बिजनेस स्टैंडर्ड - एनबीएफसी तनाव से उपजे कुछ सबक
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एनबीएफसी तनाव से उपजे कुछ सबक

आकाश प्रकाश /  October 31, 2018

एनबीएफसी क्षेत्र अंशधारकों को मिलने वाले प्रतिफल के मामले में पिछले कुछ समय से बाजार का नेतृत्वकर्ता बना रहा है लेकिन यह सिलसिला आगे जारी रहता नहीं दिखता। बता रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
आईएलऐंडएफएस के पहले डिफॉल्ट को करीब दो महीने बीत चुके हैं। तब से अब तक काफी कुछ देखने को मिला है। डेट बाजार चुनिंदा इश्यूअर्स के लिए जाम हैं, रिजर्व बैंक को और अधिक नकदी डालने के लिए मजबूर होना पड़ा है और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को लेकर भरोसा कम हुआ है। इनमें आवास वित्त कंपनियां भी शामिल हैं। शेयर बाजार में कई एनबीएफसी के शेयर 30 से 40 फीसदी तक गिर गए। यह नुकसान अन्य क्षेत्रों तक फैल गया। मिड कैप सूचकांक डॉलर में 35 फीसदी तक गिर गए हैं और स्मॉल कैप सूचकांक करीब 15 फीसदी नीचे जा चुके हैं। निवेशकों का भरोसा हिला हुआ है। हर कोई संकट का पहला संकेत दिखते ही बिकवाली करना चाहता है। अटकलों का बाजार गर्म है। हर कोई किसी बड़े डिफॉल्टर और उसके प्रमुख ऋणदाताओं के बारे में कुछ कहना चाहता है। 
 
यह जरूरी है कि बाजार और निवेशक थोड़ा ठहरकर आश्वस्त हों। यह घबराने का वक्त नहीं है। यह भारत के लिए लीमन ब्रदर्स जैसी घटना नहीं है और पूरा वित्तीय तंत्र इसकी चपेट में नहीं आने वाला है। हालांकि बीते कुछ महीनों के दौरान संकट के सामने आने के बाद सभी निवेशकों के लिए कुछ अहम सबक रहे हैं। पहली बात तो यही कि आईएलऐंडएफएस या उसकी अनुषंगी कंपनियों के समक्ष हर किसी किसी का ऋण जोखिम था। इंडसइंड बैंक, फेडरल बैंक और बंधन बैंक से लेकर पर्सिस्टेंट सॉफ्टवेयर और एचडीएफसी तक लगभग हर वित्तीय संस्थान, जिसने इस तिमाही में आय दर्शाई है, उसका ऋण जोखिम इनके समक्ष है। इससे पता चलता है कि हमारे वित्तीय तंत्र में आईएलऐंडएफएस की कितनी गहरी पैठ है। इससे यह भी पता चलता है कि भारी छूट वाले वित्तीय संस्थान जिनका प्रबंधन सही नहीं हो, जो नियामकीय कमी से जूझ रहे हों और जिनका स्वामित्व ढांचा अस्पष्टï होने के बावजूद जो 90,000 करोड़ रुपये का कर्ज जुटाने में सफल हों, वे कितने जोखिम भरे हो सकते हैं। हालांकि कर्ज काफी बंटा हुआ है इसलिए यह किसी एक संस्थान का भी ऋणशोधन नहीं कर सकता। 
 
आईएलऐंडएफएस मामला बताता है कि कर्जदारों को डेट बाजार का इस्तेमाल करने पर मजबूर करना ऋण जोखिम के स्वरूप को बदलता है और व्यापक व्यवस्थागत जोखिम को कम करता है। आईएलऐंडएफएस के कर्ज में कम से कम 30 से 40 फीसदी की कमी की जाएगी लेकिन यह समूचे वित्तीय तंत्र में फैली होगी। इसे समझना तब तक आसान नहीं जब तक कि यह समझा जाए कि कैसे नोटबंदी ने एनबीएफसी को लाभ पहुंचाया। नोटबंदी के बाद व्यवस्था में नकदी की स्थिति नाटकीय ढंग से सुधरी क्योंकि वित्तीय जमा में इजाफा हुआ। बचत के इस वित्तीयकरण का असली फायदा गैर बैंकिंग संस्थानों को मिला। उनको बाजार से लंबी अवधि की सस्ती फंडिंग मिल गई। एनबीएफसी के लिए यह सुनहरा दौर था। नकदी आसानी से उपलब्ध थी, दरें कम थी, थोक फंड तक पहुंच आसान थी। ऋण देने की गुंजाइश थी क्योंकि सरकारी बैंक सुसुप्तावस्था में थे। निवेशक और कंपनियां दोनों यह मान बैठे कि यह सिलसिला चलता रहेगा। मूल्यांकन में 30 फीसदी तक की वृद्घि देखने को मिली। जरा सा भी अनुभव रखने वाला व्यक्ति एनबीएफसी की स्थापना कर डेट और इक्विटी जुटा सकता था। अब यह सिलसिला खत्म हो चुका है। मूल्यांकन में कमी आ चुकी है। एक समान एनबीएफसी, जिनकी खास वर्ग तक पहुंच नहीं हो, उन्हें एक बार फिर नकदी और वृहद अर्थव्यवस्था पर दांव लगाना होगा। नकदी की प्रचुरता होगी तो उनका प्रदर्शन अच्छा होगा और विपरीत हालात में खराब। 
 
तीसरा मुद्दा है समूचे एनबीएफसी क्षेत्र का आकार और उसकी महत्ता। एनबीएफसी अब कुल व्यवस्थित ऋण में 18 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं और बीते दो वर्षों में वे 30 से 35 फीसदी व्यवस्थित ऋण के लिए उत्तरदायी रहे हैं। यह भी स्पष्ट नहीं था कि डेट और म्युचुअल फंड ने अपने परिसंपत्ति प्रबंधन का 30 फीसदी एनबीएफसी में रखा था। भारतीय वित्तीय तंत्र की एक विशेषता है। हमारे सरकारी बैंकों के पास अतिरिक्त नकदी है लेकिन पूंजी का अभाव है। नकदी इसलिए है क्योंकि जमा में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी अच्छी खासी है। वे ऋण इसलिए नहीं दे पाते क्योंकि या तो वे तत्काल सुधार की प्रक्रिया में हैं या उनके पास पूंजी नहीं है। हमारे एनबीएफसी के पास नकदी नहीं है, जमा नहीं है लेकिन पूंजी है। वे निवेशकों से भी और अधिक पूंजी जुटाने की स्थिति में हैं। यह व्यवस्था कारगर रही क्योंकि बैंकों से नकदीकरण एनबीएफसी की ओर आता रहा। बैंकों की अतिरिक्त नकदी का इस्तेमाल कर पूंजी बढ़ाने और अधिकतम ऋण वितरण सुनिश्चित करने का यही श्रेष्ठ तरीका था। अगर बैंक एक रुपये खर्च कर एएए श्रेणी का एनबीएफसी पेपर खरीदते हैं तो उनको केवल 25 आधार अंक पूंजी की आवश्यकता होती है। अगर बैंकों को यही राशि सीधे ऋण में देनी पड़े तो उनको 100 आधार अंक पूंजी की आवश्यकता होगी। अगर अब बैंक एएए या एए श्रेणी के एनबीएफसी पेपर खरीदने से दूरी बनाते हैं तो नकदी हस्तांतरण की यह प्रक्रिया रुक जाएगी। ऋण की उपलब्धता में कमी नजर आएगी क्योंकि सरकारी बैंकों के पास अपनी नकदी को प्रभावी रूप से ऋण के रूप में देने के लिए राशि नहीं बचेगी। इन सब बातों का असर आर्थिक वृद्धि पर पड़ेगा।
 
एक क्षेत्र जिसे निस्संदेह संकट का सामना करना पड़ेगा वह हैं अचल संपत्ति डेवलपर। इस क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में एनबीएफसी का ऋण जोखिम उसकी सालाना वृद्धि दर का 50 से 60 फीसदी रहा है और वह इन डेवलपरों को दिए जाने वाले अधिकांश नए ऋण से संबंधित है। एनबीएफसी को अपना कारोबार सीमित करना पड़ा तो कई डेवलपरों तक ऋण की आवक भी सीमित हो जाएगी। महंगे अचल संपत्ति बाजारों की खस्ता हालत के चलते उनको अपनी इन्वेंटरी जल्दी निपटाने में मुश्किल आएगी। बचाव के लिए बैंक आगे नहीं आ पाएंगे क्योंकि वे अचल संपत्ति क्षेत्र को लेकर अपना जोखिम नहीं बढ़ाना चाहते। या फिर उनके पास पूंजी की कमी है। कमजोर डेवलपरों का दबाव में आना तय है ऐसे में और अधिक डिफॉल्ट देखने को मिलेंगे। बाजार को यही आशंका है। जिन एनबीएफसी का अचल संपत्ति में अधिक ऋण जोखिम है वे सबसे अधिक दबाव में हैं और उन पर सबकी नजर रहेगी। अचल संपत्ति क्षेत्र का कर्ज 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है और इसका आधार विनिर्माण क्षेत्र के ऋण में है। अगर यहां डिफॉल्ट हुआ तो यह बड़ा संकट होगा। लब्बोलुआब यह कि एनबीएफसी क्षेत्र बीते कुछ वर्षों से बाजार में अग्रणी रहा है। परंतु अब लगता नहीं कि उसका यह दबदबा आगे कायम रह पाएगा। 
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