बिजनेस स्टैंडर्ड - ऐसे बनी लौह पुरुष की फौलादी प्रतिमा
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ऐसे बनी लौह पुरुष की फौलादी प्रतिमा

रंजू सरकार /  10 30, 2018

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

परियोजना की लागत 30 अरब रुपये बिजनेस स्टैंडर्ड ऐसे बनी लौह पुरुष की फौलादी प्रतिमा
इस्तेमाल की गई सामग्री
2,10,000 घन मीटर कंक्रीट
6,500 टन संरचनात्मक इस्पात
18, 500 टन मजबूती प्रदान करने वाला इस्पात
1,700 टन कांस्य आवरण
परियोजना पूर्ण होने की अवधि
13 महीने और इंजीनियरिंग की अवधि
33 महीने निर्माण की अवधि है एक रिकॉर्ड

गुजरात के नर्मदा जिले की सभी सड़कें आजकल केवडिया की तरफ जाती नजर आ रही हैं। दुनिया  की सबसे बड़ी सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा लगभग तैयार हो चुकी है। इस शहर में वरिष्ठ अधिकारियों का आना-जाना शुरू हो चुका है। यहां उमड़ रही भीड़ को खाने-पीने की सेवाएं देने में छोटे रेस्तरां तत्पर दिख रहे हैं। स्कूलों और हॉस्टलों में सैन्य बलों और अधिकारियों के रहने का इंतजाम किया जा रहा है। बुधवार को प्रधानमंत्री द्वारा इस प्रतिमा का उद्घाटन करेंगे।

करीब 182 मीटर लंबी की इस प्रतिमा को 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' नाम दिया गया है। यह नाम सरदार पटेल की रियासतों को भारत संघ में मिलाने की उनकी अहम भूमिका के सम्मान के तौर पर दिया गया है। इस मूर्ति की ऊंचाई अमेरिका की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से दोगुनी है। यह प्रतिमा नर्मदा नदी के किनारे तैयार की गई है और इसका अग्रभाग सरदार सरोवर बांध (पटेल की कल्पना वाला बांध) की तरफ है जिससे गुजरात में जल की ज्यादातर आपूर्ति होती है। यह केवडिया से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है जो दरअसल बांध के लिए तैयार की गई एक आवासीय कॉलोनी है जो अब खाली पड़ी है। 

उद्घाटन की तैयारियों के बीच कामगार विशिष्ट मेहमानों के प्रतिमा तक जाने वाले रास्तों की साफ-सफाई में जुटे हैं। केवडिया में मौजूद सर्किट हाउस भी पूरी तरह भर चुका है जहां राज्य के विभिन्न हिस्से से आए अधिकारी मौजूद हैं। बड़ौदा-केवडिया राजमार्ग पिछले साल तक एक लेन का था जिसे अब फोरलेन राजमार्ग में बदल दिया गया है। जब से इस विशालकाय प्रतिमा का काम शुरू हुआ है यहां के कारोबार में 20 गुना तक की बढ़ोतरी हुई है।

सरदार पटेल की मूर्ति का सबसे आकर्षक पहलू यह है कि इस मूर्ति की 135 मीटर की ऊंचाई पर एक गैलरी मौजूद है जहां से शानदार प्राकृतिक नजारे देखे जा सकते हैं। सबसे नीचे एक प्रदर्शनी हॉल है जहां पटेल के जीवन का वर्णन करती हुई चीजें हैं। जैसे ही आप प्रतिमा वाले क्षेत्र में प्रवेश करेंगे वहां बाईं तरफ एक फूड कोर्ट है जहां आप जलपान का लुत्फ उठा सकते हैं। इसके ऊपर भी एक गैलरी है जहां से सामने बहती नदी को देखा जा सकता है। नव निर्मित पुल में रास्ते काफी अच्छी तरह से बनाए गए हैं जहां से पैदल चलकर पर्यटक प्रदर्शनी हॉल और प्रतिमा के पास पहुंच सकते हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड ऐसे बनी लौह पुरुष की फौलादी प्रतिमाजहां यह मूर्ति बनाई गई है वह मूलत: एक पहाड़ी टीला था जिसे साधु बेट कहा जाता था। इस प्रतिमा को तैयार करने के लिए इस टीले को सपाट किया गया जो नदी तल से 240 मीटर ऊंचा था। यह क्षेत्र बांध द्वारा छोड़े गए पानी से घिरा होगा जहां पर्यटक बोट के जरिये इस मूर्ति का चक्कर लगा सकते हैं। इसके अलावा यहां एक तीन सितारा होटल, दो टेंट सिटी और नदी के दोनों तरफ वन क्षेत्र तैयार किया जाएगा। केवडिया में एक रेल लिंक भी होगी जबकि एक हवाईपट्टïी नजदीक के राजपिपला में होगी जिसे अपग्रेड किया जाएगा और यहां 30 सीटों वाले विमानों की सेवाएं दी जाएंगी। 

एक टेंट सिटी बांध के बगल में जबकि दूसरा बांध के नजदीक की एक पहाड़ी से लगा होगा। ये टेंट सिटी लगभग तैयार हो चुके हैं और एक होटल, इस परिसर के प्रवेश पर ही तैयार हो रहा है जो सरदार सरोवर निगम लिमिटेड के दफ्तर की उलटी दिशा में और मूर्ति से तीन किलोमीटर पहले ही है। यहां 800 कारों के लिए एक पार्किंग क्षेत्र भी तैयार किया जाएगा और पर्यटकों को बसों के जरिये प्रतिमा तक ले जाया जाएगा। राज्यों को दिल्ली की तरह ही यहां भी गेस्टहाउस बनाने को कहा गया है।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपनी परिकल्पना थी जिसके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी को देखने के बाद सरकार पटेल की प्रतिमा के बारे में सोचा था। पूर्व में मध्य प्रदेश और दक्षिण में महाराष्ट्र की सीमा से लगे इस आदिवासी क्षेत्र पर्यटन में तेजी आने की उम्मीद है। गुजरात के मुख्य सचिव जे एन वर्मा का कहना है, 'हम रोजाना 15,000 से ज्यादा लोगों के आने की उम्मीद कर रहे हैं।' भविष्य में यहां एक मनोरंजन परिसर बनाने की योजना भी बन सकती है।

इस मूर्ति का डिजाइन मशहूर मूर्तिकार राम वंजी सुतार ने तैयार किया है और इसे इंजीनियरिंग क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लार्सन ऐंड टुब्रो (एलऐंडटी) ने करीब 30 अरब रुपये की लागत से तैयार किया है। एलऐंडटी ने इस प्रतिमा को 8-10 सालों की सामान्य अवधि की तुलना में 33 महीने में तैयार किया है। एलऐंडटी के परियोजना निदेशक मुकेश रावल ने बताया, 'दूसरी इंजीनियरिंग परियोजनाओं के मुकाबले यह एक कला से जुड़ा काम था। सरदार एक दिग्गज व्यक्ति थे। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि उनकी मुखाकृति, मुद्रा और हाव-भाव को सही तरीके से उकेरा जा सके।'

इसके लिए एलऐंडटी ने सुतार के साथ मिलकर काम किया और पहले 3 फुट और 30 फुट की प्रतिमा का नमूना तैयार किया और सार्वजनिक तौर पर गांव-गांव जाकर लोगों से परामर्श किया गया। अभिलेखागार की तस्वीरों का संग्रह कर टीम ने 2डी से 3डी छवि तैयार की और इस तरह वे पटेल की मुखाकृति, हाव-भाव, कद-काठी का पूरा बायोमेट्रिक ब्योरा तैयार कर सके। इस मूर्ति को एकबारगी देखने पर पटेल जैसा दिखना चाहिए था और इसमें कोई दोराय होने जैसी स्थिति भी नहीं होनी चाहिए थी। उनके पोशाक में मोड़ों को दर्शाना भी एक चुनौती थी और इसे स्थिर भी नहीं दिखाना था। रावल कहते हैं, 'यह कला और इंजीनियरिंग का परिणय है और यह महज इंजीनियरिंग भर नहीं है।'

पटेल के सबसे बड़े भाई पुरुषोत्तम पटेल के पोते धीरुभाई पटेल ने इसे मंजूरी दी जब वह कुछ दिन पहले यहां दौरा करने गए। बड़ौदा में रह रहे धीरुभाई पटेल ने कहा, 'यह इससे अच्छा नहीं हो सकता था। इससे सरदार का नाम और लोकप्रिय होगा।' देश के प्रथम गृहमंत्री की शारीरिक भाव भंगिमा की नकल करने के अलावा इसकी बड़ी आकृति ने भी एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती पेश की। दूसरी लंबी प्रतिमाओं में निचले स्तर पर समर्थन के लिए चौड़ा आधार होता है लेकिन सरदार पटेल एक किसान भी थे और वह घुटनों से ऊपर धोती बांधते थे ऐसे में टीम को दोनों पैर अलग भी दिखाने थे।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह तटीय क्षेत्रों में 180 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार वाली हवा को भी सह सके हालांकि इस क्षेत्र में वायु की अधिकतम रफ्तार 130 किलोमीटर प्रति घंटा है। इस परियोजना के लिए चरणबद्ध तरीके से मंजूरी लेनी थी लेकिन एलऐंडटी को अक्सर जोखिम लेते हुए बिना इंतजार किए काम आगे बढ़ाना पड़ा। अगर इसने हर वक्त कागजी कार्रवाई पूरी होने का इंतजार किया होता तो अब तक इस प्रतिमा का काम आधा ही हुआ होता।

आणंद जिले में सरदार पटेल के गांव करमसद के निवासियों में भी काफी उत्साह दिख रहा है। इस शहर के नगरपालिका के दफ्तर के ठीक पीछे संकरी गलियों में सरदार पटेल का घर है जिसे उनके जन्मदिन के मौके पर रोशनी से सजाया जाता है। बड़ी परियोजनाओं की तरह ही इस प्रतिमा को लेकर भी कई विवाद खड़े हुए और कुछ पड़ोस के आदिवासी गांवों ने उद्घाटन के मौके पर प्रतीकात्मक बंद की आवाज बुलंद की है। इस बंद का आयोजन सरदार सरोवर बांध बनाए जाने की वजह से विस्थापित लोगों का पर्याप्त तरीके से पुनर्वास नहीं किए जाने के खिलाफ भी है। प्रतिमा के आसपास बांध का पानी छोड़े जाने की वजह से कुछ गांव भी प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि इस क्षेत्र में रियल एस्टेट की कीमतों में काफी तेजी आई है।
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