बिजनेस स्टैंडर्ड - बातचीत करने से ही बन पाएगी आरबीआई-सरकार की बात
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, November 16, 2018 12:55 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

बातचीत करने से ही बन पाएगी आरबीआई-सरकार की बात

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 30, 2018

पिछले हफ्ते वित्त मंत्रालय के नॉर्थ ब्लॉक स्थित मुख्यालय में तैनात शीर्ष अधिकारियों की नींद खराब हो गई होगी। यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में तैनात वरिष्ठ अधिकारी भी थोड़े बेचैन हो गए होंगे। इसका कारण भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का शुक्रवार को दिया हुआ सख्त भाषण था। आचार्य ने मुंबई में ए डी श्रॉफ स्मृति व्याख्यान देते हुए कहा कि अधिक वित्तीय एवं वृहद आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आरबीआई को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और उनकी बैलेंस शीट के  नियमन एवं पर्यवेक्षण की शक्तियों में असरदार स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। आचार्य ने कहा, 'इस तरह का प्रयास भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिए एक सच्चा समावेशी सुधार होगा।' एक अन्य  संदर्भ में आचार्य ने यह भी कहा, 'केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करने वाली सरकारें देर-सवेर वित्तीय बाजारों का प्रकोप झेलेंगी और आर्थिक विपत्ति को दावत देंगी।' 

 
अब आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच तनातनी को लेकर शायद ही कोई संदेह रह गया है। न तो सरकार और न ही आरबीआई का आलाकमान इसे गुपचुप रखने की कोशिश कर रहे हैं। अतीत में अधिकांश सरकारों की आर्थिक नीति को लेकर आरबीआई के गवर्नर के साथ मतभेद रहे हैं लेकिन वे मतभेद काफी हद तक अंदरूनी बातचीत तक ही सीमित रहे। अब ये मतभेद खुलकर सामने आते हुए दिख रहे हैं। मसलन, नॉर्थ ब्लॉक और आरबीआई के बीच पहले सरकार की उधारी कार्यक्रम की समयावधि को लेकर मतभेद रहे जिसकी वजह से बॉन्ड बाजार में उथलपुथल की स्थिति भी बनी। सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में उछाल आ गई और बॉन्डधारकों की लागत बढ़ गई। वित्त वर्ष 2018-19 के बजट की तैयारी के दौरान भी सरकार और आरबीआई के बीच लाभांश की मात्रा को लेकर मतभेद उभरे थे।
 
मार्च 2018 में हालात अधिक खराब होने लगे थे। महीने भर से भी कम समय में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पंजाब नैशनल बैंक घोटाले में केंद्रीय बैंक की भूमिका को लेकर सवाल उठाए तो गवर्नर ऊर्जित पटेल ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि सार्वजनिक बैंकों के शीर्ष प्रबंधन पर लगाम लगाने के लिए केंद्रीय बैंक के पास कम अधिकार हैं और सरकार को यह स्थिति दूर करने के लिए मौजूदा कानून में बदलाव करने चाहिए। सरकार और आरबीआई के बीच मतभेदों के खुलकर सार्वजनिक होने का यह संभवत: पहला वाकया था। सरकार ने इसका जवाब 24 जुलाई को संसद में दिया। सरकार ने कहा था, 'आरबीआई के पास सार्वजनिक बैंकों समेत विभिन्न बैंकिंग संस्थानों से निपटने के लिए व्यापक एवं समग्र शक्तियां हैं।'
 
उसके बाद से मतभेद के कई और वाकये भी घटित हुए हैं। मसलन, सरकार ने कई बार कर्ज में फंसी संपत्तियों (खासकर बिजली क्षेत्र में) की पहचान संबंधी मानकों के क्रियान्वयन में शिथिलता को लेकर अपनी मंशा जताई है। आरबीआई ने इस तरह के अनुरोधों को दरकिनार कर सही काम ही किया है। फंसे कर्जों के एक निर्दिष्ट सीमा से अधिक हो जाने पर बैंकों की तरफ से उठाए जाने वाले त्वरित सुधारात्मक कदमों (पीसीए) के मानकों की समीक्षा की भी मांग सरकार करती रही है। लेकिन आरबीआई ने वाजिब कारणों से इस मांग को भी अभी तक स्वीकार नहीं किया है।
 
अक्टूबर की शुरुआत में सरकार ने भुगतान प्रणाली के लिए नया नियामकीय ढांचा खड़ा करने की भी बात कही जिसे प्रस्तावित नियामकीय स्वरूप में आरबीआई की भूमिका और शक्तियों को शिथिल करने की कोशिश के तौर पर देखा गया। ऐसे में आरबीआई ने वित्तीय भुगतान नियमन के लिए नया ढांचा खड़ा करने के बारे में सुझाव देने के लिए गठित समिति की रिपोर्ट में अपनी आपत्तियों को सार्वजनिक करने में थोड़ी भी देर नहीं लगाई। इस बीच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक राजीव महर्षि ने इंडियन स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के उद्घाटन अवसर पर बढ़ती एनपीए समस्या पर काबू पाने में आरबीआई की नाकामी को लेकर सवाल उठाए। वित्त सचिव रह चुके महर्षि ने बैंकिंग संकट का जिक्र करते हुए कहा, 'कोई भी वह मूल सवाल नहीं पूछ रहा है कि नियामक क्या कर रहा था और उसकी कोई जवाबदेही बनती है या नहीं?'
 
यह संभव है कि सरकार को लेकर आरबीआई का अविश्वास कुछ अन्य कारणों से भी बढ़ा हो। उदाहरण के लिए, रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड में शामिल नचिकेत मोर के चार वर्षों के कार्यकाल में इसी महीने कटौती कर दी गई। हाल की बोर्ड बैठकों में सरकार के प्रतिनिधियों ने कई ऐसे प्रस्ताव रखे जो मामूली प्रकृति के थे, मसलन मिलियन और बिलियन की जगह लाख और करोड़ के गुणकों में गणना की जाए। हालांकि इसे नकारा नहीं जा सकता है कि आरबीआई और सरकार के प्रतिनिधि जिस तरह अपने मतभेदों को सार्वजनिक कर रहे हैं वह कोई सकारात्मक संकेत नहीं है क्योंकि इससे बैंकिंग नियामक को अनावश्यक दबाव बनता है। आरबीआई वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण एवं अहम संस्थान है। एक नियामक के तौर पर इसकी स्वतंत्रता भी बेहद जरूरी है लेकिन मतभेदों के सार्वजनिक प्रदर्शन से इस पर चोट पहुंचती है। सरकार और आरबीआई दोनों को ही एक दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय दूसरे के विचारों को समझने के लिए परस्पर विचार-विमर्श करना चाहिए। लेकिन बातचीत का यह दौर तभी शुरू हो सकता है जब सरकार आरबीआई के शीर्ष नेतृत्व और वित्त मंत्रालय के सचिवों को  बातचीत की मेज पर ले आए। ऐसे में जेटली का यह सुझाव बढिय़ा है कि नियामकों को सभी हितधारकों के साथ विस्तृत चर्चा करनी चाहिए। इससे एक नई शुरुआत हो सकती है। 
Keyword: RBI, viral acharya, urjit patel, fund, bank,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या पटरी पर लौट रहा देश का निर्यात?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.