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विचारधारा का प्रश्न और चुनावी गुणा-भाग

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  November 04, 2018

राजनीतिक बहस का स्तर दिनोदिन गिरता जा रहा है। मामला क्लाउन प्रिंस , चौकीदार चोर है और चिडिय़ा की बीट तक पहुंच गया है। इस बीच राजनीति के असली मैदान में काफी कुछ घटित हो रहा है। तेलुगू देशम पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन और उससे जुड़ी तस्वीरें इसका उदाहरण हैं। घोषित दुश्मन गले मिल रहे हैं। पुराने दोस्तों की राह जुदा हो रही है। मौजूदा राजनीतिक हालात को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वर्ष 2019 के चुनाव कैसे होने वाले हैं? भारतीय राजनीतिक इतिहास बताता है कि एक मजबूत और बहुमत वाली सरकार का नेता कभी किसी प्रतिपक्षी से नहीं हारता। वह अपनी पराजय के लिए स्वयं जवाबदेह होता है। सन 1977 में इंदिरा गांधी के साथ यही हुआ था। लोग किसी अन्य के लिए नहीं बल्कि उन्हें हटाने के लिए मतदान कर रहे थे। वे उन्हें आपातकाल की अतियों का सबक सिखाना चाहते थे। दक्षिण भारत को छोड़कर हर जगह यही स्थिति थी।

 
सन 1989 में यही काम राजीव गांधी ने किया। जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने हिंदी प्रदेश में उनके खिलाफ अभियान छेड़ा तो वह राजीव के प्रतिद्वंद्वी या प्रधानमंत्री पद के दावेदार कतई नहीं नजर आ रहे थे। शाहबानो केस से लेकर बोफोर्स और अयोध्या मामले तक राजीव की गलतियों ने उनकी पार्टी के वोट बैंक को नाराज किया। सन 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के पास बहुमत भले नहीं था लेकिन वह एक लोकप्रिय नेेता थे। उनके खिलाफ कोई संयुक्त विपक्ष नहीं था, न ही कोई चुनौती देने वाला नेता। उन्हें इसलिए पराजय का सामना करना पड़ा क्योंकि उनकी पार्टी दंभ में आकर बहुत जल्दी जीत तय मान बैठी थी। चुनाव समयपूर्व करा लिए गए, इंडिया शाइनिंग के दावे बढ़ाचढ़ाकर किए गए, अहम साझेदार गंवा दिए गए। इस हार में सन 2002 के दंगों को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया न देना भी एक वजह बनी। इस तरह देखें तो वाजपेयी भी अपनी हार के लिए जवाबदेह बने। सन 1977 से 2004 के बीच के ये तीन चुनाव हमें बताते हैं कि मजबूत नेता का विकल्प न होने का दावा हकीकत तो है लेकिन वह अंतिम सत्य नहीं है।
 
आखिर यह भारतीय मतदाताओं की ऐसी कौन सी मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है जो यह तय करती है कि मजबूत नेताओं को उखाड़ फेंका जाए, तब भी जब उनका कोई विकल्प मौजूद न हो? इसे सत्ता विरोधी लहर नहीं कहा जा सकता है क्योंकि सरकारें कई बार लगातार दो कार्यकाल हासिल कर चुकी हैं, यहां तक कि गठबंधन सरकारें भी। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि मतदाता अगर असंतुष्ट होता है तो भी इस बात से संचालित होता है कि कोई अन्य विकल्प नहीं है। परंतु अगर वह नाराज हो जाता है तो वह केवल सत्ताधारी दल को उखाडऩा चाहता है। भले ही उसकी जगह कोई भी सत्ता में आए।
 
आइए नजर डालते हैं कि ओपिनियन पोल इस बारे में क्या कहते हैं। इंडिया टुडे द्वारा किया गया एक गंभीर ओपिनियन पोल संकेत देता है कि मोदी सरकार की लोकप्रियता में लगातार लेकिन सीमित गिरावट आई है। कुलमिलाकर देखें तो वह अभी भी विपक्ष से आगे है। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह सरकार 1977, 1989 या 2004 की तरह खारिज हो जाएगी। सरकार को दूसरा कार्यकाल मिलेगा, भले ही उसे बहुमत न मिले और गठबंधन की सरकार बने। विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का दावेदार कोई भी हो। राहुल गांधी हों या मायावती, कोई मोदी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं। तब सरकार की जीत सुनिश्चित होगी। यह अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों की तरह आमने-सामने की लड़ाई में बदल जाएगा। कोई विपक्षी नेता मोदी से सीधी लड़ाई की स्थिति में नहीं है। ऐसे में महागठबंधन का विकल्प बचता है लेकिन बिना नेता के कैसा महागठबंधन?
 
मोदी को हराने के दो तरीके हैं। ओपिनियन पोल बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता बढ़ नहीं रही है बल्कि धीरे-धीरे घट रही है। जबकि 2008-09 में संप्रग के साथ इसका उलटा हुआ था। क्या विपक्ष छह महीने में इस नाराजगी को गुस्से में बदल सकता है? यह संभव है लेकिन लगता नहीं कि ऐसा हो पाएगा। राफेल मामला अभी भी बोफोर्स जैसा नहीं बन सका है हालांकि प्रतिक्रिया में मोदी सरकार जो गलतियां कर रही है वे जरूर राजीव गांधी की याद दिलाती हैं। किसानों और ईंधन कीमतों के रूप में और भी मुद्दे हैं लेकिन अपेक्षाकृत कम महंगाई इनके असर को कम करती है। जयप्रकाश नारायण अथवा वीपी सिंह जैसा कोई नेता भी नहीं जो इसका फायदा उठा सके। राहुल अभी भी ऐसा करने की स्थिति में नहीं है। भाजपा के अनिल अंबानी तथा अन्य कारोबारी घरानों के साथ रिश्तों के आरोप इसलिए ठोस नहीं हैं क्योंकि कांग्रेस खुद इनके साथ करीबी के लिए जानी जाती है। खासतौर पर अंबानी घरानों के साथ। ऐसे में फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि जनता मोदी सरकार को नकारने के मूड में है।
 
दूसरी नीति यह है कि मोदी से सीधी लड़ाई लडऩे के बजाय कई छोटी राज्य स्तरीय संघर्ष के जरिये उनका मुकाबला किया जाए। उन्हें मजबूत स्थानीय नेताओं और मजबूत स्थानीय गठबंधनों से भिड़ाया जाए। नायडू और राहुल तेलंगाना में यही कर रहे हैं और शायद आंध्र प्रदेश में भी यही दोहराया जाएगा। याद रहे कि शिरोमणि अकाली दल के बाद तेलुगू देशम ही सबसे बड़ा कांग्रेस विरोधी दल रहा है। सन 2013 में नायडू ने सोनिया गांधी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने बेटे को प्रधानमंत्री बनाने के इरादे से आंध्र प्रदेश का बंटवारा किया। अब वे कैमरों पर गले मिलते नजर आ रहे हैं। साझा दुश्मन एक कर ही देता है।
 
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भाजपा कोई बड़ा कारक नहीं है। परंतु अगर उसे इन राज्यों में साझेदार नहीं मिले तो नुकसान होना तय है क्योंकि लोकसभा में कुल 42 सीटें इन राज्यों से हैं। भाजपा इस लड़ाई को आंध्र प्रदेश बनाम भाजपा से मोदी बनाम राहुल भी नहीं बना पाएगी। तमिलनाडु में भाजपा इसलिए नुकसान में है क्योंकि उसकी साझेदार एआईएडीएमके लोकप्रियता गंवा चुकी है। यह भी संभव है कि भाजपा एआईएडीएमके का साथ छोड़कर द्रमुक को अपने साथ लेने का प्रयास करे। याद रहे कि अगर तेदेपा और कांग्रेस तथा सपा और बसपा जैसे स्थायी शत्रु साथ आ सकते हैं तो द्रमुक और भाजपा तो अतीत में साथ रह भी चुके हैं। परंतु यदि ऐसा नहीं होता है तो कांग्रेस और विपक्ष की नीति यही होगी कि भाजपा से छोटी राज्य स्तरीय लड़ाइयां लड़ी जाएं।
 
बड़े राज्यों की बात करें तो महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल की अपनी अलग राजनीति है। कर्नाटक के बारे में निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता है। हिंदी प्रदेश में सपा-बसपा के बीच अब तक समझौता नहीं हुआ है लेकिन ऐसा संभव दिखता है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई है लेकिन बसपा तथा कुछ अन्य छोटे दल अंतर पैदा कर सकते हैं। भाजपा और कांगे्रस दोनों इन छोटे दलों को साथ लेना चाहेंगे। हरियाणा, छत्तीसगढ़, झारखंड और असम में जहां भाजपा की गठबंधन सरकार है, हर जगह यही किया गया है। प्रफुल्ल महंत की असम गण परिषद भाजपा द्वारा नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) में हिंदू और मुस्लिम 'विदेशियों' के साथ अलग-अलग व्यवहार करने से नाराज है। पंजाब में भी भाजपा को नुकसान होगा क्योंकि वहां मामला कांग्रेस बनाम अकाली दल का है। क्या दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस और आप साथ आ सकते हैं? तेदेपा और कांग्रेस के बाद सब संभव है।
 
ऐसा लगता है कि राजनीति इसी दिशा में जाएगी। जरूरी नहीं कि महागठबंधन हो लेकिन कई राज्य स्तरीय गठबंधन हो सकते हैं। इनके जरिये विपक्ष भाजपा को कई छोटी लड़ाइयों में उलझाने में कामयाब हो सकेगा। मोदी और शाह की नीति होगी विपक्ष को यह न करने देना और राहुल के साथ सीधी लड़ाई की जमीन तैयार करना। वर्ष 2019 को लेकर ऐसी ही नीति तैयार की जा रही है। विपक्ष ने आंध्र-तेलंगाना में पहली चाल चल दी है।
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