बिजनेस स्टैंडर्ड - आरबीआई को ज्यादा स्वायत्तता की वकालत
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आरबीआई को ज्यादा स्वायत्तता की वकालत

अद्वैत राव पालेपू और अभिजित लेले / मुंबई October 26, 2018

भारतीय रिजर्व बैंक को ज्यादा स्वायत्तता दिए जाने की पैरवी करते हुए डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने शुक्रवार को यहां कहा कि सरकारी बैंकों की निगरानी के लिए केंद्रीय बैंक को ज्यादा अधिकार दिए  जाने जरूरी हैं। अधिक वित्तीय और व्यापक आर्थिक स्थायित्व की सुरक्षा के लिए यह स्वतंत्रता जरूरी है।  आचार्य ने कहा है कि जो सरकार केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती उसे आगे पीछे वित्तीय बाजारों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। आचार्य ए डी श्रॉफ स्मृति व्याख्यानमाला में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जो सरकार केंद्रीय बैंक को स्वतंत्रता से काम करने देती है उसे कम लागत पर उधारी और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का स्नेह मिलता है। ऐसी सरकार का कार्यकाल ज्यादा लंबा होता है। 
 
उन्होंने कहा कि हमने आरबीआई की स्वतंत्रता खासतौर पर मौद्रिक नीति ढांचे से संबंधित मामले में अच्छी प्रगति की है। दिवालिया संहिता और जीएसटी में भी हमारी प्रगति अच्छी रही है। फिर भी रिजर्व बैंक की स्वायत्तता बरकरार रखने में कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं जहां लगातार कमजोरी बनी हुई है। इनमें कुछ क्षेत्रों को विश्व बैंक और आईएमएफ की भारत रिपोर्ट में शामिल किया गया है।  आचार्य ने कहा कि एक महत्त्वपूर्ण सीमा यह है कि केंद्रीय बैंक के पास सरकारी बैंकों पर कार्रवाई के मामले में सीमित अधिकार हैं। इनमें संपत्तियों का विनिवेश, प्रबंधन और बोर्ड में बदलाव, लाइसेंस वापस लेना और विलय या बिक्री जैसे कदम शामिल हैं। केंद्रीय बैंक को इस तरह के अधिकार निजी क्षेत्र के बैंकों के मामले में जरूर मिले हुए हैं। उल्लेखनीय है कि मार्च में आरबीआई के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने भी इस मसले का उल्लेख किया था। 
 
उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था के कई महत्त्वपूर्ण कामकाज को अंजाम देता है। वह न केवल मुद्रा की आपूर्ति का नियंत्रित करता है बल्कि ऋण और उधारी पर ब्याज दर भी तय करता है, विनिमय दर समेत विभिन्न बाहरी क्षेत्रों का प्रबंधन करता है और वित्तीय बाजारों पर निगरानी रखते हुए उनका नियमन करता है। केंद्रीय बैंक ऋण और विदेशी मुद्रा बाजार का भी अक्सर नियमन करता है और घरेलू के साथ-साथ बाहरी मोर्चे पर वित्तीय स्थायित्व सुनिश्चित करने का काम भी करता है।  दुनियाभर में केंद्रीय बैंक सरकार से अलग संस्था है। इन बैंकों का नेतृत्व अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ चाहे वह अर्थशास्त्री हो, अकादमिक हो या वाणिज्यिक बैंकर हो या फिर कभी-कभार निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि हो, के हाथ में रहता है। इनका चुनाव नहीं होता है बल्कि सरकार नियुक्त करती है। उन्होंने कहा कि सरकार की निर्णय प्रक्रिया टी-20 मैच जैसी होती है जिसमें चुनाव जैसी कई मजबूरियां शामिल होती हैं। चुनाव नजदीक आने पर पहले घोषित वादों पर अमल करने की जरूरत बढ़ जाती है। जहां वादे पूरे नहीं किए जाते, वहां लोकलुभावन पेशकश की जाती है। दूसरी तरफ केंद्रीय बैंक टेस्ट मैच जैसी भूमिका निभाता है। उस पर कोई चुनावी दबाव नहीं होता है। यही कारण है कि केंद्रीय बैंकों की निर्णय प्रक्रिया में आगे की सोची जाती है और सरकार की प्रक्रिया से ज्यादा टिकाऊ होती है। 
Keyword: RBI, bank, viral acharya, fund,,
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