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अवांछित राह

संपादकीय /  October 29, 2018

गत सप्ताह रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने मुंबई में जबरदस्त भाषण दिया। माना जा रहा है कि उनके इस भाषण को आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल का वरदहस्त था। आचार्य ने कहा कि जब सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को सीमित करती है तो यह आत्मघाती कदम होता है क्योंकि इससे पूंजी बाजार में भरोसे का संकट उत्पन्न हो जाता है। सरकार को वित्तीय मदद जुटाने के लिए पूंजी बाजार की आवश्यकता होती है। आचार्य ने स्पष्टï किया कि कैसे केंद्रीय बैंक की निर्णय लेने की प्रक्रिया निर्वाचित सरकार से अलग होती है। क्रिकेट का रूपक इस्तेमाल करते हुए आचार्य ने कहा कि सरकार का निर्णय लेने का दायरा टी-20 गेम के समान है जहां तात्कालिक प्रदर्शन मायने रखता है, भले ही लंबी अवधि में जो भी परिणाम हों, जबकि केंद्रीय बैंक टेस्ट मैच खेलता है। वह हर सत्र में जीत हासिल करना चाहता है और साथ ही अपना बचाव भी करता है ताकि अगला सत्र जीतने का अवसर मिले। 

 
उन्होंने यह स्वीकार किया कि बीते दशकों में आरबीआई लगातार और अधिक स्वतंत्र हुआ है और उसे स्वायत्तता मिली है लेकिन उन्होंने अपने भाषण के दूसरे भाग में कुछ ऐसे मुद्दे उठाए जो सरकार के साथ आरबीआई के रिश्तों से संबंधित हैं। इनमें सबसे अहम है सरकारी बैंकों के नियमन की सांविधिक सीमा। सरकारी बैंकों के बोर्ड सदस्यों को हटाने, विलय या लाइसेंस खत्म करने के मामले में आरबीआई को बहुत कम अधिकार हैं। दूसरा जटिल मुद्दा है अतिरिक्त भंडार का आरबीआई से सरकार को हस्तांतरण। सरकार चाहती है कि इस राशि से वह अपने व्यय की पूर्ति करे, वहीं आरबीआई इसका विरोध करते हुए कहता है कि यह वित्तीय स्थिरता के लिए उचित नहीं होगा। केंद्रीय बैंक के नियामकीय स्वरूप को लेकर भी सरकार और बैंक के बीच लगातार मतभेद बढ़ रहा है। सरकार का प्रस्ताव है कि भुगतान व्यवस्था के लिए एक नया और अलहदा नियामक बनाया जाए और उसे आरबीआई के दायरे से बाहर किया जाए। ऐसी चिंताओं को सरकार को समाप्त करना होगा। यह भी सही है कि आरबीआई-सरकार के रिश्ते पिछले कुछ समय से सहज नहीं हैं लेकिन केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का मुद्दा सबसे अधिक अहम है। किसी सरकार को इसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए। उधर सरकार की अपनी अलग सोच है। सरकार की शिकायत है कि आरबीआई सार्वजनिक नीति से जुड़ी उन चुनौतियों को समझने में हठधर्मिता दिखा रहा है जो केंद्रीय बैंक के रुख के कारण उत्पन्न होती हैं। 
 
उदाहरण के लिए आरबीआई ने जहां सन 2008 से ही सरकारी बैंकों के फंसे हुए कर्ज को लेकर नरमी का रुख अपना रखा था, वहीं अब अचानक उसने परिसंपत्ति गुणवत्ता के मानक सख्त कर दिए हैं। ये अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी कड़े हैं। सरकार की दलील है कि सरकारी बैंक अचानक उन लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सकते। इसी प्रकार कुछ सरकारी बैंकों में  तत्काल सुधारवादी उपायों के मामले में आरबीआई के कदमों के चलते कुछ शाखाओं के बंद होने की नौबत आ सकती है। सरकार का कहना है कि ऐसे में वित्तीय समावेशन का क्या होगा क्योंकि सरकार तो लोगों का ही प्रतिनिधित्व कर रही है। इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं है लेकिन सार्वजनिक रूप से असहमति का प्रदर्शन दोनों में से किसी की विश्वसनीयता के लिए ठीक बात नहीं है। इतिहास बताता है कि सरकार और आरबीआई का प्रदर्शन तब सबसे अच्छा रहता है जब वे एक परिवार की तरह व्यवहार करते हैं। यानी आंतरिक स्तर पर असहमति होने पर ऐसे मुद्दों को आपसी सलाह मशविरे से हल करते हैं परंतु बाहरी विश्व के सामने वे एकजुट नजर आते हैं।
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