बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंक लॉकरों में आपके सामान की हिफाजत करना आसान नहीं
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बैंक लॉकरों में आपके सामान की हिफाजत करना आसान नहीं

तिनेश भसीन /  October 28, 2018

इस बात से कमोबेश सभी लोग वाकिफ होंगे कि किसी बैंक की शाखा में सेंध लग जाए या डाका पड़ जाए और डकैत ग्राहकों के लॉकरों में रखा सामान लूट ले जाएं तो बैंक जिम्मेदारी लेने से साफ इनकार कर देता है। इस मामले में बैंक की सीधी दलील यह होती है कि उसे पता ही नहीं लॉकर में क्या रखा गया था, इसीलिए उसकी कोई भी जिम्मेदारी या देनदारी नहीं बनती। जब कोई ग्राहक लॉकर की सुविधा लेता है तो उसे बैंक के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। समझौते में साफ लिखा होता है कि लॉकर में रखे सामान को अगर किसी भी तरह का नुकसान हो जाता है तो बैंक की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। यह कहकर बैंक हर तरह की जवाबदेही और देनदारी से पल्ला झाड़ लेता है। 

 
पॉलिसीबाजार डॉट कॉम के मुख्य कारोबार अधिकारी (सामान्य बीमा) तरुण माथुर कहते हैं, 'दोनों के बीच मकान मालिक और किरायेदार जैसा रिश्ता होता है। किरायेदार के घर चोरी हो जाए तो मकान मालिक की कोई जिम्मेदारी नहीं होती।' बैंकों में सेंधमारी या लूट के मामले नए या अनोखे नहीं हैं। यह बात अलग है कि बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इन मामलों के आंकड़ों का खुलासा सार्वजनिक तौर पर नहीं करता। मगर पिछले साल तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने संसद में बताया था कि वित्त वर्ष 2014-15 और 2016-17 के बीच 51 बैंकों में लूट, चोरी, डकैती और सेंधमारी की 2,632 वारदात हुई थीं, जिनमें लगभग 180 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
 
बैंकबाजार के सह-संस्थापक एवं सीईओ आदिल शेट्टी की सलाह है, 'आरबीआई के निर्देशों के अनुसार बैंकों को लॉकरों की हिफाजत के लिए जरूरी एहतियात बरतना जरूरी है। इसमें आम तौर पर पूरी तरह सुसज्जित अलार्म सिस्टम, लोहे के दरवाजे वाले कमरे, सुरक्षाकर्मी और सीसीटीवी के जरिये लॉकर कक्ष के भीतर एवं बाहर की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी शामिल है।'
 
बैंकों की सुरक्षा के उपाय 
 
बैंक जब अपनी शाखा स्थापित करते हैं तो उन्हें सुरक्षा के समूचे उपाय कर लेने चाहिए। अगर शाखा में लॉकर की सुविधा है तब तो उसकी सुरक्षा एकदम चाक-चौबंद रखनी चाहिए। रिजर्व बैंक ने इसके लिए नियम-कायदे भी रखे हैं। शाखा के लिए जगह चुनने से लेकर उसके प्रवेश द्वार के आकार तक सभी कुछ रिजर्व बैंक ने तय कर रखा है। उसने तो बैंकों से यह तक कह दिया है कि सुरक्षा के इंतजाम करते समय उन पर होने वाले खर्च की परवाह नहीं की जानी चाहिए। चूंकि बैंकों पर जनता की संपत्ति को महफूज रखने की जिम्मेदारी होती है, इसलिए उसमें सुरक्षा भी कई स्तरों की होनी चाहिए मसलन ताले बेहतरीन गुणवत्ता के होने चाहिए, स्ट्रॉन्ग रूम मजबूत होना चाहिए, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी होनी चाहिए, अलार्म की व्यवस्था होनी चाहिए और लगातार अच्छी गुणवत्ता वाली सेवा सुनिश्चित करने के लिए आंतरिक और बाहरी ऑडिट होना चाहिए।
 
डकैती आमतौर पर हफ्ते के आखिर यानी शनिवार और रविवार अथवा लंबी सरकारी छुट्टियों के दिनों में ही होती है क्योंकि उस समय बैंक शाखाएं लंबे समय के लिए बंद रहती हैं। इसलिए बैंकों को स्थानीय पुलिस थाने के संपर्क में रहना चाहिए ताकि रात के समय शाखा के आसपास गश्त बढ़ाई जा सके। इंडियन बैंक की मुंबई में स्थित एक शाखा के प्रबंधक कहते हैं, 'सुरक्षा सुनिश्चित करने का ज्यादातर जिम्मा शाखा प्रबंधक का ही होता है। ऐसे में उन्हें रोजाना सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेना चाहिए और देखना चाहिए कि वह ठीक से काम कर रही है अथवा नहीं। स्थानीय पुलिस के संपर्क में भी रहना चाहिए और दूसरे एहतियात बरतने चाहिए।' हालांकि यह भी सच है कि बैंक जितने एहतियात बरतते हैं, सेंधमार भीतर घुसने के उतने ही तरीके ढूंढ लेते हहैं। कुछ महीने पहले लुटेरों ने बैंक ऑफ बड़ौदा की नवी मुंबई शाखा में दाखिल होने के लिए हफ्ते के आखिर में ही 25 फुट लंबी सुरंग खोद डाली। उसका इस्तेमाल कर उन्होंने करीब 27 लॉकरों से सोना और नकदी चुरा ली।
 
कीमती वस्तुओं की सुरक्षा
 
सच कहें तो बैंक में डकैती या लूटपाट रोकना ग्राहक के हाथ में नहीं है। लुटा हुआ माल वापस पाने की उम्मीद भी बहुत कम होती है क्योंकि केवल ग्राहक को ही पता होता है कि उसके लॉकर में क्या रखा था। अगर डकैती हो जाती है तो पुलिस और बैंक ग्राहक के दावे की सच्चाई का पता लगाने के लिए क्लोज्ड सर्किट टेलिविजन (सीसीटीवी) पर ही भरोसा करते हैं। जाहिर है कि सीसीटीवी फुटेज में इसका पता लगना बहुत मुश्किल है। फिर भी कुछ तरीके हैं, जिन्हें आजमाने पर आपका कीमती सामान सुरक्षित रह सकता है और अगर लूटपाट हो भी जाए तो आपका दावा सच माना जा सकता है। 
 
यह तो आप भी जानते हैं कि आपके सामान की सुरक्षा लॉकर नहीं करता है। सुरक्षा बैंक द्वारा लगाए गए सुरक्षा संबंधी बुनियादी ढांचे से होती है और वह ढांचा ही सामान को सुरक्षित बनाता है। बैंकों की ऐसी शाखाओं में लॉकर लेने से परहेज करें, जिनकी चहारदीवारी किसी मकान या दफ्तर की चहारदीवारी से लगी होती है। संभव हो तो ऐसी बैंक शाखा चुनें, जिसकी इमारत दूसरी इमारतों से बिल्कुल अलग हो। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि सीसीटीवी जैसी सुरक्षा व्यवस्था भी वहां चाकचौबंद हो। अगर लॉकर रूम में रोशनदान आदि हैं तो उन्हें पूरी तरह से ढका जाना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखें कि आपको लॉकर रूम में ले जाने वाला कर्मचारी जब वहां से चला जाए तभी अपना लॉकर खोलें। जब वहां से निकलें तो ठीक से जांच लें कि लॉकर पूरी तरह से बंद हुआ है या नहीं।
 
जहां तक संभव हो, लॉकर में रखे गए सामान की खरीद का सबूत यानी रसीदें अपने पास जरूर रखें। साथ ही आपने क्या-क्या रखा है, इसकी सूची लॉकर में भी रखें और अपने घर पर भी रखें। यह बहुत जरूरी है क्योंकि अगर आपका सामान चोरी हो जाता है तो इससे आपको लॉकर में रखे सामान की कीमत का हिसाब-किताब लगाने में और मुआवजे का दावा करने में मदद मिलेगी। अगर आप लॉकर में किसी तरह के दस्तावेज रख रहे हैं तो उन पर पन्नी चढ़वाना यानी उनका लैमिनेशन कराना नहीं भूलें। साथ ही उनकी फोटोकॉपी घर पर जरूर रखें।
 
सामान का बीमा कराएं
 
सोने और गहने जैसे कीमती सामान की हिफाजत के लिए आप ऐसा आवास बीमा ले सकते हैं, जिसमें बैंक लॉकर में रखे सामान का भी बीमा होता है। मगर माथुर आगाह करते हैं कि ऐसा बीमा खरीदते समय पॉलिसी में दी गई शर्तों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि उसमें कुछ खास वस्तुओं के लिए ही बीमा होने की बात कही गई हो। कई बार ऐसी बीमा पॉलिसी में केवल कीमती धातुओं से बने गहनों (और घडिय़ों), हीरों, कलाकृतियों आदि को ही शामिल किया जाता है। अगर आपने लॉकर में जरूरी कागजात या नकदी या कोई और कीमती सामान रखा है तो उन्हें बीमा में शामिल नहीं किया जाएगा। गहनों और कीमती सामान के बीमा की प्रीमियम राशि इस बात पर निर्भर करती है कि बीमा की रकम क्या तय की गई है। यदि गहनों और अन्य कीमती वस्तुओं के लिए 5 लाख रुपये का बीमा कराया जाता है तो उसके लिए प्रीमियम की राशि 4,000 या 5,000 रुपये होगी। उसके अलावा कर तो देने ही पड़ेंगे। 
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