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मांग-आपूर्ति में अंतर बरकरार, कोयले का नया बाजार

श्रेया जय / नई दिल्ली October 28, 2018

केंद्र ने वर्ष 2015 में कोल इंडिया का कोयला उत्पादन वर्ष 2022 तक 1 करोड़ टन तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था। यह कदम देश में कोयला आयात घटाने की योजना के मुताबिक था। हालांकि अब इस योजना में थोड़ा बदलाव किया गया है। अब एक करोड़ टन उत्पादन का लक्ष्य किसी एक घरेलू स्रोत के लिए कर दिया गया है, भले ही यह इस्पात कंपनियों के स्वामित्व वाली खदानें हों या खुद के लिए उत्पादन करने वाली विद्युत इकाइयां, एनटीपीसी या सरकारी बिजली कंपनियां हों।   ऐसा करना देश के कोयला उत्पादन के लिए अच्छा है, लेकिन इसके नतीजतन इस क्षेत्र में एकाधिकार वाली सरकारी खनिक कोल इंडिया लिमिटेड का कोयला कारोबार घट सकता है। लेकिन साथ ही इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कोयले की पूरक व्यवस्था नहीं की गई तो कोल इंडिया कोयले की मांग, विशेष रूप से बिजली क्षेत्र से आने वाली मांग पूरी नहीं कर पाएगी। 
 
ऐसा तब हो रहा है, जब निजी कंपनियों का व्यावसायिक खनन शुरू नहीं हो पा रहा है। सरकारी अधिकारियों ने कहा कि इसमें कोल इंडिया लिमिटेड के श्रम संगठनों की अड़चनें आ रही हैं। ये श्रम संगठन चाहते हैं कि निजी खनिकों के लिए भी समान श्रम अधिकार और कानून होने चाहिए। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों ने कहा कि कोई भी कंपनी कोल इंडिया जैसे कर्मचारी लाभ या पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना सुविधाएं नहीं दे सकती। एक पूर्व अधिकारी ने कहा, 'ऐसे में कोई भी वैश्विक खनिक कोयला खनन के लिए भारत नहीं आएगा।'
 
लेकिन कोल इंडिया से कोयला खरीदने वाली कंपनियां नई योजनाओं पर काम कर रही हैं। उदाहरण के लिए कोल इंडिया के कोयले की सबसे बड़ी खरीदार एनटीपीसी लिमिटेड खुद की कोयला कंपनी बनाने की योजना बना रही है। एनटीपीसी देश की बड़ी ताप विद्युत उत्पादक है। एनटीपीसी की 10 कोयला खदाने हैं, जिनमें 7.3 अरब टन का भंडार है। कंपनी इन खदानों से हर साल 11.1 करोड़ टन उत्पादन कर सकती है। कंपनी का दावा इतने कोयले से 20,000 मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है। एनटीपीसी ने 2022 तक इतनी बिजली क्षमता के संयंत्र स्थापित करने की योजना बनाई है। 
 
इस समय एनटीपीसी पांच कोयला खंडों पर काम कर रही हैं, जिनमें 3.8 अरब टन का भंडार और हर साल 5.6 करोड़ टन उत्पादन क्षमता है। कंपनी ने झारखंड के पकरी-बरवाडीह में अपने पहले कोयला ब्लॉक में खनन शुरू कर दिया है। इसमे जून, 2018 तक 43 लाख टन कोयले का उत्पादन हो चुका है। इस खदान से उत्पादन का लक्ष्य 2018-19 के लिए 62.7 लाख टन है। यह जल्द ही ओडिशा में दुलांगा खदानों में उत्पादन शुरू करेगी। कंपनी ने चालू वित्त वर्ष में 16.8 लाख टन उत्पादन की योजना बनाई है। 
 
एनटीपीसी की सालाना कोयला मांग 18 करोड़ टन है। कंपनी का कहना है कि कोल इंडिया आपूर्ति करार के औसतन 75 से 80 फीसदी हिस्से की ही आपूर्ति करती है। एक वरिष्ठ कार्याधिकारी ने नाम न छापने का आग्रह करते हुए कहा, 'उत्तरी कोयला क्षेत्रों की खदानों के अलावा बाकी सभी में कुछ दिक्कतें हैं। कुछ जगह पर खदानों का विस्तार रुख गया है, जबकि कुछ अन्य जगहों पर परिवहन अपर्याप्त है। हम एक हद तक आत्मनिर्भर बनना चाहेंगे।' उन्होंने कहा कि कोयला उत्पादन और परिवहन दोनों ही समस्याएं हैं। 
 
कंपनी ने इस साल एक सार्वजनिक बयान में कहा था, 'कोयला खनन एनटीपीसी की ईंधन सुरक्षा रणनीति का हिस्सा है। एनटीपीसी का मानना है कि कोयले पर आत्मनिर्भरता से बिजली में अनवरत वृद्धि सुनिश्चित होगी।' उद्योग के सूत्रों के मुताबिक मांग में बढ़ोतरी और आयात में गिरावट से कोयला खदानों के बाहर और विद्युत संयंत्रों में स्टॉक करीब 3 करोड़ टन के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। केंद्र ने हाल में इस्पात, लौह, सीमेंट, उर्वरक और कैप्टिव विद्युत संयंत्रों के लिए कोयला खदानों की नीलामी के नए चरणों की घोषणा की है। पहली बाार बोली हासिल करने वाले खनिकों को सरप्लस होने पर 25 फीसदी तक कोयला खुले बाजार में बेचने की मंजूरी दी गई है। 
 
गैर-विद्युत उत्पादन क्षेत्र का आरोप है कि उसे कोयले की कम आपूर्ति मिल रही है और उसे मिलने वाला कोयला विद्युत इकाइयों को मुहैया कराया जा रहा है। वर्तमान चरण में 19 खानों की नीलामी होगी, जिनकी संयुक्त रूप से सालाना क्षमता 3.5 करोड़ टन है। इससे पहले सरकार ने 86 खदानों की नीलामी की थी, जिनका अनुमानित उत्पादन 9 करोड़ टन प्रतिवर्ष है। 
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