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बदलाव की शुरुआत घर के भीतर से

प्रांजुल भंडारी /  November 01, 2018

वैश्विक वृद्धि दर में आया धीमापन, रुपये में कमजोरी के चलते निर्यात को मिल रहे प्रोत्साहन के बावजूद देश के बाहरी वित्त पर भारी पड़ सकता है। ढांचागत जरूरतों पर विस्तार से बल दे रही हैं प्रांजुल भंडारी

 
वैश्विक परिस्थितियों को लेकर भारत की संवेदनशीलता से सभी वाकिफ हैं। तेल कीमतों में इजाफे ने बीते दो वर्षों के दौरान शुद्ध तेल आयात बिल को जीडीपी के एक फीसदी के स्तर से ऊपर पहुंचा दिया है। बात केवल तेल की नहीं है। गैर तेल क्षेत्र के चालू खाते के घाटे की स्थिति भी खराब हुई है। निवेश चक्र में सुधार होने के पहले आयात में इजाफा होने लगा। इसके लिए प्रमुख तौर पर कोयला, इलेक्ट्रॉनिक्स और कीमत रत्न आदि वजह रहे। सबसे बड़ा कारक है निर्यात। बीते चार साल में गैर तेल निर्यात जीडीपी की तुलना में करीब 4 फीसदी गिरा है।
 
उभरते बाजारों को लेकर विदेशी निवेशकों के मन में बनी इस ऊहापोह के बीच देश में पूंजी की आवक में भी नाटकीय कमी देखने को मिली। देश के भुगतान संतुलन घाटे में इस वर्ष करीब 2,000 करोड़ डॉलर का घाटा दर्ज किया गया है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भुगतान संतुलन का संबंध कमजोर रुपये से है। अगर भुगतान संतुलन घाटा आगे कुछ तिमाहियों तक बरकरार रहता है तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आनी शुरू हो जाएगी। इसका यह अर्थ नहीं कि सबकुछ बुरा ही है। कुछ लोग मानते हैं कि रुपये का मौजूदा अवमूल्यन चालू खाते के घाटे की समस्या को स्वत: सुलझा देगा। वहीं अन्य लोगों का मानना है कि जब भी तेल कीमतों में गिरावट आएगी तब घाटे की यह चिंता स्वत: दूर हो जाएगी।
 
जरूरी नहीं कि ऐसा सोचने वाले गलत हों। हमारा मॉडल बताता है कि अगर अन्य चीजें स्थिर रहती हैं और रुपये में 12 फीसदी तक की गिरावट आती है तो चालू खाते का घाटा स्थिर हो सकता है। निर्यात, खासतौर पर सेवा निर्यात इसमें अहम भूमिका निभाएगा। वह अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएगा और यही बात कुछ आयात पर भी लागू होती है क्योंकि उनके लिए रुपये की लागत बढ़ जाएगी। परंतु क्या हम यह मान सकते हैं अन्य चीजों में कोई बदलाव नहीं आएगा? ऐसा नहीं होगा। हम मानकर चल रहे हैं कि अगले दो वर्षों के दौरान वैश्विक जीडीपी में गिरावट देखने को मिलेगी। हो सकता है अमेरिका में तेजी देखने को मिले लेकिन शेष विश्व में पहले ही गिरावट की शुरुआत हो चुकी है। इसके लिए बढ़ती अमेरिकी ब्याज दरें, उच्च तेल कीमतें और मौजूदा कारोबारी तनाव उत्तरदायी है।
 
इन बातों का क्या असर होगा? दो परिदृश्य उभरकर सामने आ सकते हैं: पहला, वैश्विक वृद्धि में गिरावट के बावजूद देश की जीडीपी वृद्धि दर में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। इसमें यह बात भी निहित है कि शेष विश्व के साथ भारत की वृद्धि का अंतर बढ़ेगा। निर्यात की तुलना में आयात कहीं अधिक तेजी से बढ़ सकता है  और इससे चालू खाते का घाटा बढ़ेगा। यह सही है कि शेष विश्व की तुलना में बढ़ती वृद्धि दर और अधिक पूंजी लेकर आएगी। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी शामिल है। बहरहाल, हो सकता है यह पर्याप्त नहीं हो क्योंकि वृद्धि की दृष्टि से संवेदनशील पूंजी अक्सर समग्र आवक पूंजी का एक हिस्सा भर होती है। दूसरी बात, ब्याज की दृष्टि से संवेदनशील पूंजी भंगुर बनी रहेगी क्योंकि अमेरिका ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर रहा है और इस प्रकार निवेशकों को पहले की तुलना में अधिक प्रतिफल भी दे रहा है। हमारा अनुमान है कि अगले दो वर्ष तक भुगतान संतुलन का घाटा 1,000 से 1,500 करोड़ डॉलर के बीच रहेगा।
 
दूसरी स्थिति में भारत की जीडीपी वृद्धि दर वैश्विक वृद्धि के समांतर कम हो सकती है। इससे वृद्धि का अंतर कम होगा और भारत का चालू खाते का घाटा कम होगा। ऐसा केवल तभी हो सकता है जबकि हमारा आयात, निर्यात की तुलना में धीमी गति से बढ़े। फंडिंग के मोर्चे पर देखें तो वृद्धि के अंतर में गिरावट होने से वृद्धि की दृष्टि से संवेदनशील पूंजी आसानी से देश में नहीं आएगी। हमारे विश्लेषण के मुताबिक ऐसा होने पर भी भुगतान संतुलन घाटा पहले परिदृश्य के अनुरूप रहेगा। इस पूरे आकलन के लिए हमने तेल कीमतों के औसतन 80 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान रखा है। अगर धीमी वैश्विक वृद्धि दर से तेल कीमतों में कमी आती है तो इससे देश का चालू खाते का घाटा और भुगतान संतुलन की समस्या कम करने में मदद मिल सकती है। परंतु तेल कीमतों के इर्दगिर्द व्याप्त अनिश्चितता को देखते हुए पूरी तरह उन पर निर्भर रहना सही नहीं होगा।
 
क्या भुगतान संतुलन के घाटे से निपटने का कोई स्थायी तरीका है? निश्चित तौर पर ऐसा है। अगर घरेलू गतिरोधों को बड़े पैमाने पर कम किया जाए तो आयात प्रतिस्थापन और निर्यात वृद्धि दोनों को सहायता मिल सकती है। हमारे मॉडल के मुताबिक सरकार को चालू खाते के घाटे को कम करके वृद्धि आधारित पूंजी की आवक सुनिश्चित करने के स्तर तक लाने के लिए घरेलू अवरोधों को तेजी से दूर करना होगा। घरेलू गतिरोधों को दूर करने से क्या तात्पर्य है? पहला, समेकित सरकारी बुनियादी व्यय में बढ़ोतरी करके घरेलू बुनियादी ढांचे में सुधार करना, अटकी हुई निवेश परियोजनाओं को शुरू करना और निजी-सार्वजनिक साझेदारी फंडिंग मॉडल को नए सिरे से शुरू कर इस क्षेत्र में व्यय बढ़ाना। जमीन अधिग्रहण और श्रमिकों को काम पर रखने के मामले में नियामकीय बोझ को सुसंगत बनाने से भी मदद मिल सकती है। दूसरी बात, निर्यात आधारित बुनियादी सुविधाओं में सुधार करने और कारोबारी माहौल में सुधार से भी सहायता मिल सकती है। उदाहरण के लिए सिंचाई पर केंद्रित व्यय से कृषि निर्यात बढ़ाने में मदद मिल सकती है। बेहतर गोदाम सुविधाओं से अधिकांश वस्तु निर्यातकों को सहायता मिल सकती है। कारोबारी सुगमता के मामले में भारत को 190 देशों की सूची में 146वां स्थान हासिल है। सीमा शुल्क की औपचारिकताएं कम करने और लॉजिस्टिक्स को सहज बनाने से भी इस दिशा में सार्थक प्रगति हो सकती है। 
 
एफडीआई आकर्षित करने के लिए उठाए जाने वाले कदम भी मददगार हो सकते हैं। हमने पाया कि मध्यम तकनीक वाले क्षेत्रों मसलन आभूषण, रत्न और तेल उत्पादों तथा उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों मसलन इंजीनियरिंग उत्पादों में एफडीआई से निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है। क्षेत्रवार कारक भी बड़ा अंतर पैदा कर सकते है। कुछ विसंगतियां दूर करके वस्त्र निर्यात बढ़ाया जा सकता है। आखिर में, निर्यात कारक के रूप में विनिमय दर की सीमा को समझने की आवश्यकता है। बीते कुछ वर्षों में ज्यादातर मामलों में रुपये की मजबूती को निर्यात के कुछ क्षेत्रों में गिरावट से समझा गया है। रुपये का अवमूल्यन भुगतान संतुलन की सारी समस्या हल नहीं कर सकता।
 
(लेखिका एचएसबीसी सिक्युरिटीज ऐंड कैपिटल मार्केट (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड की भारत संबंधी मुख्य अर्थशास्त्री हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।)
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