बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकिंग के 'आचार्य' का विरल गान
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बैंकिंग के 'आचार्य' का विरल गान

अनूप रॉय /  11 01, 2018

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य

हंसमुख और मिलनसार माने जाने वाले विरल आचार्य आरबीआई के डिप्टी गवर्नर पद पर नियुक्ति के बाद वक्त बीतने के साथ मितभाषी होते गए लेकिन उनका आलोचनात्मक रवैया जारी रहा

विरल आचार्य अपने म्यूजिक बैंड के मुख्य गायक होने के साथ कई एल्बम भी निकाल चुके हैं

बिजनेस स्टैंडर्ड बैंकिंग के भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर पद पर नियुक्ति के बाद अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में विरल आचार्य ने दो परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों के गठन का प्रस्ताव रखा था। इनमें से एक कंपनी निजी क्षेत्र जबकि दूसरी कंपनी सार्वजनिक क्षेत्र में फंसे हुए कर्जों की बढ़ती समस्या से निपटेगी। आरबीआई के किसी वरिष्ठ अधिकारी की तरफ से रखा गया ऐसा प्रस्ताव मौलिक रुप से नई सोच से प्रेरित था। हालांकि रिजर्व बैंक के बाहर इस तरह का विचार लंबे समय से चर्चा में था। खुद आचार्य भी इस मसले पर एक शोध पत्र तैयार कर चुके थे।

21 फरवरी 2017 की उस तारीख को अपना यह भाषण देते समय आचार्य को डिप्टी गवर्नर के तौर पर महज एक महीने ही हुए थे और मीडिया भी उनके बारे में लिखने को आतुर था। वह मजाकिया अंदाज में खुद को न केवल 'गरीबों का रघुराम राजन' बता चुके हैं बल्कि वह रोमांटिक मिजाज के शख्स भी हैं जो अपने म्यूजिक बैंड का मुख्य गायक होने के साथ कई एल्बम भी निकाल चुके हैं। आचार्य का रिज्यूमे 22 पृष्ठ लंबा है जिसमें उनकी शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके विभिन्न शोधपत्रों के विवरण दर्ज हैं।

संभवत: आचार्य केंद्रीय बैंक में उच्च पद पर पहुंचने के लिए काफी कम उम्र के शख्स थे। लेकिन कई बार के संपर्कों में मीडिया ने उन्हें एक दोस्ताना रवैया रखने वाला एक सहज इंसान पाया जो सवालों के जवाब देने के लिए राजी रहता है। धीरे-धीरे मीडिया को यह लगा कि आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल के मितभाषी होने से आचार्य नीतिगत मसलों पर आरबीआई के संभवत: आधिकारिक प्रवक्ता हैं।

लेकिन वे सहजता भरे दिन लंबे समय तक नहीं रहे। कुछ महीनों बाद ही आचार्य एक परहेजी, बोलने से बचने वाले केंद्रीय बैंकर बन गए। वह अपने भाषणों के जरिये ही अपनी बात रखते थे और वे भाषण भी सामान्य तौर पर मीडिया को नहीं बुलाए जाने वाले कार्यक्रमों में ही दिए जाते थे। बाद में उन भाषणों को आरबीआई की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाता था। आज के समय में आचार्य केवल नीतिगत ब्याज दरों की समीक्षा के समय ही मीडिया से मुखातिब होते हैं। इसके बावजूद वह लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं और इसकी कई वजहें हैं। प्रेक्षकों के मुताबिक आचार्य एक ऐसे बुद्धिजीवी के तौर पर सामने आते हैं जो अनूठे तरह के और कभी-कभी विवादास्पद प्रकृति के मुद्दे भी उठाता है और फिर उसे चर्चा के लिए सार्वजनिक पटल पर रख देता है। इस कड़ी में सबसे नया मामला सरकार की सार्वजनिक आलोचना का है।

आचार्य ने सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि आरबीआई की स्वायत्तता से छेड़छाड़ की तगड़ी कीमत वित्तीय अस्थिरता के तौर पर चुकानी पड़ सकती है। अभी यह साफ नहीं है कि उनकी इस राय के लिए क्या वजह जिम्मेदार रही है लेकिन माना जा रहा है कि एनबीएफसी क्षेत्र की तरलता और बैंकों के लिए त्वरित उपतारात्मक कदमों (पीसीए) को ढीला करने के मुद्दे पर आरबीआई को निर्देश जारी किए जाने की पर सरकार की मंशा जिम्मेदार है।

आचार्य ने अपने भाषण ने अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के गवर्नर की विदाई का उदाहरण देते हुए कहा कि उसके तत्काल बाद वहां वित्तीय अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो गई। विश्लेषकों ने आरबीआई गवर्नर पद से डॉ पटेल की संभावित विदाई के इशारे के तौर पर देखा। आचार्य ने 26 अक्टूबर को दिए गए इस भाषण में कहा था, 'केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करने वाली सरकारें देर-सबेर वित्तीय बाजारों के कोप का भाजन बनेंगी। आर्थिक संकट उपजेगा और नियामकीय संस्थान को कमतर करने वाले दिन पर पछतावा किया जाएगा। वहीं केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान करने वाली समझदार सरकारों को कम लागत पर उधारी जुटाने, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का प्यार और लंबा कार्यकाल मिलता है।'

साफ है कि सरकार के अधिकारियों को यह भाषण पसंद नहीं आया। ये अधिकारी निजी बातचीत में आचार्य की खुली आलोचना को 'अपरिपक्व' बता रहे हैं। लेकिन यह कोई पहला वाकया नहीं है जब आचार्य ने अप्रिय स्थिति को न्योता दिया है। इसी साल जनवरी में बैंकों के आला अधिकारी काफी असहज हो गए थे जब आचार्य ने ब्याज दरों के प्रबंधन में अनभिज्ञ बताया था। बैंकरों के संगठन फिम्डा के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आचार्य ने कहा था, 'बैंकों का ब्याज दर जोखिम बार-बार उनके नियामक के जरिये नहीं संभाला जा सकता है। ऐसा लगता है कि अधिकांश बैंकों की निवेश गतिविधि दो चरणों- खरीदो और सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद करो, पर टिकी है। लेकिन कभी भी उम्मीद के सहारे वित्त विभाग की खरीद रणनीति नहीं चल सकती है।' 

उन्होंने यह भी कहा था कि संकट की स्थिति में नियामक का बैंकों की मदद करना 'स्टेरॉयड के इस्तेमाल की तरह है जो आदी बना देता है' और बार-बार उभरने वाले खतरे के तौर पर उसके दीर्घावधि प्रतिकूल प्रभाव नजर आते हैं। साफ है कि बैंकरों को यह बयान पसंद नहीं आया। बैंकरों ने इसका बदला सरकारी बॉन्ड की और खरीद रोककर लिया। हालात इतने बिगड़ गए कि सरकार को दखल देना पड़ा और बॉन्ड खरीदने के प्रति उनकी अनिच्छा की वजह जानने के लिए मजबूर होना पड़ा। आरबीआई में दो साल से अधिक के अपने कार्यकाल में आचार्य बैंकों के बहीखाते में फंसे कर्जों की सफाई को लेकर हमेशा आवाज बुलंद करने वाले शख्स के तौर पर सामने आए हैं। इसके अलावा वह सार्वजनिक क्षेत्र के कमजोर बैंकों के लिए पीसीए मानकों के भी समर्थक हैं। 

अपने हालिया भाषण में भी आचार्य ने यही कहा कि अर्थव्यवस्था में ऋण की किल्लत नहीं होने से पीसीए के तहत बैंक उलटी चाल देख रहे हैं। अभी यह कह पाना मुश्किल है कि आचार्य 2020 में अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद सेवा विस्तार लेना चाहेंगे या न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्टर्न स्कूल ऑफ बिज़नेस में शिक्षण के कार्य में लौटना पसंद करेंगे। हमें उनके निजी जीवन के बारे में बस इतना ही पता है कि उनकी पत्नी और बच्चे भारत में नहीं शिफ्ट हुए हैं। वैसे उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्रीय बैंकिंग की स्याह दुनिया से आचार्य उन दिनों तक लौट पाएंगे जब वह इस बात को लेकर मजाक कर सकेंगे कि महंगाई लक्ष्य का मसौदा तय होने के पहले और बाद में मौद्रिक नीति को किस तरह संचालित किया जाता है? मसौदा तय होने के पहले आरबीआई गवर्नर 'आप के अनुरोध पे' गुनगुनाते थे जबकि अब हालत 'अभी नहीं अभी नहीं, थोड़ा करो इंतजार' वाली हो गई है। 
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