बिजनेस स्टैंडर्ड - सुधार के पहले और बिगड़ सकते हैं हालात
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सुधार के पहले और बिगड़ सकते हैं हालात

बाजार संकेतक
देवांग्शु दत्ता /  October 31, 2018

परेशान करने वाली खबरों का सिलसिला जारी है। वित्त मंत्रालय की तमाम कवायदों के बावजूद यह निश्चित लग रहा है कि राजकोषीय घाटा तय लक्ष्य से पार जाएगा। व्यापार घाटे में भी लगातार इजाफा हो रहा है। सीबीआई प्रकरण को उदाहरण मानें तो राजनीतिक प्रतिष्ठान अपनी ही समस्याओं में उलझा हुआ है। कई अहम राज्यों के विधानसभा चुनाव करीब हैं और सर्वेक्षणों की मानें तो भारतीय जनता पार्टी को कई प्रमुख राज्यों में अपनी पकड़ बरकरार रखने में दिक्कत हो सकती है। इस बीच कारोबारी नतीजों से यही पता चल रहा है कि खपत पहले लगाए गए अनुमानों से कम रह सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि दूसरी छमाही में आय में कमी आ सकती है।

 
वैश्विक वृद्धि के अनुमानों में कटौती की जा रही है। इसका एक लाभ तेल कीमतों की सीमा तय करने के रूप में सामने आ सकता है। परिणामस्वरूप तेल कीमतों में कुछ कमी आई है लेकिन एक तथ्य यह भी है कि अमेरिका ईरान को बाजार से बाहर करने की कोशिश कर रहा है। हम न्यूनतम यही अपेक्षा कर सकते हैं कि इस वर्ष कच्चे तेल का बिल करीब 35 फीसदी ऊपर रहेगा।  राजकोषीय घाटा वर्ष की पहली छमाही में ही पूरे साल के लक्ष्य के 95 फीसदी तक पहुंच गया। यह वर्ष 2017-18 से भी खराब प्रदर्शन है जब यह करीब 91 फीसदी था। वर्ष 2017-18 में भी हम लक्ष्य को पार कर गए थे। वर्ष 2018-19 के आंकड़ों को राष्ट्रीय अल्प बचत फंड और वस्तु एवं सेवा कर संग्रह के रूप में अलग-अलग करके सरकारी व्यय को बजट से परे रखा जा सकता है। मुनाफे में चलने वाले सरकारी उपक्रम और रिजर्व बैंक का हिस्सा पहले ही आरक्षित है। चाहे जो भी हो राजकोषीय घाटे का तय सीमा से पार जाना तय है। इसके जीडीपी के 3.5 फीसदी से पार जाना तय माना जा रहा है। कुछ लोगों ने तो 4 फीसदी का अनुमान भी पेश किया है। पहली छमाही में व्यापार घाटा बढ़कर 9,400 करोड़ डॉलर हो गया है। यह वर्ष 2017-18 की समान अवधि से 2,000 करोड़ डॉलर अधिक है। सितंबर में निर्यात में कमी आई है जो कमजोर होते रुपये के लिए चिंतित करने वाला संकेत है। यह वैश्विक मंदी के अनुमान के अनुरूप ही है। विश्व बैंक ने वर्ष 2019 के वैश्विक जीडीपी अनुमान में कटौती की है। चालू खाते का घाटा जीडीपी के 2.6 फीसदी के बराबर रहेगा और यह 3 फीसदी के स्तर पर भी जा सकता है।
 
कमजोर रुपये ने कच्चे माल की कीमतों को प्रभावित किया है और उच्च आयात शुल्क ने कई वस्तुओं की कीमत बढ़ा दी है। मार्जिन का दबाव दूसरी तिमाही के नतीजों में भी देखने को मिला जहां कई कंपनियों का परिचालन मार्जिन गिरा और ब्याज दर की लागत बढ़ी। अब खपत पर असर पड़ सकता है। उदाहरण के लिए मारुति के वाहनों की बिक्री में कमी आई है। अक्टूबर में वाहनों की बिक्री के आंकड़े और परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स के आंकड़े का इंतजार रहेगा क्योंकि यह त्योहारों का मौसम है। अगर कोई बड़ी तेजी देखने को नहीं मिली तो माना जाएगा कि वर्ष की दूसरी छमाही में भी खपत धीमी रहेगी। विश्लेषक अब निफ्टी के लिए पूरे वर्ष की आय वृद्धि के 6-8 फीसदी रहने की बात कह रहे हैं जबकि पहले इसके 15 फीसदी से अधिक रहने का अनुमान जताया गया था। 
 
म्युचुअल फंड के आंकड़े भी जानकारीपरक होंगे। एनबीएफसी संकट के चलते नकदीकृत फंड से तेज स्थानांतरण देखने को मिला है। आरबीआई के हस्तक्षेप से कुछ नियंत्रण हुआ है लेकिन फिर भी बॉन्ड प्रतिफल काफी अधिक रहा है। इक्विटी क्षेत्र में खुदरा आवक में कमी रही है। शेयर बाजार भी संकट में रहेंगे। अक्टूबर में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 24,000 करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली की। उन्होंने 11,400 करोड़ रुपये के डेट की भी बिकवाली की। घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 21,000 करोड़ रुपये की खरीदारी की लेकिन वह पर्याप्त नहीं थी। 
 
दीवाली के पश्चात आमतौर पर खुदरा इक्विटी निवेशक दूरी बनाए रखते हैं। यह निवेश के बजाय खपत का समय है। परंतु इक्विटी फंड क्षेत्र की खुदरा आवक की बात करें तो व्यवस्थित निवेश योजनाएं बाजार की दृष्टिï से अहम हैं। जहां आगामी कारोबारी नतीजों की बात है तो सरकारी बैंक और सरकारी तेल रिफाइनरी विपणन क्षेत्र सर्वाधिक संवेदनशील होंगे। हर किसी को यह देखने की आवश्यकता है कि फंसी हुई परिसंपत्तियों का रुख क्या है और इस दृष्टिï से बड़े सरकारी बैंकों की भूमिका अहम है। ऋण वृद्घि में तब तक सुधार नहीं होगा जब तक कि बैलेंस शीट स्थिर नहीं हो जाती। चूंकि ब्याज की लागत बढ़ रही है कि इसलिए बहुत अधिक सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती। परंतु बाजार हालात सुधरने के कुछ संकेतों से भी प्रसन्न हो जाएगा।
 
नवंबर 2011 के बाद वैश्विक बाजारों को सबसे बुरे महीने का सामना करना पड़ा। उस समय ग्रीक संकट बढ़ रहा था। अभी अमेरिका-चीन व्यापारिक युद्घ, ईरान पर प्रतिबंध बढ़ाने की आशंका, ब्रेक्सिट, अमेरिका में मध्यावधि चुनाव की आशंका, जर्मनी में एंगेला मर्केल की चुनावी पराजय की आशंका और इटली में अस्थिरता आदि कारक हावी रहे। अमेरिकी बॉन्ड बाजार का प्रतिफल अब ट्रेजरी बिल से 3 फीसदी अधिक है जबकि अधिकांश वैश्विक शेयर बाजार इस वर्ष घाटे में चल रहे हैं।  तकनीकी तौर पर देखा जाए तो बाजार सूचकांक 200 दिन के औसत से नीचे कारोबार कर रहे हैं। यानी उनका प्रदर्शन 10 महीने पहले की तुलना में खराब है। अधिकांश जानकारों का कहना है कि हालात सुधरने के पहले अभी और बिगड़ सकते हैं। दिसंबर के आरंभ में आने वाले विधानसभा चुनाव नतीजे भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं। 
Keyword: fiscal deficit, ICRA, GDP, राजकोषीय घाटा,
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