बिजनेस स्टैंडर्ड - चीन के विरुद्घ प्रतिरोध
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चीन के विरुद्घ प्रतिरोध

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 02, 2018

चीन की आक्रामकता और उसके विस्तारवाद में हाल के वर्षों में जो तेजी आई है, क्या उसकी कीमत अब उसे चुकानी पड़ रही है? ऐसा लगता तो है। कई वर्षों तक चीन तकनीकी चोरी को वस्तु व्यापार तथा मौद्रिक नीति के साथ मिलाजुलाकर बच निकलता रहा। उसके बाद उसने विदेश नीति में आक्रामकता दिखानी शुरू की। डॉनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को चीन के निर्यात पर शुल्क बढ़ाया तो चीन के इस तेज सफर को पहला झटका लगा। इसका नुकसान अमेरिका को भी होगा क्योंकि अमेरिकी उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी होगी लेकिन कुछ उत्पादन इकाइयां चीन से बाहर भी जा सकती हैं। इस वर्ष युआन की कीमत कई एशियाई मुद्राओं की तुलना में अधिक गिरी है। बेल्ट और रोड पहल भी कई देशों पर भारी पड़ रही है। श्रीलंका को अपना एक बंदरगाह 99 वर्ष के लिए देना पड़ा है। कोलंबो में सागर से जुड़े भाग का प्रमुख हिस्सा भी उसे सौंपना पड़ा है। मलेशिया में सरकार बदलने के बाद एक रेलवे लाइन और गैस पाइपलाइन को रद्द किया गया और तीन कृत्रिम द्वीपों पर बनने वाली बस्तियों का काम रोका गया। इसके जरिये चीन के अमीर लोगों को लुभाया जा रहा था। चीन के सदाबहार दोस्त पाकिस्तान को भी कुछ अनुबंधों के लिए घरेलू आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इन अनुबंधों की अधिकांश शर्तें गोपनीय हैं। नई सरकार के अधीन पाकिस्तान परियोजनाओं की छानबीन कर रहा है और संभवत: उनमें से कुछ को लेकर नए सिरे से बातचीत भी करना चाहता है। मालदीव में भी सरकार बदली है और वहां भी ऐसा कुछ देखने को मिल सकता है। एशिया में विस्तारवाद की पहचान बनने वाली योजना असंतोष की वजह बन गई है। 

 
स्पष्ट है कि सरकारें बदलने के बाद बेल्ट और रोड परियोजना का पुनर्आकलन चीन के नियंत्रण में नहीं है। परंतु चीन राजनीतिक बदलाव में छेड़छाड़ कर सकता है जिससे चुनाव नतीजे बेमानी हो जाएं। श्रीलंका की हालिया घटनाओं से तो यही संकेत मिलता है। मलेशिया, श्रीलंका, मालदीव और कुछ अफ्रीकी देशों में बड़ा मुद्दा यह है कि स्थानीय राजनीतिक वर्ग ने अव्यवहार्य परियोजनाओं से जुड़े अनुबंध पर हस्ताक्षर करने में समझौतापरक रुख दिखाया। अब अनुबंध को लेकर नए सिरे से बातचीत से नए विवाद उत्पन्न हो सकते हैं और महंगे साबित हो सकते हैं क्योंकि जब भी उन्हें रद्द करने की बात आती है तो चीन अनुबंध की शर्तों की दुहाई देता है। चीन को तकनीकी मोर्चे पर भी झटका लगा है। उस पर लंबे समय से पश्चिमी देशों से तकनीक चुराने और सुरक्षित नेटवर्क में सेंध लगाने का आरोप रहा है। उसके दूरसंचार उपकरणों को आशंका से देखा जाता है कि वे जासूसी कर सकते हैं। अब कुछ देश रक्षात्मक उपाय करने लगे हैं। अमेरिका और कनाडा के बाद जर्मनी ने भी उच्चस्तरीय इंजीनियरिंग कंपनियों की चीन से जुड़ी खरीद पर रोक लगा दी। पश्चिमी देश चौथी औद्योगिक क्रांति के नेतृत्व को लेकर चीन की महत्त्वाकांक्षा से परिचित हैं। जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने इस विषय पर समूचे यूरोप के एकजुट होने की बात कही है। ऑस्ट्रेलिया ने सुरक्षा कारणों से हाल ही में दो चीनी कंपनियों हुआवेई और जेडटीई के 5जी संचार नेटवर्क उपलब्ध कराने पर रोक लगा दी है। इससे पहले अमेरिका ने हुआवेई के फोन की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था और जेडटीई को अमेरिका में बने उपकरण अपने फोन में इस्तेमाल करने से रोक दिया था। 
 
क्षेत्र के कई देश चीन को लेकर अपने पुराने रुख पर पुनर्विचार कर रहे हैं। इंडोनेशिया के समुद्र में चीन के मछुआरों की नौकाएं देखे जाने के बाद टकराव की स्थिति बन गई थी। इंडोनेशिया ने भारत के साथ गर्मजोशी दिखाते हुए भारतीय नौसैनिक पोतों को मलक्का खाड़ी के निकट सबांग बंदरगाह पर पहुंच मुहैया कराई। ऑस्ट्रेलिया की सरकार और मीडिया में भी चीन को लेकर ठंडापन नजर आ रहा है। ऑस्ट्रेलिया में पिछले वर्ष उस समय कानून बदल दिया गया जब पता चला कि राजनीतिक दलों को दान देने वाले कई चीनी, चीन की सरकार से ताल्लुक रखते हैं। कुछ ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय चीनी विद्यार्थियों पर इतने अधिक निर्भर हो गए हैं कि वे उनके बिना चल नहीं सकते। ट्रंप का शुल्क अमेरिका को भी नुकसान पहुंचाएगा। अधिकांश देशों के कारोबारियों को डर है कि अगर उनकी सरकार चीन के खिलाफ हो गई तो उन्हें चीन के बाजार में नुकसान होगा। ब्याज दरों में इजाफा होने पर अमेरिका में मंदी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। तब ट्रंप की आक्रामकता में कमी आएगी और चीन को एक बार फिर मौका मिलेगा।
Keyword: india, america, china, trade,,
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