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आरबीआई के गवर्नर समझें अपनी 'आजादी' के मायने

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  November 01, 2018

पिछले कुछ दिनों में हमें ऐसी अटकलें सुनने को मिली हैं कि अगर सरकार ने आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत हासिल शक्तियों का प्रयोग करते हुए भारतीय रिजर्व बैंक को निर्देश जारी किया तो उसके गवर्नर पद से ऊर्जित पटेल इस्तीफा दे देंगे। असल में गलत जानकारी से लैस मीडिया धारा 7 से कुछ उसी तरह नफरत करने लगा है जिस तरह वह आपातकाल के प्रावधान वाले संविधान के अनुच्छेद 352 को नापसंद करता है। शुक्र है कि अब विवेक जागता हुआ दिख रहा है। ऐसा लगता है कि डॉ पटेल अगले साल सितंबर में अपना कार्यकाल खत्म होने तक पद पर बने रहेंगे। बिना किसी लागलपेट के कहूं तो आरबीआई के पहले गवर्नर से लेकर अब तक के सभी गवर्नर मौद्रिक नीति पर मिली स्वतंत्रता का आशय गवर्नरों की स्वतंत्रता से लगाते रहे हैं। गवर्नरों की यह सोच रही है कि वे अकेले ही मौद्रिक नीति बना सकते हैं और उसमें सरकार की कोई राय नहीं होगी।

 
रिजर्व बैंक के गवर्नर का पदभार संभालते समय उन्हें मान्टेग्यु नॉर्मन के नजरिये से अवगत कराना एक अच्छा विचार होगा। वर्ष 1920 से लेकर 1944 तक बैंक ऑफ इंगलैंड के ताकतवर गवर्नर रहे नॉर्मन का मानना था कि सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच रिश्ता 'हिंदू विवाह' की तरह होना चाहिए। इसमें सरकार की भूमिका दबदबा रखने वाले पति की होगी जबकि बैंक ऑफ इंगलैंड मातहत पत्नी की भूमिका में होगा जो सलाह तो दे सकता है लेकिन उस पर अमल के लिए जोर नहीं देता है। लेकिन नॉर्मन की यह सलाह 1935 से अब तक अनसुनी ही रही है। आरबीआई के पहले गवर्नर के तौर पर सर ऑसबर्न स्मिथ ने वर्ष 1935 में कार्यभार संभाला था। इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया (बाद में भारतीय स्टेट बैंक) के प्रबंध निदेशक के तौर पर अपने हिसाब से काम करने के आदी रहे सर ऑसबर्न ने आरबीआई गवर्नर के रूप में भी दिल्ली की सरकार के आगे झुकने से इनकार कर दिया।
 
वायसरॉय परिषद में वित्त सदस्य सर जॉन ग्रिग का दर्जा आज के वित्त मंत्री की तरह था और विनिमय दर एवं सीमा शुल्क पर उनकी राय सर ऑसबर्न से अलग थी। सर ऑसबर्न का मानना था कि विनिमय दर को मुद्रास्फीति बढ़ाने वाले स्तर से नीचे रखना चाहिए। वह बैंक दर को नीचे रखना चाहते थे। लेकिन सरकार इस पर अपने रुख पर डटी रही। हालांकि उन दिनों धारा 7 का अस्तित्व नहीं होने से सर ऑसबर्न को सरकार यह निर्देश नहीं दे सकी कि वह उसके मुताबिक ही काम करें। हालांकि दोनों के बीच मतभेद बढ़ते चले गए। ऑस्ट्रेलिया में पले-बढ़े होने से सर ऑसबर्न जरूरत न होने पर भी कई बार काफी मुखर हो जाते थे। एक बार 1930 में इंपीरियल बैंक का चेयरमैन रहते समय उन्हें भारत सचिव की तरफ से कुछ निर्देश दिए गए तो उन्होंने कहा था, 'कोई भी यही समझेगा कि इंपीरियल (बैंक) सरकार का एक विभाग है और बेहद तुच्छ स्तर का है।' 
 
उन्होंने एक बार सरकार से यह भी कहा था कि 'जब तक मैं इंपीरियल बैंक को चला रहा हूं, तब तक न तो लंदन और न ही कहीं अन्य जगह से मुझे संचालित किया जा सकता है।.. मैं अपने काम में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं बर्दाश्त कर सकता।' उन्होंने वर्ष 1936 में लिखी एक चि_ïी में कहा था कि वह आरबीआई पर प्रभुत्व स्थापित करने की सरकार की कोशिशों से आजिज आ चुके हैं। सर ग्रिग और सर ऑसबर्न के बीच कुछ अन्य मुद्दों पर भी तनाव बना रहा। जब सर ऑसबर्न ने भारत से सोने की निकासी पर एतराज जताया और उस पर निर्यात शुल्क लगाने की मंशा जताई तो सरकार ने उसका पुरजोर विरोध किया। बाद में, सर ऑसबर्न आईसीएस अधिकारी ए डी श्रॉफ को जब अपना डिप्टी गवर्नर नियुक्त करना चाह रहे थे तो सर ग्रिग ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि 'श्रॉफ ऑसबर्न के अंतरंग दोस्त और एक भयावह शख्स' हैं। सर ऑसबर्न की नकारात्मक टिप्पणियां बढ़ती चली गईं। हद तब हो गई जब उन्होंने वायसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो को 'कमजोर गधा' कह दिया। इस तरह आरबीआई गवर्नर के तौर पर दो साल रहने के बाद ही उन्हें जुलाई 1937 में अपने पद से इस्तीफा देने के लिए कह दिया गया। विडंबना यह है कि किसी आईसीएस अधिकारी या अंग्रेज बैंकर की जगह सर ऑसबर्न को आरबीआई के गवर्नर पद पर नियुक्त करने की वजह ही यह थी कि सरकार इस केंद्रीय बैंक की स्वतंत्र हैसियत दिखाना चाह रही थी।
 
ब्रिटिश सिविल सेवकों की सर ऑसबर्न के बारे में राय इससे भी प्रभावित होती थी कि भारतीय व्यवसायी उनकी तारीफ करते थे। उद्योग मंडल इंडियन मर्चेंट चैंबर ने सर ऑसबर्न के इस्तीफे के बाद सर ग्रिग को बेहद कड़े संदेश वाला खत लिखा था। आज की तरह उस समय भी कांग्रेस ने इस विवाद पर सारा ब्योरा सार्वजनिक करने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने उस पर कुछ कहने के बजाय चुप्पी साध ली थी।  रिजर्व बैंक की कमान संभालने वाले महान बैंकरों में शामिल रहे एस एस तारापोर ने एक बार कहा था कि आरबीआई को ऑसबर्न-ग्रिग प्रकरण पर एक पूरा वॉल्यूम जारी करना चाहिए। उससे यह नजर आ सकता है कि हालात में कोई भी बदलाव नहीं आया है।
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