बिजनेस स्टैंडर्ड - कंर्सोटियम के मामले में मध्यस्थता
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कंर्सोटियम के मामले में मध्यस्थता

अदालत से
एमजे एंटनी /  November 04, 2018

अगर किसी भारतीय कंपनी और विदेशी कंपनी के बीच कंसोर्टियम समझौता है तो केवल कंसोर्टियम के नाम पर ही दावा किया जा सकता है, अलग से नहीं। उच्चतम न्यायालय ने एलऐंडटी बनाम मुंबई मेट्रो वाद में यह व्यवस्था दी। इस मामले में मुंबई में मोनोरेल के निर्माण के लिए भारतीय कंपनी और मलेशिया की एक कंपनी के बीच कंसोर्टियम समझौता हुआ था। कंसोर्टियम और मुंबई महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) के बीच कई तरह के विवाद पैदा हुए। उन्होंने प्राधिकरण के समक्ष अलग-अलग दावे किए जिन्हें खारिज कर दिया गया। कंसोर्टियम ने मध्यस्थता एवं सुलह कानून के तहत अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता की मांग करते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि इसमें अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता नहीं हो सकती है क्योंकि कंसोर्टियम में भारतीय कंपनी मुख्य साझेदार है। कंसोर्टियम समझौते के तहत गठित पर्यवेक्षी बोर्ड ने साफ किया है कि इसमें मुख्य साझेदार की बात मानी जाएगी क्योंकि वही बोर्ड के अध्यक्ष की नियुक्ति करता है। कंसोर्टियम का कार्यालय मुंबई में है और यह भी इस बात का प्रमाण है कि कंसोर्टियम का मुख्य साझेदार मध्यस्थता की कार्यवाही की अगुआई करेगा। इस सभी तथ्यों से साफ है कि इस कंसोर्टियम का केंद्रीय प्रबंधन और नियंत्रण भारत में ही है, किसी अन्य देश में नहीं।

 
सरफेसी कानून: दीवानी अदालत पर रोक
 
बंबई उच्च न्यायालय ने कहा है कि सरफेसी कानून में साफतौर पर दीवानी मामला दायर करने पर प्रतिबंध है जो ऋण वसूली पंचाट के दायरे में आता है। उच्च न्यायालय के खंड पीठ ने एकल पीठ के आदेश के खिलाफ ऐक्सिस बैंक की अपील को स्वीकार कर लिया। एकल पीठ का रुख इसके उलट था। इस मामले में कई लोगों ने एक बिल्डर से मुंबई में लक्जरी फ्लैट बुक कराए। ऋण लेने के लिए बिल्डर ने प्रोजेक्ट की जमीन और इमारत बैंक के पास गिरवी रख दी। लेकिन बिल्डर और उसके गारंटरों ने भुगतान में चूक की जिससे बैंक ने सरफेसी कानून के प्रावधानों का सहारा लिया। दूसरी ओर खरीदारों ने बिल्डर के खिलाफ दीवानी अदालत में याचिका दायर की और बैंक को भी इसमें एक पक्ष बनाया जबकि उनका बैंक से सीधे तौर पर कोई लेनादेना नहीं था। बैंक ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए दलील दी कि सरफेसी कानून की धारा 34 में दीवानी अदालत के अधिकार क्षेत्र को प्रतिबंधित किया गया है। फ्लैट खरीदारों का तर्क था कि उन्होंने बैंक से भी पहले बिल्डर को भारी भुगतान किया था और बैंक ने ऋण देने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि सरफेसी कानून या ऋण वसूली पंचाट के अधिकार क्षेत्र में आने वाले किसी भी मामले में कोई भी दीवानी अदालत अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकती है। 
 
मध्यस्थता प्रावधान में अस्पष्टता
 
अनुभवी वकीलों द्वारा तैयार किए जाने के बावजूद अनुबंधों में कुछ प्रावधानों में अस्पष्टता हो सकती है। जय भगवती कंस्ट्रक्शन कंपनी बनाम हावेयर इंजीनियर्स ऐंड बिल्ड कंपनी वाद में बंबई उच्च न्यायालय को अपने फैसले में एक ऐसे ही प्रावधान का सामना करना पड़ा। इसमें कहा गया था कि किसी भी विवाद के मामले में हमारे प्रबंध निदेशक का फैसला अंतिम और दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी होगा। किसी भी विवाद को मध्यस्थता या फिर किसी भी अदालत में ले जाया जाएगा। जब विवाद पैदा हुआ तो एक पक्ष मध्यस्थता चाहता था जबकि दूसरे की दलील थी कि उक्त प्रावधान में प्रबंध निदेशक के फैसले को अंतिम बनाया गया है। उसका कहना था कि अगर विवाद जारी रहा तो मध्यस्थता या अदालत में जाने का विकल्प था। उच्च न्यायालय ने कहा कि दोनों पक्षों का इरादा साफ था और इसमें मध्यस्थता की व्यवस्था थी। न्यायालय ने कहा, 'न्यायालय को दोनों पक्षों को अपने विवाद को मध्यस्थता में ले जाने के लिए उत्साहित करना चाहिए और मध्यस्थता प्रावधान की व्याख्या करते समय उदार रुख अपनाना चाहिए।'
 
नए कानून के दायरे में सीमेंट इकाई
 
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह अल्ट्राटेक सीमेंट लिमिटेड बनाम छत्तीसगढ़ राज्य वाद में व्यवस्था दी कि कंपनी भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक (रोजगार एवं सेवा की शर्तों का नियमन) कानून तथा भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक उपकर कानून के दायरे में आती है। कंपनी की दलील थी कि वह पहले ही फैक्टरी कानून के तहत पंजीकृत है और उसे नए कानूनों के तहत पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं है। अदालत ने उसकी दलील को खारिज कर दिया और उसे नए कानूनों के तहत पंजीकरण के लिए समय दे दिया। न्यायालय ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 2016 में लैंकों अनपारा पावर लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश वाद में अपने फैसले में अन्य उद्योगों के लिए यह व्यवस्था दे दी थी। 
 
न्यायाधीशों के रिक्त पदों से विसंगति
 
उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में सैकड़ों पद खाली पड़े हैं लेकिन उपभोक्ता अदालतों में स्थिति और भी बदतर है। इनमें से कई अदालतों में प्रमुख नहीं है क्योंकि कोई भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश उनकी अगुआई नहीं कर रहा है। न्याय राज्य सरकार द्वारा नामित कानूनी विशेषज्ञ द्वारा किया जाता है। इस स्थिति को देखते हुए राजस्थान न्यायालय को यह व्यवस्था देनी पड़ी कि कोई एकल पीठ वैध आदेश नहीं दे सकती है। इसमें एक अध्यक्ष और एक अन्य सदस्य होना चाहिए। ट्रैक ऑन कूरियर प्राइवेट लिमिटेड बनाम राज्य की अगुआई वाली कई अपीलों में यह आदेश दिया। राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ इन अपीलों को दायर किया गया था। अपीलों को स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा, 'यह समझ से परे है कि जिला उपभोक्ता फोरम के आदेश को राज्य आयोग का एकल पीठ अपील पर खारिज कर देता है। जिला उपभोक्ता फोरम में जिला न्यायाधीश के स्तर का एक अधिकारी और दो सदस्य होते हैं। अगर यही स्थिति रही तो यह पूरी तरह अवांछनीय होगी और यह न्याय के मखौल से कम नहीं होगी।' उच्च न्यायालय ने सरकार को तुरंत पदों को भरने और महाधिवक्ता को तीन महीने के भीतर इसकी अनुपालन रिपोर्ट देने को कहा। 
Keyword: supreme court, high court,,
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