिबंधित हो चुका है लेकिन फीडस्टॉक के तौर पर इसका इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को इससे छूट मिली हुई है। इसके लिए किसी लाइसेंस के बगैर आयात करने की भी छूट थी। लेकिन अब फिर से पेट कोक पर पाबंदी लग गई है। इसके अलावा इन इकाइयों के लिए सल्फर डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड के मानक भी तय कर दिए गए हैं। इसके लिए अदालत में छह महीनों तक बहस का दौर चला था। लेकिन इन मानकों के तय होने के बावजूद उनके अनुपालन की दिशा में कुछ नहीं हो रहा है। इसे बदलने की जरूरत है।
 
हालांकि कुछ अच्छी खबरें भी हैं। मोएज रिपोर्ट कहती है कि आवासीय क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में पिछले आठ वर्षों में आधी गिरावट आई है। शहर के गरीब परिवारों तक एलपीजी सिलेंडर की पहुंच होना इसकी अहम वजह है।  इसका मतलब है कि कुछ कर पाने की गुंजाइश बनी हुई है लेकिन हमें ध्यान रखना होगा कि उठाए जाने कदम संकट की गंभीरता के अनुरूप हों। कुछ बसों या कुछ उद्योगों में प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होने भर से हवा साफ नहीं होगी। हमें स्वच्छ दहन की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत है जो वर्ष 2000 की शुरुआत में सभी सार्वजनिक वाहनों के लिए सीएनजी को अनिवार्य किए जाने की तरह बड़े पैमाने पर होना चाहिए। यह संपूर्ण एवं समग्र स्तर पर होना चाहिए। उससे कम पर बात नहीं बनेगी। केवल उसी स्थिति में हम साफ और बेहतर हवा में सांस ले पाएंगे। हमारे प्रयास इसी दिशा में होने चाहिए। अगली सर्दियों तक हमें इसी पर ध्यान केंद्रित रखना होगा तभी अच्छी खबर मिलेगी। 
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