बिजनेस स्टैंडर्ड - धारा 7 से आरबीआई को साधेगी सरकार!
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धारा 7 से आरबीआई को साधेगी सरकार!

सोमेश झा /  10 31, 2018

आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 7

सरकार ने आरबीआई को लिखी चिट्ठी में रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7 के इस्तेमाल के संकेत दिए हैं। पहले कभी भी सरकार ने इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया है

बिजनेस स्टैंडर्ड धारा 7 से आरबीआई को साधेगी सरकार!भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ जारी तनातनी के बीच सरकार की तरफ से भेजे गए पत्र में अहम नियामकीय मुद्दों पर बैंकिंग नियामक के साथ परामर्श की मंशा जताई गई है। इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक के कामकाज से संबंधित कानून आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 7 में वर्णित प्रावधानों का उल्लेख भी किया गया है। यह कानून लागू होने के बाद अभी तक किसी भी सरकार ने इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया है। सूत्रों के मुताबिक सरकार ने रिजर्व बैंक को लिखे पत्र में संकेत दिए हैं कि वह उसे निर्देश देने के लिए आरबीआई अधिनियम की धारा 7 का इस्तेमाल कर सकती है। खास बात यह है कि अब तक किसी भी सरकार ने 74 साल पुराने कानून के इस प्रावधान के तहत आरबीआई को बाध्यकारी निर्देश नहीं जारी किए हैं।

आरबीआई अधिनियम की धारा 7 में क्या है?

इस धारा के मुताबिक केंद्र सरकार अगर 'जनहित में जरूरी' समझती है तो आरबीआई के गवर्नर के साथ परामर्श के बाद आरबीआई को निर्देश जारी कर सकती है। कानून की इस धारा में आरबीआई के प्रबंधन से जुड़े प्रावधान किए गए हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कुछ महीने पहले बिजली कंपनियों की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान भी यह प्रावधान चर्चा में आया था। दरअसल बिजली कंपनियों ने आरबीआई की तरफ से गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) मानकों में बरती गई सख्ती को अदालत में चुनौती दी थी। आरबीआई का यह कदम '12 फरवरी परिपत्र' के तौर पर अधिक मशहूर है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में क्या हुआ था? 

न्यायालय ने आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा 7 के तहत रिजर्व बैंक के साथ परामर्श करने का केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए 15 दिनों के भीतर बिजली कंपनियों के फंसे कर्ज पर कोई राह निकालने को कहा था। लेकिन सरकार ने इस प्रावधान का इस्तेमाल करना उचित नहीं समझा।

सरकार आरबीआई को दे सकती है निर्देश? 

इसका जवाब हां है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी यही कहा था। न्यायालय ने 28 अगस्त को सुनाए अपने फैसले में कहा था, 'केंद्र सरकार से यह अपेक्षा नहीं है कि वह धारा 7(1) के तहत कोई भी निर्देश भेदभावपूर्ण तरीके से देगी। ऐसे निर्देश समर्थन में समुचित तथ्य होने पर ही दिए जा सकते हैं।' अभी तक किसी भी सरकार ने आरबीआई को नियामकीय एवं नीतिगत मसलों पर निर्देश देने के लिए इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया है।  आरबीआई का पक्ष रखने वाले वकील ने कहा था कि आरबीआई अधिनियम की धारा 7 सभी सवालों के समाधान का एक मंच मुहैया कराती है और एक तरह से संघर्ष वाले मसलों से निपटने का एक संग्राहक व्यवस्था है। उन्होंने दलील थी कि सरकार की तरफ से अब तक इसका इस्तेमाल नहीं करने का मतलब है कि संघर्ष की स्थिति नहीं बनी है और एनपीए मानकों पर रिजर्व बैंक के सख्त रवैये से सरकार भी सहमत है। सुनवाई के दौरान सरकार ने धारा 7 के इस्तेमाल की मंशा को लेकर चुप्पी साध रखी थी।

हालांकि इसी तरह के प्रावधान अन्य नियामकीय संस्थाओं के संदर्भ में भी मौजूद हैं। मुंबई के एक वकील कहते हैं कि बीमा नियामक आईआरडीएआई और दूरसंचार नियामक ट्राई के गठन वाले कानूनों में भी सरकार को खास स्थितियों में निर्देश देने के अधिकार दिए गए हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह मानना था कि किसी नीतिगत या नियामकीय मसले पर सरकार और आरबीआई असहमति की स्थिति में पहुंच जाते हैं तो सरकार को यह देखना होगा कि क्या आरबीआई अधिनियम की धारा 7 के तहत परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने के हालात बन चुके हैं?

न्यायालय ने जोसफ कुरुविला वेल्लुकनेल बनाम रिजर्व बैंक मामले में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा था, 'एक विवेकपूर्ण संस्था होने के बावजूद रिजर्व बैंक सरकार के प्रति जवाबदेह है और सशक्त एवं मुखर जनभावना को ध्यान में रखना होगा। अगर रिजर्व बैंक दुर्भावनापूर्ण तरीके से काम करता है तो केंद्र सरकार और अंत में अदालतों को दखल देना होगा।' उच्च न्यायालय ने कहा था कि आरबीआई अधिनियम में धारा 7 का प्रावधान रखने के पीछे यह मंशा थी कि 'दोनों ही पक्ष किसी विवाद की स्थिति में सद्भावनापूर्ण समाधान तक पहुंच सकें।'

विभिन्न व्याख्या एवं मसले

इस प्रावधान का अतीत में कभी इस्तेमाल नहीं होने से इसकी व्याख्या अलग-अलग ढंग से की जाती रही है। मसलन, एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि यह प्रावधान केवल रिजर्व बैंक के प्रबंधन से संबंधित है और सरकार के पास नीतिगत मसलों पर आरबीआई को निर्देश देने का अधिकार नहीं देता है।पहले वित्त मंत्रालय धारा 7 के तहत निर्देशात्मक प्रावधान का इस्तेमाल करने के पक्ष में नहीं था। बिज़नेस स्टैंडर्ड के पास उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक वित्त मंत्राल. ने 12 फरवरी परिपत्र के संदर्भ में कहा था कि इन शक्तियों के इस्तेमाल से मामला कानूनी प्रक्रिया तक जा सकता है लिहाजा मजबूत कानूनी आधार होना जरूरी है। हालांकि केंद्र ने नोटबंदी के मसले पर सुनवाई के दौरान जनवरी 2017 में धारा 7 का जिक्र करते हुए कहा था कि उसके पास रिजर्व बैंक को निर्देश देने की शक्तियां हैं। उस समय सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में कहा था, 'केंद्र सरकार के पास आरबीआई के प्रबंधन को नियंत्रित करने की शक्ति है और वांछित उद्देश्य की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक को उसके हिसाब से काम करना होगा।' 

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने इस साल जनवरी में जारी एक रिपोर्ट में कहा था कि आरबीआई अधिनियम में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जो सरकार से इसकी स्वतंत्रता को कमतर बनाते हैं। उसने इस दावे के समर्थन में धारा 7 का ही उदाहरण दिया था। मुद्राकोष ने भारत के वित्तीय आकलन पर जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था, 'इन प्रावधानों को कभी व्यवहार में नहीं लाने के बावजूद ये नियम नियामकीय प्राथमिकताओं के संदर्भ में सरकार को विवेकाधिकार देते हैं।'

धारा 7 का इतिहास

आरबीआई ने सरकार की तरफ से निर्देश जारी किए जाने की शक्तियों पर बैंक ऑफ इंग्लैंड अधिनियम 1946 और कॉमनवेल्थ बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया 1945 के प्रावधानों को समाहित करते हुए एक मसौदा तैयार किया था। इस मसौदे में रिजर्व बैंक ने कहा था कि आरबीआई अधिनियम से यह साफ है कि जब सरकार रिजर्व बैंक गवर्नर की सलाह के खिलाफ काम करने का निर्णय लेती है तो फिर उसे ही उस फैसले की जिम्मेदारी लेनी होगी। आरबीआई के इतिहास पर तैयार पहले संस्करण (1935-1951) में इसका जिक्र है। तत्कालीन सरकार आरबीआई कानून में यह प्रावधान करने के लिए राजी नहीं हुई। उसमें दोबारा बदलाव किए गए। आरबीआई चाह रहा था कि सरकार के निर्देश पर किए जाने वाले कार्यों की जिम्मेदारी सरकार पर डाली जाए। लेकिन 1949 में अधिनियम को संशोधित कर यह प्रावधान किया गया कि जनहित में सरकार आरबीआई को निर्देश दे सकती है। 
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