बिजनेस स्टैंडर्ड - अल्पमत और गठबंधन सरकार कमजोर नहीं
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अल्पमत और गठबंधन सरकार कमजोर नहीं

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  October 28, 2018

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित कुमार डोभाल ने पिछले गुरुवार को सरदार पटेल स्मृति व्याख्यान में कहा कि अगले 10 वर्ष तक देश का मजबूत सैन्य और आर्थिक शक्ति बने रहना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस दौरान देश को एक स्थिर और बहुमत वाली सरकार की जरूरत है। उन्हें इस बयान के लिए बेवजह निशाना बनाया जा रहा है। एनएसए कोई नौकरशाह नहीं हैं। उनकी नियुक्ति राजनीतिक है और उन्हें अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता छिपाने की आवश्यकता भी नहीं। अगर वह एक कदम और आगे बढ़कर यह भी कह देते कि ऐसी निर्णायक और मजबूत सरकार केवल नरेंद्र मोदी ही दे सकते हैं तो भी मैं उनसे नहीं लड़ता। मैं उनसे बहस करूंगा भी तो उनकी राजनीतिक स्थिति को लेकर नहीं बल्कि उनकी इस दलील पर कि केवल स्थिर, मजबूत, पूर्ण बहुमत वाली सरकार ही देश के लिए अच्छी हो सकती है और गठबंधन अस्थिर, भ्रमित, अनिर्णययुक्त, भ्रष्ट और ब्लैकमेल की आशंका वाले होते हैं। उनकी यह बात तथ्यों पर खरी नहीं उतरती।

 
सबसे पहले अर्थव्यवस्था की बात करते हैं क्योंकि आंकड़े निष्पक्ष होते हैं। हमारे राजनीतिक इतिहास को स्थिरता के आधार पर दो अवधियों में बांटा जा सकता है। सन 1952 से 1989 तक की 37 वर्ष की अवधि में पूरी स्थिरता देखने को मिली। सन 1970 के दशक के आखिर में थोड़ा बहुत उतार-चढ़ाव आया लेकिन आमतौर पर केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार रही। जैसे-जैसे दशक बीतते गए सरकार और स्थिर तथा मजबूत होती गई। देश पर एक ही पार्टी का शासन था और पार्टी पर एक परिवार यानी गांधी परिवार का दबदबा था। सन 1984 से 1989 के बीच लोकसभा में इस दल को 80 प्रतिशत सीटें हासिल थीं। अगर डोभाल का सिद्धांत सही है तो इन चार दशकों के दौरान देश की वृद्धि दर सबसे बेहतर होनी चाहिए थी। लेकिन यह 4 फीसदी से कम रही। दूसरा हिस्सा है अस्थिरता का। इसकी शुरुआत सन 1989 में राजीव गांधी की चुनावी हार के साथ हुई। यह सिलसिला सन 2014 तक पूरे 25 वर्ष तक चलता रहा।
 
क्या यह केवल संयोग ही है कि देश में आर्थिक सुधार का दौर उस वक्त शुरू हुआ जब स्थिर और पूर्ण बहुमत वाली सरकारों का समय समाप्त हुआ? कांग्रेस के पराभव के बाद पहली सरकार वीपी सिंह की बनी जो ज्यादा समय नहीं चली। आर्थिक सुधार की जिस लहर पर भारत आज भी सवार है उसकी शुरुआत पी वी नरसिंह राव की सरकार ने की थी। वह भी निहायत अस्थिर और अल्पमत सरकार थी। सन 1996 में राव सरकार के जाने के बाद आठ वर्षों में देश को पांच प्रधानमंत्री मिले जिन्होंने गठबंधन सरकार चलाने का प्रयास किया। इस दौरान तीन बार चुनाव भी हुए। पांच प्रधानमंत्री इसलिए क्योंकि देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार प्रधानमंत्री बने। 
 
सोचने की बात यह है कि सन 1991 में मनमोहन सिंह के बाद दूसरा सबसे सुधारवादी बजट कब पेश किया गया? यह बजट था सन 1997 में पी चिदंबरम द्वारा पेश किया गया बजट जिसमें कर दरों में कटौती की गई थी और आय के स्वैच्छिक खुलासे की योजना पेश की गई थी। उसी सरकार ने राष्ट्रीय विनिवेश आयोग का भी गठन किया और सरकारी उपक्रमों की सूचीबद्धता और निजीकरण की राह आसान की। वह देवेगौड़ा और गुजराल का डगमगाता हुआ दौर था जिसे अब गिरी तब गिरी सरकार कहा जाता था। यह इतिहास की सबसे अधिक वाम रुझान वाली मध्यमार्गी सरकार थी। पहली और आखिरी बार केंद्र में दो वामपंथी मंत्री बने। इंद्रजीत गुप्त को गृह मंत्रालय और चतुरानन मिश्र को कृषि मंत्री बनाया गया। वाजपेयी में यह काबिलियत थी कि उन्होंने राजमार्गों के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की शुरुआत की, दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डों का निजीकरण किया और मुनाफे में चल रहे 11 सरकारी उपक्रमों तथा तकरीबन दो दर्जन आईटीडीसी होटलों को बेचा गया। अत्यंत शक्तिशाली मोदी सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में एक भी कंपनी नहीं बेची जा सकी। एयर इंडिया भी नहीं। सन 1989 से 2004 के बीच अस्थिरता के 15 वर्ष के इस कालखंड में एक अंतराल चार महीने का आया था जब चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने। उनके पास 50 सांसद थे और वह कांग्रेस के बाहरी समर्थन पर आश्रित थे। परंतु इस सरकार ने भुगतान संतुलन के संकट से बचने के लिए देश का सोना बाहर ले जाने का साहस दिखाया। मुझे नहीं लगता कि नरेंद्र मोदी जैसा पूर्ण बहुमत वाला नेता भी ऐसा कर सकेगा। चंद्रशेखर ने ही यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री और मनमोहन सिंह को अपना आर्थिक सलाहकार बनाया जो कैबिनेट की बैठक में भी शामिल होते थे। ये दोनों बाद के वर्षों में कमजोर गठबंधन सरकारों में सुधार के वास्तुकार बने।
 
तुलना करें तो 37 पूर्ण स्थिर वर्षों में हमारी वृद्धि दर 4 फीसदी से नीचे थी जबकि बाद के 25 वर्षों में यह 6 फीसदी से ऊपर रही और अब यह लगातार 7 फीसदी के ऊपर है। यानी स्थिर वर्षों से तकरीबन दोगुनी। अर्थव्यवस्था की बात करें तो राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक वृद्धि का ग्राफ विरोधाभासी है। क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में गठबंधन सरकारें कमजोर होती हैं? मेरी दृष्टि में अगर वीपी सिंह की सन 1989-90 की सरकार को छोड़ दिया जाए तो इस मामले में कभी देश को कोई कमजोर सरकार नहीं मिली। डोभाल उस सरकार के अधीन भी काम कर चुके हैं और सरकार के गलत कदमों के चलते पंजाब और कश्मीर में हालात को नियंत्रण से बाहर होते देख चुके हैं। 
 
मैं पहले लिख चुका हूं कि पंजाब में ए श्रेणी के हर खालिस्तानी उपद्रवी के मारे जाने में गिल और डोभाल की भूमिका थी। यह खुफिया ब्यूरो और पंजाब पुलिस के बीच का बेहतरीन तालमेल ही था जिसके चलते अशांति खत्म हुई। सन 1991 से 1996 की उसी अवधि में कश्मीर पर भी वापस नियंत्रण कायम किया गया। डोभाल को अपनी मौजूदा मारक छवि के लिए देश की एक कमजोर और अल्पमत सरकार का धन्यवाद करना चाहिए जिसके प्रधानमंत्री एकदम करिश्माई नहीं थे। इंदिरा गांधी जब अपने उरूज पर थीं तब भी उन्होंने पोकरण-1 को नाभिकीय हथियार परीक्षण कहने का हौसला नहीं दिखाया था। उस वक्त इसे शांतिपूर्ण नाभिकीय विस्फोट कहा गया था। 24 वर्ष बाद वाजपेयी की कथित रूप से कमजोर गठबंधन सरकार ने ऐसी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। जबकि यह सरकार इतनी कमजोर थी कि पोकरण-2 के 11 महीने बाद सदन में महज एक वोट से गिर गई।
 
सन 1971 के बाद पोकरण-1 भारत का सबसे साहसी सामरिक निर्णय था। ऐसा दूसरा निर्णय था भारत-अमेरिका परमाणु समझौता जिस पर मनमोहन सिंह की संप्रग-1 सरकार ने हस्ताक्षर किए थे। वह गठबंधन वाम दलों की मदद पर निर्भर था। उन्होंने संसद में अपनी सरकार तक को जोखिम में डाला और देश की सामरिक विश्व दृष्टि को बदल कर रख दिया। संप्रग-1 में भी उन्होंने बहुब्रांड खुदरा में एफडीआई को लेकर ऐसा ही जोखिम उठाया। मोदी सरकार बहुब्रांड खुदरा में किसी भी तरह की प्रगति में नाकाम रही। यहां कोई वैचारिक मसला नहीं है क्योंकि ई-कॉमर्स के क्षेत्र में ऐसा हो चुका है। बहुमत के बावजूद सरकार जोखिम उठाने से बच रही है। आर्थिक, आंतरिक सुरक्षा और सामरिक मोर्चों पर देश के अस्थिर गठबंधन अधिक निर्णायक नजर आए हैं बजाय कि पूर्णकालिक सरकारों के।
 
हमारा देश एक फलता-फूलता लोकतंत्र है जिसे जवाबदेह, मेहनती और मोटी चमड़ी के राजनेता चलाते हैं। वे परिपूर्ण नहीं हैं लेकिन उन्हें पता है कि उनके लिए अच्छा क्या है? वे चुनाव जीतना चाहते हैं और एक बार सत्ता में आने के बाद उसे गंवाना नहीं चाहते।  गठबंधन अस्थिर होता है लेकिन हमारे नेताओं पर दबाव बनाता है कि वे गुंजाइश निकालें, दूसरों की बात सुनें और ढेर सारी प्रतिभाओं में से चयन करें। एक सुरक्षित बहुमत वाली सरकार राजनेताओं को आश्वस्त और दंभी बना देती है। व्यक्ति पूजा शुरू हो जाती है। इंदिरा से लेकर राजीव और मोदी तक हमारे राजनीतिक इतिहास से यही सबक निकलता है। देश को गठबंधन सरकारों से डरने की जरूरत नहीं है।
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