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रोजगार, प्रतिस्पर्धा और प्रसन्नता की उलझन

अजय छिब्बर /  November 02, 2018

देश में असमानता और सामाजिक तनाव बढ़ रहा है तथा विभाजनकारी राजनीति देखने को मिल रही है। जाहिर तौर पर देश खुशहाल नहीं है। बता रहे हैं अजय छिब्बर

 
देश के दिग्गज कारोबारियों में शुमार रहे जेआरडी टाटा ने कहा था,'मैं नहीं चाहता कि देश आर्थिक महाशक्ति बने। मैं चाहता हूं कि हमारा मुल्क एक प्रसन्न देश बने।' अगर आंकड़े सही हैं तो बीते एक दशक से अधिक समय से 7 फीसदी से अधिक की जीडीपी वृद्घि दर ने देश को दुनिया की सबसे तेज गति से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड इसे भारत के लिए 'सुनहरी स्थिति' कहती हैं। देश की जीवन संभाव्यता बढ़ी है और गरीबी में कमी आई है। अधिक पिछड़े इलाकों, पिछड़ी मानी जाने वाली जातियों और मुस्लिमों के बीच गरीबी में तेजी से कमी आई है। ये सभी तबके गरीबी के ऊंचे स्तर के लिए जाने जाते रहे हैं। 
 
परंतु यह तेज वृद्घि इतने रोजगार नहीं तैयार कर पा रही है कि जो देश की युवा और तेजी से बढ़ती आबादी को चाहिए। यही वजह है कि देश में असमानता बढ़ रही है, सामाजिक तनाव में इजाफा हो रहा है और विभाजनकारी राजनीति देखने को मिल रही है। जाहिर तौर पर देश खुशहाल नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर कम खर्च तथा कमजोर वित्तीय तंत्र और संस्थानों के चलते भविष्य को लेकर खतरा उत्पन्न हो गया है। अतीत में देश ने तेजी से जो विकास किया वह सेवाओं पर आधारित था, श्रम आधारित विनिर्माण पर नहीं। जबकि पूर्वी एशिया के शेष देश श्रम आधारित विनिर्माण से प्रगति कर रहे थे। यही वजह है कि अधिक संख्या में लोग कृषि क्षेत्र से बाहर नहीं आ पाए। जाटों, पाटीदारों और मराठाओं के विद्रोह, किसानों की हड़ताल और बढ़ती अव्यवस्था के लिए अवसरों की कमी ही जिम्मेदार है। 
 
वैश्विक प्रतिस्पर्धी सूचकांकों और विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता सूचकांक पर भारत की स्थिति में जो सुधार हुआ है वह वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की वजह से हुआ है। परंतु निर्यात अभी भी धीमा है और आयात में इजाफा हुआ है। बढ़ती तेल कीमतों ने देश को प्रभावित किया है और रुपये के मूल्य में तेजी से गिरावट आई है। चालू खाते का घाटा इस वर्ष जीडीपी के 3 फीसदी के स्तर तक पहुंच सकता है और राजकोषीय आंकड़ों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं दिख रही। भारत ने घाटे को कम करने के लिए प्रतिक्रियास्वरूप कई जिंसों के आयात शुल्क में इजाफा किया है। इससे दीर्घावधि की प्रतिस्पर्धा की कीमत पर अल्पावधि में लाभ हो सकता है।
 
अगर भारत सुधार के मोर्चे पर आगे और पीछे हटता है तो कई निर्यात क्षेत्रों की वृद्घि में और अधिक धीमापन आ जाएगा। अगर वृद्घि दर गिरकर 4 फीसदी के स्तर पर आ गई तो देश के जीडीपी का आकार सन 2030 तक बमुश्किल 4.3 लाख करोड़ डालर ही हो सकेगा और वह जापान से पीछे रहेगा। वहीं दूसरी ओर भूमि, श्रम और पूंजी बाजार में अहम सुधारों से वृद्घि दर सालाना 9 फीसदी के स्तर तक जा सकती है। उस स्थिति में 2030 तक अर्थव्यवस्था का आकार 9 लाख करोड़ डॉलर तक हो जाएगा और वह अमेरिका और चीन के बाद तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश होगा। अगर वृद्घि दर 6-7 फीसदी के बीच रहती है तो का जीडीपी 6-7 लाख करोड़ डॉलर रहेगा। 
 
वर्ष 2018 के डब्ल्यूईएफ वैश्विक प्रतिस्पर्धी सूचकांक में भारत को 140 देशों में 58वां स्थान दिया गया है। पहली नजर में यह प्रभावशाली लगता है लेकिन भारत की रैंकिंग में सुधार प्रमुख तौर पर उसके बाजार के आकार के कारण हुआ है। अगर भारत औसत आकार की एक अर्थव्यवस्था होता तो इसकी रैंकिंग गिरकर 70वीं हो जाती। आईएमडी प्रतिस्पर्धी सूचकांक जिसमें बाजार का आकार नहीं देखा जाता वहां भारत को 63 देशों में 44वां स्थान मिला।  रोजगार और प्रतिस्पर्धा आपस में संबंधित हैं। एक प्रतिस्पर्धी भारत में घरेलू और बाहरी, दोनों बाजारों के लिए मेक इन इंडिया होना चाहिए। प्रतिस्पर्धा आधारित वृद्धि में और अधिक रोजगार भी तैयार होने चाहिए।
 
चीन श्रम की बढ़ती लागत और शुल्क वृद्धि के कारण वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र तलाश कर रहा है। भारत इसका फायदा उठाकर वैश्विक मूल्य शृंखला में अपनी जगह बना सकता है। अभी भी हमें बांग्लादेश, इंडोनेशिया, वियतनाम और अफ्रीका के कई देशों से मुकाबला करना पड़ सकता है जो चीनी निवेश की ओर आकर्षित हैं। इनसे प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत को लॉजिस्टिक्स में सुधार करना होगा, कौशल विकास पर ध्यान देना होगा तथा भूमि बाजार और वित्तीय क्षेत्रों में आवश्यक सुधार करने होंगे। रुपये के अधिमूल्यन में कमी आने से भी कुछ मदद मिलेगी। एक नई सामरिक व्यापार और औद्योगिक नीति की आवश्यकता है ताकि बदलते विश्व की चुनौतियों का सामना किया जा सके और भारत समान सोच वाले देशों के साथ मुक्त व्यापार का लाभ उठा सके।
 
देश में किस पैमाने पर रोजगार तैयार हो रहा है यह अभी भी विवाद का विषय बना हुआ है क्योंकि जरूरी तथ्यों का अभाव है। जब तक बेहतर आंकड़े उपलब्ध नहीं होते हैं तब तक अगर विश्व बैंक के आंकड़ों पर यकीन किया जाए तो भारत जीडीपी में हर एक प्रतिशत वृद्धि के साथ 7.5 लाख रोजगार तैयार कर रहा है। ऐसे में माना जा सकता है कि हम 50-55 लाख रोजगार तैयार कर रहे हैं। सन 2030 तक देश की कामगार उम्र की आबादी में सालाना 1.2 करोड़ का इजाफा होगा। देश की श्रम आबादी में पुरुषों का योगदान अधिक है। महिलाओं का योगदान पहले से ही कम है और उसमें आगे भी कमी आ रही है। भारत को 2030 तक हर वर्ष 60-65 लाख रोजगार तैयार करने होंगे। यानी हर वर्ष श्रम शक्ति में शामिल होने वाले सभी एक करोड़ लोगों को रोजगार नहीं मिलेगा।
 
बीते दशक के करीब एक करोड़ बेरोजगारों को रोजगार देने के लिए करीब 10 लाख रोजगार हर वर्ष अतिरिक्त तैयार करने होंगे। अगर भारत महिलाओं को अधिक अवसर देता है तो उनका योगदान भी बढ़ेगा। लब्बोलुआब यह कि भारत को 2030 तक अपना सालाना रोजगार बढ़ाकर 85 से 90 लाख करना होगा। इसके लिए जीडीपी में 12 फीसदी की दर से बढ़ोतरी करने की जरूरत है।  बड़े सुधारों को अंजाम देकर भारत अगले 10 -15 वर्ष में तय लक्ष्यों को हासिल कर सकता है। तब वह अपने जननांकीय लाभ का भी पूरा फायदा उठा पाएगा। ऐसे में अधिक कठिन वैश्विक माहौल के बीच भारत एक आर्थिक महाशक्ति भी होगा और अपेक्षाकृत प्रसन्न देश भी बन सकेगा। दुनिया की कुल आबादी के छठे हिस्से का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि भारत कौन सी राह पर आगे बढ़ता है।
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