बिजनेस स्टैंडर्ड - मनमाने आचरण से निकले सबक से मिलेगी सीख!
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मनमाने आचरण से निकले सबक से मिलेगी सीख!

देवाशिष बसु /  October 30, 2018

देश के दो प्रमुख संस्थानों का उदाहरण हमें बताता है कि मनमर्जी और नियामकीय विफलता किस कदर खराब नतीजे देने वाली साबित हो सकती है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु

 
ब्रिटेन के पूर्व विदेश मंत्री और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के संस्थापक डेविड ओवन पेशे से चिकित्सक हैं और उन्होंने तंत्रिका विज्ञान का अध्ययन किया है। इस अकादमिक प्रशिक्षण के साथ उन्होंने नेताओं में व्यक्तित्व संबंधी विकारों का गहन पर्यवेक्षण किया है। उन्होंने ह्युब्रिस सिंड्रोम नामक एक सिद्धांत प्रस्तुत किया है। ओवन कहते हैं, 'यह विकास सत्ता के अधिकार से जुड़ा है, खासतौर पर ऐसे अधिकार से जिसका संबंध बेशुमार सफलता से हो, जो वर्षों तक आपके पास हो और जिसके स्वामी नेता के सामने न्यूनतम बाधाएं हों।' यह सिंड्रोम अपने आप में लापरवाही, विस्तृत ब्योरों पर कम ध्यान दिए जाने, भारी दंभ और आत्मविश्वास तथा दूसरों के प्रति अवहेलना का भाव छिपाए रहता है। किसी के व्यक्तित्व में अगर ये तमाम पहलू हों तो बहुत बड़े पैमाने पर नुकसान संभव है।
 
ओवन यहां शायद पश्चिमी संस्थानों का संदर्भ ले रहे थे जहां जानबूझकर की जा रही अनदेखी के कारण लिए गए गलत निर्णयों ने संस्थागत नुकसान पहुंचाया और इससे बड़े पैमाने पर रोजगारों का भी नुकसान हुआ। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में जहां न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल शक्तिशाली लोगों के हितों को पूरा करने में किया जा सकता है, वहां इन गुणों के दो ऐसे नतीजे तत्काल सामने आते हैं जो ओवन द्वारा पश्चिम के अपेक्षाकृत नियम कायदों से चलने वाले समाज की तुलना में काफी बुरे साबित हो सकते हैं।
 
पहला, भारी पैमाने पर भ्रष्टाचार। भारत में जैसे ही लोगों के पास सत्ता आती है (सरकारी क्षेत्र हो या निजी) वैसे ही वे उसका दुरुपयोग करना शुरू कर देते हैं। अगर वे लंबे समय तक सत्ता में बने रहें तो दुरुपयोग में काफी इजाफा हो जाता है। दूसरी बात, तीसरी दुनिया के देशों में नियम कानून टूटने के कारण ह्युब्रिस सिंड्रोम एक अत्यंत भ्रष्ट मोड़ ले सकता है। इस सिंड्रोम के शिकार नेता न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग कर सकते हैं, लोगों को झूठे और मनगढ़ंत इल्जाम लगाकर जेल में डाल सकते हैं, शारीरिक क्षति पहुंचा सकते हैं और उनको सार्वजनिक रूप से नीचा दिखा सकते हैं।
 
इस सिंड्रोम के दो उदाहरण हमारे सामने हैं: नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) और इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज (आईएलऐंडएफएस)। आईएलऐंडएफएस की स्थापना संस्थागत पैसे से की गई थी लेकिन रवि पार्थसारथि ने तीन दशक तक इसे अपनी मिल्कियत की तरह चलाया। जुलाई 2018 में कैंसर ने उन्हें पद छोडऩे पर मजबूर कर दिया। तीन दशक की इस अवधि में आईएलऐंडएफएस पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज हो गया था। इसमें से ज्यादातर कर्ज सरकारी क्षेत्र की कंपनियों का है। इसके चलते तमाम अधूरी परियोजनाएं कानूनी पचड़े में फंस गईं। 350 से अधिक कंपनियां एक साथ उलझ गईं। ये कंपनियां स्कूल प्रबंधन से लेकर कचरा प्रबंधन तक विभिन्न कामों में संलग्र थीं।
 
ओवन कहते हैं कि सफल नेताओं में अक्सर प्रेरक, अपनी बात मनवाने की क्षमता, व्यापक दृष्टिकोण, जोखिम उठाने की इच्छा और आत्मविश्वास जैसे गुण होते हैं। कई लोगों को पार्थसारथि में ये गुण दिखे (एनएसई के नेताओं में ये गुण कम थे)।  ओवन ने जो चार कारक बताए उनमें से तीन पर वे खरे उतरते थे:  संपूर्ण शक्ति, कई वर्षों में एकत्रित की गई शक्ति और न्यूनतम अवरोध। बीती बातों का अवलोकन करें तो आईएलऐंडएफएस ओवन के शब्दों में जबरदस्त सफलता का उदाहरण तो नहीं है लेकिन देश के सफलता और नाकामी के आकलन की विचित्र व्यवस्था में तो सरकारी बैंकों और भारी भरकम सरकारी मशीनरी की मदद से एक विशालकाय सफेद हाथी पालने को सफलता का उदाहरण माना गया।
 
इस प्रक्रिया में जहां आईएलऐंडएफएस के कुछ शीर्ष कर्मचारियों ने जमकर निजी पूंजी बनाई, वहीं कुछ कारोबारी साझेदारों और सवाल उठाने वाले कर्मचारियों को आपराधिक अवमानना की धमकी दी गई या फिर झूठे आरोप लगाकर उनको सलाखों के पीछे डाल दिया गया और उनकी जिंदगी खराब कर दी गई। तीसरी दुनिया के देशों में ह्युब्रिस सिंड्रोम जनता के पैसे की खुली लूट और आपराधिक व्यवहार को जन्म दे सकता है। एनएसई की स्थापना भी संस्थागत पूंजी से की गई थी और इसका नेतृत्व आरएच पाटिल ने किया जबकि रवि नारायण और चित्रा रामकृष्णा उनके अधीनस्थ थे। एनएसई सावधानीपूर्वक जोखिम उठाने के मामले में जबरदस्त रूप से सफल रहा। डॉ. पाटिल ने भारतीय संदर्भों में एकदम विशिष्ट नवाचार किया और एक दशक के बाद चीजें बदलने लगीं और लगभग एकाधिकार जैसी स्थिति बन गई। यहां पर ओवन के चार प्रभावकारी कारक एकदम उचित तरीके से लागू होते हैं: लंबी अवधि तक सत्ता में बने रहना, जबरदस्त सफलता, संपूर्ण शक्ति और न्यूनतम अवरोध। दो बड़ी नियामकीय विफलताओं के लिए वे सजा से भी बच गए (सन 2010 में आई गिरावट और ब्रोकरों द्वारा क्लाइंट कोड में बदलाव)। वह प्रतिद्वंद्वी एक्सचेंजों के साथ छिड़ी लड़ाई से भी निजात पाने में कामयाब रहा। इस दौरान एनएसई ने कई गलत तरीके अपनाकर तत्कालीन कर्मचारियों को परेशान किया और सॉफ्टवेयर आदि को लेकर झूठे इल्जाम लगाए।
 
ओवन के कहे के मुताबिक ही एनएसईके शीर्ष प्रबंधन ने अत्यधिक दंभ पाल लिया था और दूसरों के प्रति नफरत भी। इसलिए जब सन 2015 में एनएसई में लापरवाही और ध्यान न देने (ह्युब्रिस सिंड्रोम की परिभाषा के मुताबिक) के कारण घोटाला सामने आया तब उसने इसे खारिज करने की कोशिश की और हमारे खिलाफ अवमानना का मामला दायर करने का प्रयास किया। एनएसई के पूर्व वरिष्ठ कर्मचारियों ने हमें बताया कि उसका वरिष्ठ प्रबंधन इस बात को लेकर आश्वस्त था कि वह घोटाले की जांच को आसानी से दबा ले जाएगा। परंतु ऐसा नहीं हो सकता और दो पूर्व प्रबंध निदेशकों को बहुत बेआबरू होकर बाहर जाना पड़ा।
 
हमने संस्थानों में ऐसे आचरण को रोकने के लिए नियम कानून बनाए हैं लेकिन एनएसई और आईएलऐंडएफएस के मामले में वे नाकाम रहे क्योंकि आंतरिक स्तर पर बोर्ड और बाहरी स्तर पर नियामकीय निगरानी दोनों विफल रहे। ऐसा तब हुआ जबकि उनके कुछ कदम केवल अनैतिक ही नहीं बल्कि अवैध भी थे। वर्ष 2008 के आरंभ से ही एनएसई ने नियामक पर काफी हद तक नियंत्रण रखा परंतु 'को लोकेशन' घोटाले के बाद उसके बोर्ड की सफाई करनी पड़ी। दर्जनों पूर्व वरिष्ठ सरकारी अधिकारी उसके वेतनभोगी थे और बोर्ड भी दब्बू स्वभाव का था। आईएलऐंडएफएस का शीर्ष प्रबंधन इस निगरानी से बचा रहा। दोनों संस्थानों के मनमाने आचरण से निकले सबक स्पष्ट हैं। प्रश्न यह है कि क्या नीति निर्माता इससे कुछ सीखेंगे।
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