बिजनेस स्टैंडर्ड - अगली बैठक भी होगी हंगामेदार!
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अगली बैठक भी होगी हंगामेदार!

ए के भट्टाचार्य / नई दिल्ली 11 04, 2018

19 नवंबर को होनी है बैठक

सरकार के प्रतिनिधि आरबीआई की बोर्ड बैठक में देंगे प्रस्तुति

बिजनेस स्टैंडर्ड अगली बैठक भी होगी हंगामेदार!भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के केंद्रीय बोर्ड की 19 नवंबर को प्रस्तावित बैठक के भी पिछली बैठक की ही तरह हंगामेदार रहने के आसार हैं। गत 23 अक्टूबर को मुंबई में हुई पिछली बोर्ड बैठक ने वित्त मंत्रालय और आरबीआई के आपसी मतभेदों को खुलकर सार्वजनिक कर दिया था। आरबीआई के बोर्ड में शामिल सरकार के प्रतिनिधि आगामी बैठक में वित्त मंत्रालय की तरफ से रखे गए सभी छह सुझावों को मानने के लिए केंद्रीय बैंक को राजी करने की कोशिश करेंगे। मंत्रालय ने गत 10 अक्टूबर को प्रेषित पत्र में रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल को ये सुझाव दिए थे। उस पत्र में आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए आरबीआई गवर्नर के साथ परामर्श का उल्लेख किया था।

वित्त मंत्रालय ने कॉर्पोरेट बॉन्ड की खरीद में एक कंपनी समूह के लिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेश की 20 फीसदी की सीमा हटाने का सुझाव भी दिया है। इसके अलावा 10 साल से कम परिपक्वता अवधि वाले ढांचागत कर्ज के लिए निर्धारित जोखिम संबंधी बाध्यताओं को हटाने, गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी), आवासीय वित्त कंपनियों और म्युचुअल फंड को पुनर्वित्त मुहैया कराने के लिए खास विंडो बनाने का सुझाव भी रखा गया। बैंकों के लिए 30 अरब डॉलर जुटाने के लिए एक सुविधा शुरू करने और आर्थिक पूंजीगत ढांचे को आरबीआई अधिनियम की जरूरतों के अनुरूप ढालने के लिए उसकी समीक्षा करने की बात भी मंत्रालय के पत्र में कही गई थी। 

समूचे घटनाक्रम से परिचित सूत्रों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि वित्त मंत्रालय की तरफ से परामर्श के लिए रखे गए अधिकांश मुद्दों पर आरबीआई गवर्नर की राय मेल नहीं खाती है। पटेल ने अपने जवाब में इसका जिक्र भी किया था। इसी वजह से 19 नवंबर को होने वाली बैठक में सरकार के प्रतिनिधि इन प्रस्तावों पर प्रस्तुतिकरण देने की तैयारी कर रहे हैं। बोर्ड में शामिल सरकारी प्रतिनिधि आरबीआई गवर्नर, उनकी टीम और समूचे बोर्ड को प्रस्तावों पर सहमत करने के लिए यह प्रस्तुति देंगे।

इन सुझावों के अलावा रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की कड़ी टिप्पणी का मसला भी बोर्ड की बैठक में उठ सकता है। आचार्य ने गत 26 अक्टूबर को अपने एक भाषण में चेतावनी दी थी कि सरकारें अगर केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं तो उसके गंभीर प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं। माना जा रहा है कि सरकारी प्रतिनिधि इस बैठक में आचार्य के भाषण के संदर्भ में औचित्य एवं इसकी सत्यता का प्रश्न खड़ा करेंगे।

आरबीआई बोर्ड की गत 23 अक्टूबर को हुई बैठक में भी वित्तीय सेवा विभाग के सचिव ने प्रस्तुति दी थी। उसमें उन्होंने आरबीआई गवर्नर को यह समझाने की कोशिश की थी कि आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत परामर्श के लिए भेजे गए सुझावों को उन्हें क्यों स्वीकार कर लेना चाहिए? हालांकि लंबे समय तक चली उस बैठक का कोई नतीजा नहीं निकल पाया था। 

अक्टूबर की शुरुआत में भेजे गए पत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य नहीं करने वाले बैंकों के लिए निर्धारित बेसल-3 मानकों के क्रियान्वयन से संबंधित सुझाव दिया गया था। इसके अलावा पूंजीगत बफर बनाना, पूंजी प्रचुरता मानकों को बेसल-3 मानकों से एक फीसदी ऊंचा रखने, त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई संबंधी मसौदे को उपयुक्त बनाने का भी जिक्र किया गया था। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाइयों (एमएसएमई) को दिए जाने वाले कर्ज के लिए उच्च-जोखिम भार और इन इकाइयों के कर्ज खातों के पुनर्गठन एवं परिशोधन के अवसर बढ़ाने का भी उल्लेख किया गया था।

आरबीआई बोर्ड बैठक के तीन दिनों के ही भीतर आचार्य ने अपने भाषण में रिजर्व बैंक की स्वतंत्रता को बचाने की जरूरत पर बल दिया था। इससे तनाव बढऩे की आशंका जताई जाने लगी थी लेकिन वित्त मंत्रालय ने गत 31 अक्टूबर को जारी बयान से इसे शांत करने की कोशिश की। मंत्रालय ने कहा कि सरकार आरबीआई अधिनियम के तहत केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को अनिवार्य मानती है। हालांकि यह साफ नहीं है कि क्या वास्तव में दोनों पक्षों के बीच गतिरोध दूर हो पाया है या नहीं।

आर्थिक मामलों के सचिव एस सी गर्ग ने गत 2 नवंबर को सोशल मीडिया पर आचार्य की टिप्पणी को लेकर सवाल उठाए। उसी दिन आरबीआई ने डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन के 29 अक्टूबर को दिए गए भाषण को अपलोड किया जिसमें विश्वनाथन ने चूककर्ता के साथ अलग बर्ताव की जरूरत को लेकर सवाल उठाए थे। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत गवर्नर के पास भेजे गए प्रस्तावों पर परामर्श की प्रक्रिया आने वाले दिनों में क्या स्वरूप अख्तियार करती है? सरकार चाहती है कि जनहित में किए गए सुझावों को केंद्रीय बैंक स्वीकार कर ले। लेकिन यह देखना होगा कि सरकार इसके लिए निर्देश जारी करने का रास्ता अपनाती है या उसे मना लेती है। धारा 7 में यह प्रावधान है कि सरकार सार्वजनिक हित के लिए जरूरी लगने पर रिजर्व बैंक को किसी मसले पर निर्देश जारी कर सकती है।

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