बिजनेस स्टैंडर्ड - भुगतान प्रणाली के नियामक पर भिड़ंत की वजह
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भुगतान प्रणाली के नियामक पर भिड़ंत की वजह

अंकुर भारद्वाज और ईशान बख्शी /  November 04, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने गत 19 अक्टूबर को एक असामान्य प्रेस विज्ञप्ति जारी की। उस विज्ञप्ति में अंतर-मंत्रालय समिति की तरफ से सौंपी गई एक रिपोर्ट के मसौदे पर असहमति जताई गई थी। आरबीआई की आपत्ति समिति के उस सुझाव को लेकर थी जिसमें भुगतान नियमन बोर्ड (पीआरबी) के रूप में एक स्वतंत्र निकाय के गठन से संबंधित प्रावधान किए गए हैं। आरबीआई ने अपनी कड़ी असहमति जताने वाले पत्र में मंत्रिमंडलीय समिति के सुझावों को बिंदुवार तरीके से जवाब दिया गया। 

 
आरबीआई और समिति के विचारों में मतभेद के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: 
 
1. पीआरबी एक स्वतंत्र निकाय होगा
2. गैर-बैंकिंग संस्थानों को भी भुगतान प्रणाली में शामिल होने का अवसर दिए जाने की जरूरत है
3. आरबीआई को भुगतान क्षेत्र के नियामक के बजाय विवाद समाधान मुहैया कराने वाले ढांचागत संस्थान तक सीमित कर देना। 
 
अगर असहमति पत्र को इस नाटक के पहले अंक की संज्ञा दी जाए तो डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने नाटक के दूसरे अंक को मंचित किया। आचार्य ने कहा कि आरबीआई की स्वतंत्रता को कमतर करना विनाशकारी हो सकता है। 
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस तरह मतभेदों के सार्वजनिक होने से सरकार भी नाखुश हो गई। इस विवाद को लेकर चर्चा जारी रहने के बीच हमारा ध्यान आरबीआई की तरफ से लिखे गए असहमति पत्र पर रहेगा। इस लेख के जरिये हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि भुगतान नियामक होता क्या है और भुगतान प्रणाली के संचालन में आरबीआई की क्या भूमिका है? इसके अलावा भुगतान प्रणालियों के नियमन के बारे में वैश्विक स्तर पर अपनाई जाने वाली व्यवस्था से भी रूबरू होने की कोशिश करेंगे। 
 
भुगतान नियामक क्या है?
 
जब हम एक बैंक खाते से दूसरे खाते में पैसे भेजते हैं तो इसमें कई कदम शामिल होते हैं। बिजली बिल भरते समय, एटीएम से पैसे निकालते समय, किसी दूसरे व्यक्ति के खाते में चेक जमा करते समय और किसी कारोबारी प्रतिष्ठान में खरीदारी के समय डेबिट या क्रेडिट कार्ड स्वाइप करना जैसी वित्तीय गतिविधियां भुगतान प्रणाली से ही जुड़ी हुई हैं। पैसों के लेनदेन से जुड़ा मामला होने से इस पर करीबी नजर रखना जरूरी है। इसके सुचारु रूप से संचालन के लिए नियम भी बनाए गए हैं। भुगतान नियामक कानूनी एवं नियामकीय ढांचा तैयार करता है जिसके जरिये इस प्रणाली से जुड़े कदमों और विभिन्न सहभागियों की निगरानी की जाती है और इस प्रणाली का इस्तेमाल करने वाले लोगों एवं प्रतिष्ठानों के हितों को सुरक्षित रखना सुनिश्चित किया जाता है। भुगतान नियामक ही किसी भुगतान प्रणाली की बुनियादी रूप से सुरक्षा, सक्षमता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करता है। यह वित्तीय क्षेत्र की एक अहम गतिविधि है और भारत में इसका संचालन आरबीआई करता है।
 
आरबीआई ही क्यों देखता है भुगतान प्रणाली?
 
आरबीआई ही भारत की मौद्रिक नीति का नियंत्रण करता है। भारत का केंद्रीय बैंक होने के नाते आरबीआई को नोट जारी करने के मामले में एकाधिकार ही हासिल होता है। देश में मुद्रा आपूर्ति को बनाए रखना भी आरबीआई का ही दायित्व है।  बैंक केवल वही नोट जारी कर सकते हैं जो आरबीआई ने जारी किया हो। आरबीआई के असहमति पत्र के मुताबिक भुगतान प्रणाली मुद्रा की तकनीक-आधारित स्थानापन्न ही है लिहाजा इन प्रणालियों का नियमन और प्रबंधन भी उसी की जिम्मेदारी है।
 
एक स्वतंत्र भुगतान नियामक के गठन की मांग उठने की क्या वजह है? 
 
रतन वाटल की अध्यक्षता वाली डिजिटल भुगतान समिति ने दिसंबर 2016 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी को मजबूत करने के लिए कुछ सुझाव दिए थे। समिति ने कहा था कि आरबीआई की तरफ से संचालित भुगतान प्रणालियां- आरटीजीएस, एनईएफटी और एनईसीएस बैंकों का पक्षपोषण करती हैं। इससे वित्तीय क्षेत्र में एक विकृति पैदा होती है। समिति ने कहा था कि इन मामलों में आरबीआई परिचालन एवं नियमन दोनों की ही भूमिका निभाता है जिससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है। समिति ने कहा कि आरबीआई के नियम बैंकों एवं गैर-बैंकिंग भुगतान सेवा प्रदाताओं के बीच भेद करते हैं। यहां तक कि आरबीआई के द्वारा नहीं चलाई जा रही भुगतान प्रणाली जैसे यूपीआई में भी केवल बैंकों की ही पहुंच है।
 
वाटल समिति ने इसके दो विकल्प सुझाए: एक नया एवं स्वतंत्र भुगतान नियामक बनाया जाए या फिर भुगतान एवं समाधान प्रणाली नियमन एवं पर्यवेक्षण बोर्ड (बीपीएसएस) को आरबीआई के दायरे में रखते हुए भी उसे अधिक स्वतंत्र बनाया जाए। भले ही रिपोर्ट ने आरबीआई के नियमन वाली प्रणाली में खामी पाई लेकिन उसने पूरी तरह स्वतंत्र नियामक बनाने की अनुशंसा नहीं की। उसने आरबीआई के दायरे में ही एक स्वतंत्र भुगतान नियामक बनाने की संस्तुति की थी। आरबीआई अपनी असहमति को लेकर जो दलील रख रहा है वह काफी हद तक वाटल समिति की अनुशंसा के अनुरूप ही है। 
 
भारत में बैंक-केंद्रित भुगतान परिवेश: नवाचार एवं प्रतिस्पद्र्धा का निषेध?
 
भारत में भुगतान प्रणाली काफी हद तक बैंक-केंद्रित है। भुगतान प्रणालियों का परिचालन या तो आरबीआई या फिर एनपीसीआई करता है। आरबीआई के पास आरटीजीएस, एनईएफटी, एनईसीएस प्रणालियों का जिम्मा है जबकि एनपीसीआई के पास आईएमपीएस और यूपीआई का संचालन दायित्व है। एनपीसीआई का स्वामित्व बैंकों के एक कंसर्टियम के पास है। 
 
गैर-बैंकिंग भुगतान सेवा प्रदाताओं के मामले में निषेधकारी होने के कारण भारतीय आर्थिक परिवेश की आलोचना की जाती है। वाटल समिति ने भी इस मसले की ओर ध्यान आकृष्ट किया था। उसने कहा था कि ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में भी भुगतान पारिस्थितिकी का नेतृत्व बैंकों के ही पास है लेकिन वे गैर-बैंक भुगतान सेवा प्रदाताओं को भी बराबर की अहमियत देते हैं। वाटल समिति के मुताबिक, 'इन देशों में बैंकों एवं गैर-बैंकों को भुगतान प्रणाली के मामले में समान अहमियत दी गई है। सभी सेवा प्रदाताओं के लिए भुगतान प्रणाली तक पहुंच खुली हुई है।' आरबीआई का कहना है कि भुगतान प्रणाली उसके ही दायरे में बने रहना चाहिए क्योंकि इस प्रणाली पर बैंकों का वर्चस्व है। हालांकि आलोचकों का मानना है कि आरबीआई के नियमों की ही वजह से भुगतान परिवेश पर बैंकों का दबदबा बना हुआ है। 
 
अतीत में नचिकेत मोर समिति ने भी यह महसूस किया था कि भारत की भुगतान प्रणालियों के विकसित होने के बावजूद छोटे कारोबारों एवं निम्न आय वाले परिवारों तक बुनियादी भुगतान सेवा मुहैया कराने में लंबा फासला बना हुआ है। बाद में आई अन्य रिपोर्टों में भी भुगतान प्रणालियों में नवाचार को बैंक-केंद्रित भुगतान से विस्तार के लिए जरूरी बताया गया। 
 
केन्या की सफलता की कहानी 
 
भारत बड़ी तेजी से पेटीएम, गूगल पे और फोनपे जैसी भुगतान सेवाओं का अभ्यस्त होने लगा है लेकिन अफ्रीकी देश केन्या में इस तरह का बदलाव वर्ष 2007 में ही आ गया था। दिलचस्प बात यह है कि केन्या ने लोगों के खर्च करने, पैसे भेजने या लेने के तरीके में यह क्रांतिकारी बदलाव इंटरनेट के प्रसार के बगैर ही किया। केन्या ने सामान्य मोबाइल फोन के ही जरिये पैसे भेजने और रिसीव करने की प्रणाली 'एम-पेसा' शुरू की थी। कुछ समय में ही एम-पेसा इतना लोकप्रिय हो गया कि वर्ष 2017 में इसके द्वारा हुए लेनदेन की कुल राशि केन्या की जीडीपी के आधे हिस्से के बराबर हो गई। केन्या की 93 फीसदी आबादी मोबाइल भुगतान प्रणाली का इस्तेमाल कर रही है और इस वजह से वहां एटीएम की संख्या में भी गिरावट हुई है। लेकिन भारत में मोबाइल भुगतान सेवा रफ्तार भरने में नाकाम रही। ऊंचे शुल्क और खराब यूजर इंटरफेस होने को इस असफलता के लिए जिम्मेदार बताया जाता रहा है।
 
अन्य देशों में इस मुद्दे का किस तरह समाधान निकाला गया है?
 
अमेरिका
 
अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने 1986 में भुगतान प्रणाली नीति परामर्श समिति गठित की थी। वर्ष 2006 में इस समिति की भूमिका को बढ़ाकर भुगतान प्रणाली विकास समिति के दायित्व निभाने को भी कह दिया गया। समिति के सदस्यों में तीन सदस्य फेडरल रिजर्व के बोर्ड ऑफ गवर्नर के सदस्य होते हैं।
 
चीन
 
चाइना नैशनल एडवांस्ड पेमेंट सिस्टम एक अंतर-बैंक इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सिस्टम है जिसका स्वामित्व पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के पास है। यह प्रणाली अब चीन के वित्तीय ढांचे का बुनियादी अंग बन चुकी है। इसका नियमन पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के ही पास है।
 
यूरोप 
 
यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) 19 देशों के संगठन यूरोपीय संघ का केंद्रीय बैंक है। वर्ष 2013 में इसने यूरोपीय संघ के भीतर खुदरा भुगतान बाजार के विकास एवं नियमन के लिए यूरोपीय खुदरा भुगतान बोर्ड (ईआरपीबी) का गठन किया था। इस बोर्ड की अध्यक्षता ईसीबी के शीर्ष अधिकारी करते हैं जबकि इसके सदस्यों में बैंकिंग एवं भुगतान क्षेत्र के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
 
ब्रिटेन 
 
बैंक ऑफ इंगलैंड ब्रिटेन का केंद्रीय बैंक है। ब्रिटेन में वित्तीय क्षेत्र के नियमन का जिम्मा स्वतंत्र निकाय फाइनैंशियल कंडक्ट अथॉरिटी (एफसीए) के पास भी है। एफसीए ने भुगतान प्रणाली में नवाचार एवं प्रतिस्पद्र्धा के लिए अप्रैल 2015 में भुगतान प्रणाली नियामक पीएसआर का गठन किया था। पीएसआर से पहले वित्तीय संस्थानों का संगठन पेमेंट्स काउंसिल 2007 से लेकर 2015 तक भुगतान क्षेत्र का नियमन करता था। 
 
निष्कर्ष
 
वैश्विक स्तर पर अपनाई जा रही व्यवस्था पर गौर करने से पता चलता है कि भुगतान नियमन आम तौर पर केंद्रीय बैंकों का ही दायित्व है और इसके लिए अक्सर केंद्रीय बैंक के अधीन एक स्वतंत्र निकाय का गठन किया गया है। यह वाटल समिति के सुझावों के अनुरूप ही है। भुगतान प्रणालियों के लिए एक और नियामक का गठन किए जाने की कुछ अपनी चुनौतियां भी हैं। खासकर इस दिशा में विशेषज्ञता का अभाव होने से स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इसके अलावा इस तरह का नियामक सेवानिवृत्त होने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के लिए खेल का एक और मैदान भी बन सकता है। रिजर्व बैंक ने जहां भुगतान प्रणाली के नियमन को बहुत स्पष्टता से अपना दायित्व बताया है वहीं भुगतान क्षेत्र में प्रतिस्पद्र्धा और नवाचार को प्रोत्साहन देने के मोर्चे पर हो रही आलोचना से भी वह बच नहीं सकता है। इस तरह के नियमन पर आरबीआई की अस्पष्टता और सार्वजनिक विमर्श का अभाव होना भी आलोचकों को मौका देता है। मौजूदा विवाद इस कमजोरी से निजात पाने का एक मौका मुहैया कराता है।
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