बिजनेस स्टैंडर्ड - तेल संकट की चुनौती का सामना
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तेल संकट की चुनौती का सामना

अरुणाभ घोष /  October 26, 2018

भारत को ध्यान से देखना चाहिए कि कैसे हाल में शुरू हुए शांघाई इंटरनैशनल एनर्जी एक्सचेंज ने पश्चिम के वर्चस्व वाले तेल डेरिवेटिव बाजार में सेंध लगाई है और इसके मुताबिक अपनी खरीद के लिए हेजिंग की है। बता रहे हैं अरुणाभ घोष

 
अक्टूबर की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतें चार साल के अपने उच्चतम स्तर 86 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गईं। नवंबर, 2014 में जब कीमतों में गिरावट आई थी तो भारत ने राजस्व बढ़ाने के लिए ईंधन सब्सिडी में सुधार किया और तेल उत्पादों पर कर बढ़ाया। कीमतें एक बार फिर चढऩे से कई मोर्चों पर चिंताएं बढ़ रही हैं। इनमें चालू खाते का घाटा, रुपये में गिरावट, मुद्रास्फीति दबाव और राजकोषीय अनिश्चितता शामिल है। हमें यह समझना होगा कि इसमें क्या खेल है और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस झटके का लाभ उठाया जाए। 
 
हमने पहले भी इस तरह के संकट का सामना किया है। वर्ष 1979 की ईरानी क्रांति और दूसरे तेल झटके से रुपये का अवमूल्यन हुआ था। पहले खाड़ी युद्घ ने तेल के आयात की लागत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.6 फीसदी बढ़ गई थी। 1996 के कुर्द गृह युद्घ ने इराकी तेल के निर्यात को रोक दिया था जिससे चालू खाते का घाटा करीब तीन गुना बढ़ गया था। ईरान पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के कारण 2010-13 के दौरान भारत को वहां से तेल के आयात में करीब 38 फीसदी कटौती करनी पड़ी थी। 
 
इस बार स्थिति थोड़ा अलग है। कच्चे तेल की कीमतें केवल भुगतान संतुलन को प्रभावित नहीं करती हैं। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही बड़ी अर्थव्यवस्था है और उसे अपनी गति बनाए रखने के लिए हाइड्रोकार्बन की जरूरत है। वर्ष 2030 तक दैनिक तेल व्यापार में भारत का हिस्सा 12.5 फीसदी पहुंच जाएगा जो 2014 में 7.4 फीसदी था। इससे भारत तेल बाजारों में एक अहम खिलाड़ी बन जाएगा। शायद इसी वजह से पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय तेल एवं गैस कंपनियों के प्रमुखों से कहा था कि वे सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को न मारें। भारत को तेल कीमतों में बार-बार होने वाली बढ़ोतरी के झटकों को झेलना है क्योंकि वह वैश्विक तेल बाजारों से ज्यादा गहराई से जुड़ा है। 
 
इस बार जो समीकरण उभर रहे हैं, वे पिछले प्रकरणों से अलग हैं। 2008 की शुरुआत में जब तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थी या 2011 और 2014 के बीच कई बार उसमें तेजी आई थी (ईरानी प्रतिबंधों के बावजूद) तो इसके लिए भारी मांग जिम्मेदार थी। अब इसकी वजह बेहद कम आपूर्ति है, जो तेल की कीमतों और कमजोर प्रदर्शन करने वाली पेट्रोमुद्राओं (नॉर्वेजियन क्रोनर, कनाडियन डॉलर और मैक्सिकन पीसो) के बीच बढ़ते अंतर को बताती है। अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर प्रभाव भी रुपये के लिए चिंता का विषय है। भारत उन पांच एशियाई देशों में शामिल है जहां मुद्रास्फीति पर तेल की कीमतों के प्रभाव को लेकर बेहद संवेदनशील हैं। इनमें भारत के अलावा श्रीलंका, फिलीपींस, वियतनाम और थाईलैंड शामिल हैं। ताइवान, दक्षिण कोरिया और भारत सहित अन्य देशों के निर्यात पर नकारात्मक असर की आशंका है। चालू खाते का घाटा वित्त वर्ष 2017 में 0.7 फीसदी था जो अब बढ़कर 2.4 फीसदी पहुंच चुका है और इसके वित्त वर्ष 2019 से पहले और बढऩे की आशंका है। 
 
हमें ऊर्जा बाजारों में अल्पकालिक तेजी और संरचनात्मक बदलावों के लिए स्थानीय कारणों के बीच अंतर करना चाहिए। पिछले महीने बंदूकधारियों ने लीबिया की सरकारी तेल कंपनी के मुख्यालय पर हमला किया था। जून से इसके तेल निर्यात में उतार-चढ़ाव आया है। वेनेजुएला में घरेलू उथलपुथल के कारण पिछले तीन साल में तेल उत्पादन आधा रह गया है और 2018 की पहली छमाही में भारत को निर्यात में 21 फीसदी की गिरावट आई है। सितंबर में बसरा (इराक की तेल राजधानी) में दंगे हुए। इराक से निर्यात अभी रिकॉर्ड स्तर पर है लेकिन तेल कारोबारी अपने जोखिम में इस तरह की घटनाओं की गणना करते हैं। इराक  भारत के तीन शीर्ष आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है।
 
तेल की बढ़ती कीमतों में योगदान देने वाले इस स्थानीय घटनाक्रम के बरअक्स तीन रुझानों पर विचार करिए। पहला यह कि अमेरिका में शेल उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और 2019 के अंत तक यह रोजाना 1.15 करोड़ बैरल को पार कर सकता है। 2023 तक अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक और शुद्घ ऊर्जा निर्यातक बन सकता है। दूसरा रुझान यह है कि करीब दो साल से सीमित उत्पादन बरकरार रखने के बावजूद तेल उत्पादक देशों का संगठन ओपेक अच्छी तरह जानता है कि अमेरिका से हो रही वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति से उसका बाजार हिस्सा प्रभावित होगा। कीमतों को बढ़ाने के लिए उत्पादन रोके रखने की रणनीति कुछ हद तक काम कर सकती है लेकिन अगर बाजार ही खत्म हो गया तो फिर इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता है। 
 
तीसरा रुझान यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ गई है, चीन की विकास दर में गिरावट आई है और पश्चिमी देशों की ऊर्जा की मांग सपाट है। पेट्रोकेमिकल या विमान ईंधन की बढ़ती मांग सड़क परिवहन के लिए तेल की मांग में आई गिरावट की भरपाई कर सकती है। इन कारणों से भविष्य में तेल की कीमतों में तेजी के बजाय कमी आ सकती है। इन रुझानों को नजरअंदाज किए बिना भारत मौजूदा संकट से कैसे निपटना चाहिए? सरकार ने सभी बड़े तेल आपूर्तिकर्ता देशों से भुगतान की शर्तों की समीक्षा करने का अनुरोध किया है जो सही दिशा में उठाया गया कदम है। प्रस्तावित अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ईरान से तेल की खरीद जारी रखने के तरीके तलाश रहा है। यह भी सही कदम है खासकर अगर चीन और यूरोपीय देश इसका पालन नहीं करते हैं। भारत को ध्यान से देखना चाहिए कि कैसे हाल में शुरू हुए शांघाई इंटरनैशनल एनर्जी एक्सचेंज ने पश्चिम के वर्चस्व वाले तेल डेरिवेटिव बाजार में सेंध लगाई है और इसके मुताबिक अपनी खरीद के लिए हेजिंग की है। अगला कदम राजनीतिक रूप से संवेदनशील लेकिन आर्थिक रूप से समझदार तरीकों से करों और सब्सिडी से निपटना है। वित्त वर्ष 2017 में एलपीजी सब्सिडी 151.32 अरब रुपये और वित्त वर्ष 2018 में 234.52 अरब रुपये थी। बढ़ती कीमतों के कारण जून में प्रति सिलिंडर 205 रुपये का सब्सिडी का बोझ सितंबर में 320 रुपये पहुंच गया। अगर कीमतों में तेजी बनी रहती है तो वित्त वर्ष 2019 में कुल सब्सिडी 264 अरब रुपये की होगी। 
 
सरकार राजकोषीय घाटे को प्रभावित किए बिना आसानी से तेल उत्पादों पर शुल्क में कटौती नहीं कर सकती है। ईंधन पर प्रति लीटर शुल्क में 1.5 रुपये का मतलब है कि अक्टूबर से वित्त वर्ष 2019 के अंत तक पेट्रोल और डीजल से होने वाले कर राजस्व में 82.87 अरब रुपये का नुकसान होगा। केवल 37.8 फीसदी डीजल की बिक्री ट्रकों और बसों के लिए होती है। निजी और व्यावसायिक कारों तथा यूटिलिटी वाहनों (बिक्री का 22.09 फीसदी हिस्सा) के लिए डीजल पर करों में कटौती नहीं होनी चाहिए। तेल की ऊंची कीमतों का बोझ अमीर उपभोक्ताओं पर डालकर ईंधन दक्षता के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। 
 
अंत में भारत को वैकल्पिक परिवहन ईंधन सीएनजी, एथनॉल, मेथनॉल और डीएमई (डाईमिथाइल ईथर) तथा इलेक्ट्रिक वाहनों पर एक राष्ट्रीय रणनीति की जरूरत है ताकि स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा दिया जा सके। अन्यथा हम हमेशा बढते आयातित कच्चे तेल पर निर्भर रहेंगे और कीमतों में उतार चढ़ाव को लेकर असुरक्षा रहेगी। किसी अर्थव्यवस्था और उसके नीतिनिर्माताओं की परिपक्वता की परीक्षा संकट के समय ही होती है। भारत के अभी के फैसले यह तय करेंगे कि भविष्य के झंझावातों से निपटने में वह कितना सफल रहता है।
 
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट ऐंड वाटर के मुख्य कार्याधिकारी हैं।)
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