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केंद्रीय कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों की बढ़ती रहेगी हिस्सेदारी!

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  October 25, 2018

सरकार ने इस सप्ताह प्रत्यक्ष करों के आंकड़े जारी किए हैं। ये इस बारे में बहुत कुछ बताते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कर प्रशासन का कैसे प्रबंधन किया है। मनमोहन सिंह सरकार के अंतिम वर्ष 2013-14 में कुल केंद्रीय करों में प्रत्यक्ष करों (मुख्य रूप से व्यक्तिगत आयकर और निगम कर) का हिस्सा 56 फीसदी था, जो 2009-10 में 61 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर से कुछ कम था। मोदी सरकार अपने पहले साल में कुल केंद्रीय करों में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा 56 फीसदी के उसी स्तर पर बनाए रखने में सफल रही, लेकिन उसके बाद के दो वर्षों में गिरावट से चिंता पैदा हुई। केंद्रीय कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा घटकर 2015-16 में 51 फीसदी और 2016-17 में 49 फीसदी पर आ गया। ऐसा लगता है कि 2017-18 में कुछ सुधार आया है और प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी बढ़कर 52 फीसदी पर पहुंच गई है। 

 
प्रत्यक्ष करों के हिस्से में इतनी गिरावट की वजह यह हो सकती है कि उनकी वृद्धि दर 2014-15 और 2015-16 में क्रमश: 9 फीसदी और 7 फीसदी रही, जबकि इस अवधि में अप्रत्यक्ष कर संग्रह में भारी बढ़ोतरी हुई है। प्रत्यक्ष करों के हिस्से में धीरे-धीरे बढ़ोतरी का श्रेय 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के बाद कर अनुपालना के प्रयासों में बढ़ोतरी को भी दिया जाना चाहिए। प्रत्यक्ष कर संग्रह 2016-17 में 14 फीसदी से अधिक और 2017-18 में 18 फीसदी बढ़ा है। प्रत्यक्ष कर बॉयंसी (जीडीपी वृद्धि में बदलाव पर कर राजस्व वृद्धि की प्रतिक्रिया) की दर वर्ष 2017-18 में बढ़कर 1.81 हो गई है, जो 2015-16 में 0.8 थी। ऐसा लगता है कि कुल केंद्रीय कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी में इस साल भी बढ़ोतरी जारी रहेगी, जबकि वस्तु एïवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद अप्रत्यक्ष करों को स्थिर होने में समय लगेगा। 
 
लेकिन प्रत्यक्ष कर संग्रह सुधरने में कर विभाग के हाथ में मौजूद एक हथियार की भूमिका है, जिसकी बदौलत वह बिना किसी अड़चन या अतिरिक्त लागत के आयकर और निगम कर एकत्र कर लेता है। यह हथियार स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) की व्यवस्था है। यह कानून के मुताबिक उन सभी लोगों पर लागू होता है, जो एक वर्ष में एक निर्धारित स्तर से अधिक भुगतान करते हैं। वर्ष 2014-15 में सकल प्रत्यक्ष कर प्राप्तियों में टीडीएस का हिस्सा करीब 32 फीसदी था। पिछले साल यह बढ़कर 36 फीसदी हो गया। टीडीएस में भी बढ़ोतरी इसलिए हुई है क्योंकि कर विभाग ने कर अनुपालना में सुधार के लिए एक बड़ी मुहिम चलाई थी। टीडीएस की संस्कृति का व्यापक विस्तार हुआ है, जिसका पता कुल प्रत्यक्ष कर प्राप्तियों में इसकी हिस्सेदारी में 4 प्रतिशत बढ़ोतरी से चलता है। 
 
अगर आप व्यक्तियों या उद्यमों द्वारा स्वैच्छिक रूप से चुकाए गए अग्रिम करों को भी जोड़ देते हैं तो इन दो इंस्ट्रुमेंटों (टीडीएस और अग्रिम कर) की हिस्सेदारी कुल प्रत्यक्ष कर संग्रह में बढ़कर करीब 76 फीसदी हो जाती है। कानून के तहत अग्रिम कर का भुगतान अनिवार्य बनाया गया है। प्रत्यक्ष करों का तीन-चौथाई हिस्सा अपने आप सरकारी खजाने में आ रहा है, जिससे प्रत्यक्ष कर विभाग की भविष्य की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठ सकते हैं। प्रत्यक्ष कर संग्रह की लागत घटी है। यह 2016-17 में कुल राजस्व संग्रह की 0.66 फीसदी थी, जो 2017-18 में 0.61 फीसदी पर आ गई है। लेकिन अब तकनीक की भूमिका बढ़ती जा रही है और अग्रिम करों तथा टीडीएस का कुल राजस्व संग्रह में बड़ा हिस्सा है। ऐसे में कर विभाग के सामने यह बड़ा सवाल पैदा होगा कि क्या वह प्रत्यक्ष कर संग्रह से जुड़े अपने वर्तमान कर्मचारियों की तादाद को कम कर सकता है और प्रत्यक्ष कर संग्रह की लागत को घटाकर कुल राजस्व संग्रह के कम से कम 0.5 फीसदी के स्तर पर ला सकता है। इस समय कर विभाग में प्रत्यक्ष कर संग्रह के लिए 80,000 कर्मचारी हैं। 
 
प्रत्यक्ष कर के आंकड़े इस पर भी प्रकाश डालते हैं कि मोदी सरकार के दौरान व्यक्तिगत आय की स्थिति कैसी रही। आयकर रिटर्न भरने वाले लोगों की संख्या (पांच लाख रुपये से अधिक कुल सालाना आय) में वर्ष 2014-15 से 2016-17 के दौरान 13 से 25 फीसदी की अच्छी वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि अभी 2017-18 के आयकर रिटर्न के आंकड़े संकलित नहीं किए गए हैं। इन तीन वर्षों में केवल 2.5 लाख रुपये से कम आय श्रेणी वाले और 2016-17 में 5 लाख रुपये से कम आय वाले लोगों के रिटर्न भरने में कमी दर्ज की गई है। इस गिरावट की वजह लोगों की आमदनी में बढ़ोतरी हो सकती है। 
 
इसकी वजह यह भी हो सकती है कि जब कर श्रेणी में बढ़ोतरी की जाती है तो छूट पाने वाले रिटर्न भरना बंद कर देते हैं। या इसकी वजह यह हो सकती है कि 2.5 लाख रुपये से 5 लाख रुपये के सालाना वेतन स्तर पर कार्यबल में शामिल होने वाले लोगों की संख्या की वृद्धि धीमी पड़ रही है। उच्च आय श्रेणी में स्थिति पूरी तरह अलग है। एक करोड़ रुपये से अधिक आमदनी वाले लोगों की संख्या 2014-15 में 59,830 थी, जो उससे पिछले साल की तुलना में 24 फीसदी बढ़ी थी। उससे अगले साल उनकी संख्या 13 फीसदी बढ़कर 67,783 हो गई और वर्ष 2016-17 में 20 फीसदी बढ़कर 81,344 पर पहुंच गई। 
 
हालांकि लोगों द्वारा घोषित कुल वेतन आमदनी में गिरावट दर्ज की गई है। यह वर्ष 2014-15 और 2015-16 में 18-19 फीसदी से अधिक सालाना दर से बढ़ रही थी। लेकिन वृद्धि दर 2016-17 में गिरकर 14 फीसदी पर आ गई। यह 2017-18 में सुधरी या नहीं, इसका पता सरकार के प्रत्यक्ष करों के आंकड़ों की अगली किस्त जारी करने पर भी चलेगा। 
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