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श्रीलंका में जारी रहेगा राजनीतिक उथल-पुथल का सिलसिला

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 02, 2018

आपको ज्ञानी जैल सिंह की याद होगी। वह संभवत: भारतीय इतिहास के सबसे चालबाज राष्ट्रपति थे जो एक संवैधानिक तख्तापलट के सहारे राजीव गांधी की अप्रत्याशित बहुमत वाली सरकार तक को गिराने वाले थे।  जैल सिंह नाकाम रहे। परंतु श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाल सिरीसेना नाकामयाब नहीं रहे। उन्होंने गत सप्ताह देश के प्रधानमंत्री और यूनाइटेड नैशनल पार्टी (यूएनपी) के नेता रानिल विक्रमसिंघे को पद से हटा दिया और उनके स्थान पर श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) के नेता और नेता प्रतिपक्ष महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया। मौजूदा सांसदों से कहा गया कि अगर वे इस सदन के सदस्य बने रहना चाहते हैं तो उनको राजपक्षे का समर्थन करना होगा। अगर नहीं, तो वे चुनावों के लिए तैयार रहें। सिरीसेना के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं है। देश में राष्ट्रपति चुनाव 2019 के अंत और 2020 के आरंभ के बीच होंगे परंतु संसदीय चुनाव अगस्त 2020 में होने हैं। 

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सन 2015 में जब वह राष्ट्रपति बने थे, तब उन्होंने कहा था, 'मैं इसलिए बाहर आया क्योंकि मैं ऐसे नेता के साथ नहीं रह सकता था जिसने देश, सरकार और राष्ट्रीय संपदा को लूटा।' वह महिंदा राजपक्षे की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे। वह इतने आज्ञाकारी और दब्बू नजर आते थे कि उनसे किसी को खतरा महसूस नहीं होता था। परंतु अपनी तमाम विनम्रता के बीच वह अत्यंत ताकतवर नेता रहे। उन्होंने अपनी शुरुआत वामपंथी रुझान वाली श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) के युवा नेता के रूप में की थी। वह सन 1983 में पार्टी की युवा शाखा के अध्यक्ष बने। सन 1989 में वह पोलोन्नरुवा सीट से एसएलएफपी के सांसद बने। उन्होंने देश के मध्य इलाके में पार्टी को खड़ा किया और सन 2000 में पार्टी के अध्यक्ष बन गए। सन 2001 में उन्हें पार्टी का महासचिव बना दिया गया और वह 2014 तक इस पद पर रहे। इस प्रकार वह एसएलएफपी के इतिहास में सबसे लंबी अवधि तक सचिव रहने वाले नेता बने। यह महत्त्वपूर्ण बात थी क्योंकि वह भंडारनायके अथवा जयवद्र्घने जैसे सत्ता से जुड़े परिवारों से नहीं आते थे। वह कोलंबो के उस प्रभावशाली इलाके से भी नहीं आते थे जिसे हम अपनी लुटियन की दिल्ली के समकक्ष रख सकते हैं।
 
महिंदा राजपक्षे चंद्रिका कुमारतुंगा के नायब हुआ करते थे। उन्होंने अपनी नेता के खिलाफ विद्रोह किया और उन्हें सत्ता सौंपने पर मजबूर कर दिया। जब सन 2015 के चुनाव निकट आए तो कुमारतुंगा को लगा कि वह सिरीसेना की सहायता से राजपक्षे से बदला ले सकती हैं। उन्होंने उन्हें उन्हें पाला बदलने को प्रेरित किया और एसएलएफपी और यूनएपी जैसे धुरविरोधी दलों का गठबंधन बनाने में मदद की। इनकी तुलना हम भारत में कांग्रेस और भाजपा से कर सकते हैं। जाहिर है इनका एकमात्र लक्ष्य था राजपक्षे को सत्ता से हटाना। सिरीसेना राष्ट्रपति चुनाव जीतने में कामयाब रहे। उन्होंने मंत्रियों की मनमानी नियुक्ति और उन्हें मनमाने ढंग से हटाने का विशेषाधिकार देने वाले अधिकारों को खत्म करने की बात कही लेकिन ऐसा किया नहीं। उन्होंने वादा किया था कि वह देश में 'करुणा और न्याय' का शासन लागू करेंगे। 
 
ऐसे में तनाव पैदा होना ही था और वह पहले ही दिन से नजर आने लगा। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के बॉन्ड घोटाले में शामिल होने और केंद्रीय बैंक के गवर्नर को बदलने से उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार का संकेत मिला। यद्यपि एक जांच में उन्हें दोषमुक्त करार दिया गया। परंतु जांच के दौरान भी उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। विक्रमसिंघे ने अर्थव्यवस्था में कुछ संतुलन कायम करने की कोशिश की लेकिन सिरीसेना ने समाजवादी रुझान के चलते सरकारी उपक्रमों के विनिवेश और अन्य बाजारोन्मुखी कदमों में अड़ंगा लगाया।  सबसे बड़ा मुद्दा था राष्ट्रपति का पद। सिरीसेना को एक और कार्यकाल कैसे मिल सकता था? विक्रमसिंघे अब खुद राष्ट्रपति बनना चाहते थे। ऐसे में सिरीसेना के लिए यह जरूरी हो गया था कि वह अपने दोबारा चुनाव का इंतजाम करें। इसलिए तीन वर्ष में सरकार के कमजोर प्रदर्शन के बावजूद वह इस वर्ष अप्रैल में विश्वास मत हासिल करने में कामयाब रही लेकिन सिरीसेना को जरूरी लगा कि वह अपने पुराने दल की ओर लौटें। राजपक्षे समझदार राजनेता हैं, वह मौके का इंतजार कर रहे थे। वह पुराना विश्वासघात भुलाने और क्षमा करने को तैयार थे। 
 
सवाल यह है कि क्या सिरीसेना के लिए लक्ष्य प्राप्ति आसान होगी? पूर्व रक्षा सचिव और मौजूदा प्रधानमंत्री के भाई गोतभाया राजपक्षे पहले ही एक राजनीतिक मंच गठित कर चुके हैं। अगर बतौर प्रधानमंत्री राजपक्षे संविधान में संशोधन करने और राष्ट्रपति के दो कार्यकाल की सीमा समाप्त करने में सफल होते हैं तो वह खुद भी राष्ट्रपति पद के दावेदार हो सकते हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो उनका भाई तो है ही। चाहे जो भी हो, आज नहीं तो कल सिरीसेना रास्ते का कांटा साबित होंगे ही।  एक और खतरा है। राजपक्षे ने सेना के साथ खूब लापरवाही बरती थी। सेनाओं के प्रमुखों को हटाया गया, एक दूसरे पर तरजीह दी गई और जेल में भी डाला गया। मौजूदा चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ को राजपक्षे के कार्यकाल में उचित पदोन्नति तक नहीं मिली थी। देश में सरकार बदलने तक वह अमेरिकी सेना के साथ अफगानिस्तान चले गए थे। उन्हें उनके तय हक के करीब पांच साल बाद सेना प्रमुख की कुर्सी मिली। अगर राजपक्षे परिवार की वापसी नजर आती है तो सेना में कई लोग असहज हो जाएंगे। श्रीलंका में तख्तापलट कोई अजनबी बात नहीं है। वहां की सेना अगर जंग पर न भी हो तो भी युद्घ उसकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। 
 
अल्पसंख्यकों का सवाल भी सामने है। लिट्टे का खात्मा राजपक्षे के कार्यकाल में हुआ था इसलिए तमिल और उनके सिंहल बौद्घ राष्ट्रवादियों से करीबी दिखाने के कारण मुस्लिम, दोनों उनकी वापसी पसंद नहीं करेंगे। ऐसे में यह भी तय नहीं है कि संसद राजपक्षे के प्रधानमंत्री बनने पर मुहर लगाती है या नहीं। परंतु एक बात तय है कि श्रीलंका में निकट भविष्य में उथलपुथल का दौर जारी रहेगा।
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