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हावड़ा का प्राचीन इतिहास लगभग अनजान

विवेक देवरॉय /  October 29, 2018

ब्रिटिश काल में कलकत्ता के पास होने से हावड़ा की अहमियत काफी बढ़ गई थी। हावड़ा के गजेटियर के जरिये इसकी विकास यात्रा पर रोशनी डाल रहे हैं विवेक देवरॉय 

 
पुराना हावड़ा जिला आज के हावड़ा से काफी अलग था। हावड़ा के 1909 के जिला गजेटियर में यह जिक्र है कि 'यूरोपीय व्यापारियों के आने से पहले का हावड़ा का इतिहास लगभग अनजान है और इस दिशा में आगे बढऩे की कोई भी कोशिश हमें अटकलबाजी की राह पर ही ले जाएगी। 510 वर्ग मील के क्षेत्रफल और 8.50 लाख की आबादी के साथ यह बंगाल का सबसे छोटा जिला है और अंगुल, पलामू, सिंहभूम एवं दार्र्जिलिंग को छोड़कर प्रांत के अन्य जिलों से इसकी आबादी भी कम है। जिले में हुगली नदी के किनारे हावड़ा और बल्ली नाम के दो कस्बे हैं जिनमें जिले की आबादी का पांचवां हिस्सा रहता है। हुगली नदी पर पुल के निर्माण और ट्राम लाइन बिछाए जाने के बाद कामगारों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है जो मेट्रोपोलिस में जाकर काम करते हैं और रात बिताने के लिए हावड़ा स्थित अपने घरों में आ जाते हैं। कलकत्ता के तमाम यूरोपीय एवं भारतीय भद्रजनों के इस कस्बे या उसके उपनगरीय इलाकों में घर और बगीचे हैं।'
 
वर्ष 1892 में शुरू हुर्ई प्रणाली के तहत दर्ज महत्त्वपूर्ण आंकड़ों का एक ब्योरा इस तरह है: 'मौजूदा व्यवस्था के तहत कस्बों में माता-पिता, अभिभावकों या सीधे तौर पर संबद्ध लोगों का जन्म एवं मृत्यु का पुलिस के समक्ष पंजीकरण कराना अनिवार्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में हरेक गांव के चौकीदार को एक पॉकेट बुक दी जाती है जिसमें वह ग्राम पंचायत में हुए सभी जन्म और मौत के आंकड़े दर्ज करता है। चौकीदार पुलिस थानों में परेड के दौरान ये आकंड़े रजिस्टर में दर्ज  कराता है। इस तरह हासिल आंकड़ों को पुलिस संग्रहीत एवं वर्गीकृत करती है और सिविल सर्जन को मासिक रिपोर्ट देती है। हरेक थाने से मिले आंकड़ों के आधार पर सिविल सर्जन पूरे जिले के आंकड़े तैयार करता है और सफाई कमिश्नर की सालाना रिपोर्ट में उन्हें शामिल किया जाता है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और टीकाकरण निरीक्षक समय-समय पर इन आंकड़ों का मुआयना करते रहते हैं। कस्बों में खुफिया के उच्च स्तर और कानूनी दंड के भय से ग्रामीण इलाकों की तुलना में बीमारियों का पंजीकरण अधिक सटीक होता है। गांवों में चौकीदार के आम तौर पर अशिक्षित होने से अहम आंकड़े कम सटीक होते हैं। बड़ी खामी यह होती है कि प्रसव के दौरान होने वाली मौतें उसमें दर्ज नहीं होती हैं जबकि बच्चियों के जन्म और दूरदराज के इलाकों में जन्म के अलावा निचली जातियों में होने वाले जन्म को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जन्म की तुलना में मौत के आंकड़े अधिक सावधानी से दर्ज होते हैं लेकिन हैजा और चेचक से होने वाली मौत को छोड़कर अन्य मौतों की वजह साफ नहीं होती है। ऐसी स्थिति में अक्सर मौत की वजह बुखार बता दी जाती है।'
 
हावड़ा की बात हो तो भला मछली का जिक्र कैसे नहीं होगा? गजेटियर के मुताबिक 'हुगली नदी में मिलने वाली मछलियों में हिलसा, भेटकी, टेंगरा और टप्सी प्रमुख हैं। उलूबेरिया से लेकर डायमंड हार्बर के बीच का हुगली नदी का इलाका अपनी स्वादिष्ट मछलियों के लिए काफी मशहूर है। वाल्टर हेमिल्टन ने 1820 में टप्सी को बंगाल ही नहीं बल्कि समूची दुनिया की सबसे स्वादिष्ट मछली बताया था।' बंगाली समाज टप्सी (अब टॉप्सी) को काफी पसंद करता है लेकिन गजेटियर में इसके बारे में ऐसे विशेषण की उम्मीद मैंने नहीं की थी। गैर-बंगाली लोगों के बीच हिलसा मछली उतनी प्रचलित नहीं है। लेकिन गजेटियर की मानें तो 'हिलसा और टप्सी यूरोपीय समुदाय के बीच अधिक लोकप्रिय हैं लेकिन भारतीयों के बीच कार्प प्रजाति की मछलियां अधिक पसंद की जाती हैं। रोहू  (रोहिता) मछली को तो ताजे पानी की मछलियों की रानी माना जाता है।'
 
यूरोप से आने वाले कारोबारियों के आगमन से पहले का हावड़ा का इतिहास पता नहीं है। हावड़ा गजेटियर में कहा गया है, 'ब्रिटिश शासन से पहले के दौर में यहां आधुनिक अर्थों वाली सड़कों का कोई वजूद ही नहीं था। लेकिन इस पर आश्चर्य भी नहीं किया जा सकता है क्योंकि नदियों, उप-नदियों और नहरों से विभाजित इस देश में जलमार्गों को परिवहन का एक आसान एवं प्राकृतिक साधन माना जाता रहा है। नदियों एवं जलमार्गों की बहुतायत के चलते म्युनिसिपल एवं जिला बोर्ड की तरफ से सड़कें बनाते समय कई पुल बनाने पड़े हैं। हावड़ा कस्बे में भी ईस्ट इंडियन रेलवे और बंगाल-नागपुर रेलवे लाइन के ऊपर कई पुल बनाए गए हैं जिनमें हावड़ा स्टेशन की तरफ जाने वाले रास्ते पर बना बकलैंड ब्रिज सबसे अच्छा है। हालांकि सबसे अहम पुल हुगली नदी पर बना हावड़ा ब्रिज है जो हावड़ा को कलकत्ता से जोड़ता है। यह एक फ्लोटिंग पुल है जिसके बीच वाले हिस्से को बड़े जहाजों के आने पर उठाया-गिराया जा सकता है। वर्ष 1871 में एक कानून बनाकर लेफ्टिनेंट गवर्नर को सरकारी पूंजी से इस पुल का निर्माण करने की शक्ति दी गई थी। उस कानून में हावड़ा ब्रिज तक आने-जाने वाले मार्गों के रखरखाव, चुंगी वसूली और पोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति का अधिकार भी लेफ्टिनेंट गवर्नर को दिया गया था। इस पुल के निर्माण के लिए सर ब्रैडफोर्ड लेस्ली के साथ अनुबंध किया गया था और पुल के हिस्सों का इंगलैंड में निर्माण शुरू हो गया। वहां से इन हिस्सों को मंगाकर कलकत्ता में एक साथ जोड़ा गया। पुल का निर्माण 1874 में पूरा हुआ और उसी साल अक्टूबर के महीने में इसे आवागमन के लिए खोल दिया गया। इसके रखरखाव का जिम्मा पोर्ट कमिश्नर को दे दिया गया था। रेलवे परिवहन पर एक रुपये प्रति 100 मन वजन की दर से चुंगी वसूली जाती है जिसका भुगतान ईस्ट इंडिया रेलवे करती है।'
 
गजेटियर के मुताबिक 'श्रमिकों की बड़ी तादाद और अस्थिर जनसंख्या होने की वजह से हावड़ा अपराधियों के लिए एक आरामदेह जगह बन चुका है और देश भर के पेशेवर अपराधी यहां आते रहते हैं। ये अपराधी काफी चालाकी दिखाते हैं और खुद को पुलिसकर्मी बताने के साथ ही पोर्ट पुलिस जैसी नौका का भी इस्तेमाल करते हैं।'
 
(लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं) 
Keyword: kolkata, howrah, district,,
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