बिजनेस स्टैंडर्ड - भारतीय फिल्म उद्योग के लिए 'बधाई हो'
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भारतीय फिल्म उद्योग के लिए 'बधाई हो'

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  October 26, 2018

भारतीय फिल्म उद्योग के लिए वर्ष 2018 जबरदस्त साल रहा है और जश्न जारी है। अमित रवींद्रनाथ शर्मा की 'बधाई हो' गुदगुदाने वाली फिल्म है। अधेड़ उम्र के कौशिक दंपती को एक दिन अचानक पता चलता है कि उनके घर नया मेहमान आने वाला है। यह खबर पता चलते ही इस दंपती के बड़े हो चुके बेटों, कौशिक की बूढ़ी मां, पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों की प्रतिक्रिया को देखना काफी मजेदार अनुभव है। नीना गुप्ता ने श्रीमती कौशिक की भूमिका में जान डाल दी है जबकि गजराज राव मध्यवर्गीय रेलवे कर्मचारी श्रीमान कौशिक के चरित्र को जीवंत कर देते हैं। राव ऐसे पति के किरदार में खूब जमे हैं जो अपनी पत्नी से प्यार जताने में संकोच करता है। द टाइम्स ग्रुप की कंपनी जंगली पिक्चर्स के बैनर तले 30 करोड़ रुपये की लागत में बनी फिल्म ने पहले ही सप्ताहांत में 73 करोड़ रुपये से अधिक कमा लिए थे। 

 
बधाई हो फिल्म श्रीराम राघवन की थ्रिलर फिल्म अंधाधुन के तत्काल बाद रिलीज हुई है। अंधाधुन भी बॉक्स ऑफिस पर 56 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा चुकी है। राघवन के खास अंदाज में बनी अंधाधुन तमाम उतार-चढ़ावों से होकर गुजरती है और दर्शक दम साधे बैठे रहने के लिए मजबूर हो जाता है। अगस्त में आई अमर कौशिक की हॉरर-कॉमेडी फिल्म स्त्री भी बिना किसी खास शोरशराबे के 115 करोड़ रुपये कमा ले गई। इसके पहले राजी, भारत आने नेनू, रंगस्थलम और सोनू के टीटू की स्वीटी भी 2018 की सफल फिल्मों की कतार में शामिल हो चुकी हैं।
 
आप यह दलील दे सकते हैं कि फ्लॉप फिल्मों और स्थिर राजस्व वाले दौर के बाद भारतीय फिल्म उद्योग को किस्मत का साथ मिलना लाजिमी ही था। ऐसे में फिल्म कारोबार की बहाली में इतना खास क्या है? इरोस इंटरनैशनल मीडिया के अध्यक्ष (कारोबार विकास) कुमार आहूजा कहते हैं, 'पिछले वर्षों में दर्शकों की पसंद बदल रही है और वही बदलाव अब टॉप 10 में अपनी जगह बनाने लगे हैं।' मेघना गुलजार की 'राजी' इस साल प्रदर्शित हुई फिल्मों में शायद सबसे दमदार फिल्म है। आलिया भट्ट अभी उतनी चमकदार सितारा नहीं बन पाई हैं कि फिल्म उद्योग मुख्य किरदार के रूप में उन पर दांव खेल सके। इसके बावजूद 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान जासूसी करने के लिए पाकिस्तान के एक सैन्य अधिकारी से शादी करने वाली भारतीय लड़की की असल कहानी पर आधारित राजी एक बेहतरीन फिल्म है। खास बात यह है कि फिल्म के प्रस्तुतीकरण से दर्शक भी अपना जुड़ाव महसूस करता है। राजी को देखने के लिए दुनिया भर में दर्शकों ने करीब 2 अरब रुपये के टिकट खरीदे थे।
 
शीर्ष 50 फिल्मों की सूची पर गौर करें तो अधिकांश फिल्मों के बारे में यह सही लगता है। बढिय़ा कहानी पर आधारित 'कंटेंट फिल्में' जितनी तेजी से सफल हो रही हैं वह पहला शुभ संकेत है। फिल्म जगत में 'कंटेंट फिल्म' शब्द का इस्तेमाल रोचक कहानी पर बनी उन फिल्मों के लिए होता है जिसमें नामी-गिरामी सितारे नदारद होते हैं और आम तौर पर बॉक्स ऑफिस पर उनका प्रदर्शन कुछ खास नहीं होता है। हालांकि इस दौरान बड़े सितारों से सजी मसाला फिल्मों- पद्मावत, संजू और वीरे दी वेडिंग ने भी बढिय़ा कारोबार किया है।
 
दर्शकों की पसंद और फिल्मकारों की संवेदनशीलता के बीच तालमेल स्थापित होना दूसरा अच्छा संकेत है। भारतीय फिल्म उद्योग के राजस्व का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा टिकट बिक्री से आता है। वर्ष 2017 में फिल्म देखने के लिए करीब 1.3 अरब लोगों ने टिकट खरीदे थे। यह एक ऐसा आंकड़ा है जो करीब चार वर्षों से गिरावट पर रहा है। हालांकि 2018 के आंकड़े आने अभी बाकी हैं लेकिन शुरुआती रुझानों से यही लगता है कि सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स में टिकटों की बिक्री बढ़ी है। भारत की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स शृंखला पीवीआर सिनेमाज के पास 711 स्क्रीन हैं। पीवीआर ने वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में 2.1 करोड़ टिकट बेचे थे, 2018-19 की पहली तिमाही में यह आंकड़ा बढ़कर 2.27 करोड़ पर पहुंच गया। फिल्म कारोबार जगत के भीतर इस बात पर चर्चा चल रही है कि क्या टिकट खरीदने वाले लोगों की संख्या में हुई बढ़ोतरी नए दर्शकों की वजह से हुई है। हालांकि यह सवाल अधिक मायने नहीं रखता है, खासकर टिकटों की अधिक बिक्री जारी रहने पर इसका कोई मतलब नहीं रह जाता है। पीवीआर पिक्चर्स के सीईओ कमल ज्ञानचंदानी कहते हैं कि फिल्म कारोबार में सुधार के संकेत उस साल में दिख रहे हैं जब ओवर-द-टॉप (ओटीटी) स्ट्रीमिंग सेवाओं के विस्तार में सर्वाधिक प्रगति देखी गई है। ऐसा लगता है कि ओटीटी पर उपलब्ध सामग्री ने कंटेंट-आधारित सिनेमा के प्रति दर्शकों की चाह बढ़ाने का काम किया है। 
 
हालांकि कंटेंट को लेकर छिड़ी जंग से एक चिंता भी पैदा होती है। एमेजॉन और नेटफ्लिक्स जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म ने कंटेंट कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी है। नई सदी के शुरुआती दौर में दर्शकों को अपने साथ जोडऩे के लिए टीवी चैनलों ने फिल्मों के प्रसारण अधिकार खरीदे थे। इस बढ़ते राजस्व स्रोत के सहारे फिल्म स्टूडियो ने प्रतिभावान कलाकारों को अपने साथ जोडऩे की होड़ शुरू कर दी जिससे लागत बढ़ गई और मार्जिन पर दबाव पडऩे लगा। लेकिन लागत बढऩे से फिल्मों का धंधा कमजोर पडऩे लगा और कई स्टूडियो इसकी चपेट में आ गए। वर्ष 2016 में डिज्नी इंडिया को भी अपना निर्माण स्टूडियो बंद करना पड़ा था। वह अनुभव अब भी भय पैदा करता है। 
 
वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स के मुख्य परिचालन अधिकारी अजित अंधारे आगाह करते हुए कहते हैं, 'मांग की पूर्ति करने के लिए आपूर्ति बढ़ाने की प्रवृत्ति हावी हो सकती है। बाजार में कमाई का नया स्रोत होने से इसकी आशंका है।' अगर ऐसा होता है तो सुधार का मौजूदा दौर उदासी के भंवर में फंस सकता है।
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