बिजनेस स्टैंडर्ड - वाई-फाई सुधार की हो गई शुरुआत
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वाई-फाई सुधार की हो गई शुरुआत

श्याम पोनप्पा /  November 05, 2018

5 गीगाहट्र्ज नियमन वही हैं जो शुरुआत करने के लिए आवश्यक थे। परंतु हमें इससे कहीं अधिक सुधारों की आवश्यकता है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने वाई-फाई को लेकर कुछ शानदार पहल की हैं। इसके 5 गीगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम के नियमन में वह सबकुछ है जो हम सब चाहते थे। परंतु यह केवल पहला कदम है। इसके लाभ प्राप्त करने के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। हमारे पास अब एक नीति है जो प्रभावी ब्रॉडबैंड वाई-फाई हॉटस्पॉट को सक्षम बनाती है और अन्य देशों की तरह हमारे देश में भी दूरदराज इलाकों तक संचार को व्यवहार्य बनाने के लिए जरूरी बदलाव की सुविधा देती है। दुनिया के अन्य देशों में स्मार्ट फोन ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा वाई-फाई पर होता है। हाल के दिनों की बात करें तो अमेरिका में यह 70 से 75 प्रतिशत, जापान में 83 प्रतिशत और जर्मनी में 87 प्रतिशत से अधिक रहा। ऐसे में लाइसेंसशुदा स्पेक्ट्रम से ट्रैफिक कम होता है और वह दोबारा इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होता है। हमारे पास 5 मेगाहट्र्ज बैंड में वाई-फाई के लिए 380 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम के अलावा 605 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम है। अगर अमेरिका की तरह बाहरी इस्तेमाल पर से रोक समाप्त कर दी जाए तो वाई-फाई की क्षमताओं में भी इजाफा होगा। ये नियमन आर्थिक गतिविधियों में इजाफा ला सकते हैं और संचार से जुड़े फायदे तो होंगे ही। परंतु इससे आयात बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है जो तेल कीमतों और तकनीक आयात के चलते पहले ही बढ़ा हुआ है।
 
नेटवर्क इंस्टॉलेशन में बढ़ी हुई गतिविधियां और उससे जुड़े लाभ इस बात पर निर्भर करते हैं कि नीतियों और व्यवहार के रूप में हम उन्हें कितना समर्थन दे पाते हैं। यह बात संचार क्षेत्र के साथ-साथ बिजली और वित्त क्षेत्र पर भी उतनी ही लागू होती है। विस्तार से बात करें तो संचार क्षेत्र में अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप आदि प्रमुख बाजारों में बिना लाइसेंस के बैंड पर विचार कीजिए। उदाहरण के लिए 60 गीगाहट्र्ज बैंड को लेते हैं। अमेरिका में फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (एफसीसी) ने इस बैंड में 14 गीगाहट्र्ज को वायरलेस फाइबर के लिए लाइसेंसमुक्त कर दिया था जिसका नाम था विजिग। भारत ने ऐसा नहीं किया है। इसके बजाय मंत्रालय के अधीन आने वाली वायरलेस प्लानिंग ऐंड कोऑर्डिनेशन विंग ने अक्टूबर में अधिसूचना जारी कर केवल 500 मेगाहट्र्ज (61-61.5 गीगाहट्र्ज) स्पेक्ट्रम को लाइसेंस मुक्त किया। विदेशों में इस बैंड का इस्तेमाल 400 से 700 मीटर के कनेक्शन में किया जाता है। उक्त उपकरण 2,000-2,500 मेगाहट्र्ज के लिए वायरलेस फाइबर लिंक की भांति काम करते हैं। हमारे यहां इनका इस्तेमाल नहीं हो सकता। छोटी दूरी के वाई-फाई और घरों तथा कार्यालयों तथा औद्योगिक कॉम्प्लेक्स में तार वाले नेटवर्क के लिए फाइबर या केबल की आवश्यकता होगी।
 
संभवत: परिचालकों के विरोध के कारण यह नीतिगत लिंक नदारद है। उपभोक्ता नेटवर्क ट्रैफिक परिचालकों को इस हद तक किनारे करता है ताकि वायरलेस इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (आईएसपी) तथा अन्य उद्यमी शुल्क वसूल कर सकें। जबकि परिचालक पहले ही स्पेक्ट्रम के लिए काफी प्रीमियम दे चुके होते हैं। अगर लाइसेंस प्राप्त परिचालकों को वाणिज्यिक इस्तेमाल की इजाजत दी जाए तो संकट हल हो सकता है। यद्यपि आईएसपी को पहले की तरह ही परिचालकों की सहायता से काम करना होगा। एक अन्य विकल्प यह हो सकता है कि सार्वजनिक वायरलेस नेटवर्क को बिना लाइसेंस की पहुंच प्रदान की जाए। इसका परिचालन बीएसएनएल, भारतनेट, सीएससी आदि कर सकते हैं।
 
बिजली आपूर्ति, वित्त और स्थानीय विनिर्माण जैसे जुड़े हुए क्षेत्रों का माहौल भी स्थिर और महत्त्वपूर्ण वृद्धि के लिए आवश्यक है। इस संबंध में कुछ समस्याओं का निराकरण करना जरूरी है:
 
बिजली क्षेत्र में सचेत ढंग से अधिक वितरित नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान दिया जाना चाहिए और वाई-फाई, 5गीगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम के मुताबिक परिवर्तन कर नीतियों को और व्यवहार्य बनाया जाना चाहिए।
 
वित्तीय तंत्र और एनपीए पर ध्यान देने की आवश्यकता है। धोखाधड़ी और गड़बडिय़ों से कड़ाई से निपटते हुए अच्छे बुनियादी ढांचे का विकास और पोषण किया जाना चाहिए, इससे एनपीए की समस्या कम होगी। इस क्षेत्र में हालात अच्छे नहीं हैं अगर बच सकने लायक बुनियादी परियोजनाओं को नाकाम होने दिया जाता है तो इसके तमाम नकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।
 
घरेलू स्तर पर उपकरण बनाने से आयात कम करने में मदद मिलेगी। यह भविष्य में निहायत जरूरी होने वाला है क्योंकि हमारे बाजार का आकार काफी बड़ा है। जब तक हम आयात को संतुलित करने का तरीका नहीं तलाश कर लेते तब तक समस्या होती रहेगी।
 
इस बीच हम घाटे से जुड़ी मांग को कम करने को लेकर प्रतिबद्ध हैं। तेल कीमतें घटने, निर्यात बढऩे और चालू खाते के घाटे पर हमारी नजर है। यह दबाव अभी महीनों बल्कि वर्षों तक जारी रह सकता है। इसका असर वृद्धि पर भी पड़ेगा।  चालू खाते को लेकर वर्ष 2001 से 2016 तक के आंकड़ों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि कैसे पूंजी खाते और उसके घटकों, चालू खाते, सकल जमा पूंजी निर्माण एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि स्थायी पूंजी निर्माण के लिए अन्य राशि की तुलना में कहीं अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की आवश्यकता है।
 
पूंजी निर्माण पर एफडीआई का अप्रत्यक्ष प्रभाव देखने को मिला है जो चालू खाते को भी प्रभावित करता है। डेट पोर्टफोलियो आवक और अनिवासी जमा से चालू खाते की भरपाई होती है लेकिन यह प्रत्यक्ष तौर पर पूंजी निर्माण में सहायक नहीं होता। इंडोनेशिया में इस विषय पर अध्ययन किया गया कि चालू खाते का घाटा विनिमय दर को किस प्रकार प्रभावित करता है। पाया गया कि जब यह जीडीपी के 2 फीसदी के स्तर को पार कर जाता है तब विनिमय दर में चार माह के अंतराल के बाद 12 फीसदी की गिरावट आती है। भारत में ऐसे रिश्तों पर ध्यान देना नीति निर्माण के लिए अच्छा रहेगा।
 
इस बीच देश के तेज वृद्धि वाले क्षेत्र आर्थिक अस्थिरता से पीडि़त हैं। स्थायी वृद्धि के लिए उन्हें अधिक तार्किक बनाना होगा ताकि उत्पादक उपक्रमों से मुनाफा कमाया जा सके। प्रमुख घरेलू क्षेत्रों में बिजली, संचार और विमानन क्षेत्र शामिल हैं। इन क्षेत्रों में सॉफ्टवेयर और आईटी संबंधित सेवाओं की तरह बायपास नीतियां काम नहीं आएंगी क्योंकि ये सेवाएं घरेलू बाजार के लिए हैं। जब तक वृद्धि दर विदेशी पूंजी जुटाने लायक नहीं हो जाती है तब तक इनको आयात और निर्यात को संतुलित करते हुए मुनाफा कमाना होगा। निजी क्षेत्र और सरकारी क्षेत्र के सहयोग से 5 गीगाहट्र्ज जैसे वास्तविक सुधारों को अंजाम देकर भविष्य की राह निकाली जा सकती है।
Keyword: internet, wifi, 5g,,
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