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सीबीआई विवाद में छिपा एक सुनहरा अवसर

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  October 28, 2018

सन 1970 के दशक के मध्य में इंदिरा गांधी ने शासन में जो सड़ांध डाली थी वह अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की खुली दुर्गंध के रूप में सबके सामने आ चुकी है। हमें संस्थानों के क्षय और उनके पतन के बारे में काफी कुछ सुनने को मिलेगा। हालांकि कई लोगों को तो संस्थान शब्द का अर्थ भी ठीक से नहीं पता होगा। ऐसे में यह ध्यान दिलाना उचित होगा कि संस्थान से तात्पर्य किसी इमारत से नहीं होता है। न ही यह किसी कार्यालय का नाम है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे रातोरात तैयार किया जा सके। बल्कि सच कहा जाए तो संस्थान ऐसे नियमों के समूह से तैयार होता है जो कई वर्ष की अवधि में तैयार होते हैं और ऐसे प्रभावी मूल्य तैयार करते हैं जो धीरे-धीरे नियंत्रण में सक्षम होते हैं। ऐसे में चाहे खाप पंचायत हों, मंदिरों में प्रवेश को तय करने वाले नियम हों या सरकार और केंद्रीय बैंक अथवा पुलिस तथा अन्य लोगों के बीच के रिश्ते तय करने वाले नियम, किसी वास्तविक संस्थान के उदय के लिए दो बातें बहुत अधिक मायने रखती हैं: चरणबद्ध उभार और नियमों का कड़ाई के साथ पालन।

 
परंतु यहां दिक्कत यह है कि निर्वाचन लोकतंत्र में जहां सबकुछ विजेता के हवाले होता है, वहां चरणबद्ध तरीके से काम करने का वक्त नहीं होता। इसलिए नियम कभी स्थायित्व नहीं पा पाते। जैसा कि हमने इंदिरा गांधी के बाद के युग में भी देखा। एक सरकार का नियम दूसरी सरकार के लिए कुशासन या अन्याय बन जाता। कुशासन के ये आरोप दो तरीके से लोगों को उचित प्रतीत होते हैं। पहला, तब जब सरकार संभ्रम में पड़ जाती है और घबराहट में वह गलत कदम उठाना शुरू कर देती है। दूसरा, तब जबकि सरकार प्रधानमंत्री को तमाम अन्य निष्ठाओं से ऊपर मानकर काम करने लगती है।
 
निष्ठा की परीक्षा
 
इंदिरा गांधी ने यह रास्ता तब अपनाया जब उन्होंने संजय-धवन की जोड़ी को प्रमुखता दी। आर के धवन ने संजय गांधी के सामने प्रस्ताव रखा कि केंद्र सरकार में शीर्ष कार्यकारी पद पर पंजाबी (खासतौर पर खत्री) व्यक्ति की नियुक्ति जरूरी थी लेकिन पर्याप्त नहीं। गांधी ने इस बात को मंजूर किया और आप सन 1974 से 1976 के बीच का इतिहास खंगाल सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो नैयर (खत्री) को नायर पर प्राथमिकता दी गई। इस तरह के कदमों से गलत निष्कर्ष निकाला जाना एकदम आसान था। परंतु हकीकत में यह ब्रिटिश व्यवस्था या संस्थान के स्थान पर अमेरिकी व्यवस्था को लागू करने जैसा ही था जहां नेता के प्रति वफादारी ही सबसे महत्त्वपूर्ण कारक होती है। 
 
यह जरूरत तब पड़ती है जब तत्काल परिणामों की आवश्यकता होती है जो अन्यथा नहीं हासिल हो सकते क्योंकि नियम कायदों के पालन में समय लग सकता है। शायद आपको लग रहा होगा कि मैं नियमों और कानूनों के उल्लंघन को उचित ठहरा रहा हूं। नहीं यह मेरा नजरिया नहीं है। यह तो देश के प्रधान न्यायाधीश रहे पी बी गजेंद्रगडकर का मानना है जिन्होंने कहा था कि जब सरकारें जल्दी में होती हैं तब यह देखना न्यायपालिका का काम है कि सभी चीजें ठीक ढंग से हों।  इन बातों को ध्यान में रखकर देखें तो समस्या तब बरकरार रहती है जबकि आप किसी ऐसी चीज की व्याख्या करते हैं जिसे किसी प्रशासनिक आदेश से संस्थान के रूप में निर्मित किया गया हो। सीबीआई ऐसा ही एक संस्थान है। इसका अस्तित्व गृह मंत्रालय के एक प्रस्ताव से हुआ था। यही वजह है कि वर्ष 2013 में गौहाटी उच्च न्यायालय ने कहा था कि यह अवैध है। तब से यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के अधीन है। बहरहाल अगर सर्वोच्च न्यायालय, गौहाटी उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट भी देता है तो भी सीबीआई संस्थान नहीं बन पाएगा। उसके लिए उसे दो मानकों को पूरा करना होगा जो इस प्रकार हैं: 
 
पहली बात, उसे संविधान निर्मित होना होगा। ऐसे संस्थान वे संस्थान हैं जो पहली श्रेणी के संस्थान माने जाते हैं। ये पूरी तरह सरकारी नियंत्रण से स्वायत्त होते हैं। दूसरी श्रेणी के संस्थान वे होते हैं जिन्हें संसद बनाती है और जो अद्र्घ स्वायत्त होते हैं। तीसरी श्रेणी के संस्थान वे हैं जो मंत्रालयों द्वारा बनाए जाते हैं और महज विस्तार होते हैं। 
 
दूसरा, संविधान द्वारा निर्मित अन्य संस्थानों की तरह इसके अपने कर्मचारी होने चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि वह पुलिस विभाग के अधिकारियों को पुनर्नियुक्ति पर लेकर काम चलाता रहे। भले ही उनकी निष्ठïा पर किसी तरह का संदेह नहीं हो लेकिन उनका रुख वैसा नहीं होता है जैसा कि स्वतंत्र जांच एजेंसी का होना चाहिए। 
 
इसके अधिकार तथा निदेशकों की नियुक्ति और उनको निकालने की प्रक्रिया अलग से विस्तार की मांग करती है। इसके अलावा  व्यापक तौर देखा जाए तो मौजूदा व्यवस्था ने इन सारी बातों का ध्यान रखा है।  ऐसे में लगता नहीं है कि इसमें से कुछ भी जल्दी घटित होगा। परंतु मौजूदा संकट मोदी को यह अवसर देता है कि वे विपक्ष का परीक्षण करें। क्या विपक्ष इस बात के लिए राजी होगा कि सीबीआई को संविधान सम्मत संस्था बनाया जाए? अगर कुछ और नहीं होता है तो भी विपक्ष की हवा निकालने के लिए मोदी को इस विचार को आगे अवश्य बढ़ाना चाहिए। 
Keyword: indira gandhi, congress, CBI, court,,
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