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दक्षिण एशिया में आर्थिक एकीकरण की चुनौती

अमिता बत्रा /  October 25, 2018

दक्षिण एशिया के आर्थिक एकीकरण की राह में भारत और पाकिस्तान की आपसी शत्रुता लंबे समय से रोड़ा बनी हुई है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रही हैं अमिता बत्रा

 
विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में अंतरक्षेत्रीय व्यापार दुनिया के सभी क्षेत्रों में न्यूनतम है। इसमें मौजूदा स्तर से तीन गुना तक के इजाफे की संभावना मौजूद है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत और पाकिस्तान के आपसी व्यापार को मौजूदा 200 करोड़ डॉलर से बढ़ाकर 3,700 करोड़ डॉलर तक ले जाने की क्षमता भी इसमें मौजूद है। रिपोर्ट इस ज्ञात तथ्य को उद्घाटित करती है कि दक्षिण एशिया में व्यापारिक संभावनाओं का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
 
इससे पहले मैंने भी इस विषय पर एक अध्ययन किया था ( इंडियाज ग्लोबल ट्रेड पोटेंशियल: द ग्रैविटी मॉडल अप्रोच, ग्लोबल इकनॉमिक रिव्यू, 2006: इक्रियर वर्किंग पेपर 252, 2004)। मैंने अनुमान जताया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक व्यापार की संभावना का 27 का अनुपात पूरे दक्षिण एशिया में सबसे अधिक था। यह अनुमान समायोजित गुरुता के मॉडल पर आधारित था। यह मॉडल विभिन्न देशों के आर्थिक आकार और उनके बीच की भौतिक दूरी के साथ-साथ आबादी, ऐतिहासिक और भाषाई करीबी, क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों को लेकर उनकी भागीदारी के आधार पर अपना अनुमान प्रकट करता है। 
 
विश्व बैंक के अध्ययन में भी काफी हद तक ऐसे ही तरीके इस्तेमाल किए गए। उसके अध्ययन में यह बात रेखांकित की गई कि दक्षिण एशिया के देशों में वास्तविक व्यापार और संभावित व्यापार का अंतर 2001 से लगातार बढ़ रहा है। यह ऐसे क्षेत्र में हो रहा है जहां दुनिया की सबसे जीवंत अर्थव्यवस्थाएं हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था बीते 15 वर्ष से औसतन 7 फीसदी की दर से विकसित हो रही है।  दक्षिण एशिया उन शुरुआती इलाकों में से था जो 2009 के वैश्विक वित्तीय संकट से निपटे और 8 फीसदी की विकास दर दर्शाई। हालांकि एक स्पष्टï विरोधाभासी बात यह है कि यह क्षेत्र औसतन 5 फीसदी की वृद्घि दर पर स्थिर रहा है। आश्चर्य नहीं कि 2001 के बाद से अंतरक्षेत्रीय व्यापार के वास्तविक और संभावित आंकड़े में अंतर बढ़ता जा रहा है। 
 
व्यापक संभावनाओं के साथ भी दक्षिण एशिया नैसर्गिक कारोबारी साझेदार की परिकल्पना का एक विशिष्टï अपवाद बना हुआ है। ऐसा खासतौर पर इसलिए क्योंकि क्षेत्र की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं भारत और पाकिस्तान के बीच निरंतर विवाद की स्थिति बनी रहती है। यही वजह है कि दक्षिण एशिया अपनी भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई एकजुटता का लाभ आर्थिक एकीकरण के रूप में नहीं ले पाया है। भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी भरोसा कायम करने के तमाम उपायों के बावजूद बीते सात दशक से विवाद कायम है। पाकिस्तान ने दो बार भारत को वरीयता प्राप्त देश का दर्जा देने का वादा भी किया लेकिन हकीकत में कुछ नहीं हुआ। बल्कि कई बार तो भरोसा कायम करने संबंधी कदमों की घोषणा के बाद तनाव बढ़ ही गया। अभी हाल ही में पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री ने आपसी रिश्ते को बातचीत से व्यापार तक ले जाने का इरादा जताया था लेकिन उसके तत्काल बाद सीमा पर भारतीय जवानों को मार दिया गया। बातचीत शुरू होने के पहले ही बंद हो गई। कहने का अर्थ यह कि ऐसे उपायों ने दोनों देशों के रिश्ते की मूल प्रकृति में कोई अंतर नहीं पैदा किया है। चूंकि ये दोनों इस क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश हैं इसलिए यह पूरा क्षेत्र इससे प्रभावित होता है। 
 
अपनी किताब रीजनल इकनॉमिक इंटीग्रेशन इन साउथ एशिया: ट्रैप्ड इन कान्फ्लिक्ट? में मैंने समायोजित गुरुत्व मॉडल को विस्तार देते हुए इस बहुआयामी द्विपक्षीय चर्चा में अफगानिस्तान के रूप में एक तीसरा पक्ष भी शामिल किया था। अफगानिस्तान भी गृहयुद्घ का शिकार है और सबसे अहम बात यह है कि वहां यह अनुमानित भी है। वास्तविक विवाद जहां व्यापारिक लेनदेन को प्रभावित करते हैं, वहीं अनुमानित विवाद की स्थिति में उन क्षेत्रों में कारोबार जोखिम में पड़ जाता है जहां विवाद की आशंका रहती है। इन हालात में मौद्रिक अस्थिरता, अनुबंध टूटने, संस्थागत विश्वसनीयता के क्षय और सरकारी प्रतिबंध आदि बढऩे के कारण मुनाफे वाले व्यवसाय की संभावना बहुत कम हो जाती है। मेरा विश्लेषण बताता है कि वास्तविक और अनुमानित विवादों के चलते आमतौर पर व्यापार में 65 फीसदी की क्षति हुई और दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा 75 फीसदी रहा। भौगोलिक निकटता जहां सामान्य परिस्थितियों में लाभदायक होती है, वहीं अगर रिश्ते भारत-पाकिस्तान जैसे हों तो इसका उलट देखने को मिलता है। इतना ही नहीं अगर जहां विभिन्न देश अनसुलझे विवादों के बीच कारोबारी व्यवस्था कायम करने का प्रयास करते हैं वहां भी नतीजा शून्य निकलता है। 
 
दक्षिण एशियाई प्राथमिकता व्यापार व्यवस्था (साप्टा) और दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार समझौता (साफ्टा) दोनों केवल इसलिए निष्प्रभावी साबित हुए क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच निरंतर विवाद छिड़ा रहता है। साप्टा में द्विपक्षीय तनाव गहरा होने और करगिल युद्घ छिडऩे के कारण सन 1999 में चौथे दौर की वार्ता रद्द करनी पड़ी और साफ्टा को लेकर पाकिस्तान का रुख सकारात्मक नहीं रहा क्योंकि उसने समझौते की भावना का उल्लंघन किया और प्रभावी क्रियान्वयन को रोका। हालांकि वर्ष 2017 में रुख में बदलाव का वादा किया गया था लेकिन अब तक इस दिशा में आंशिक प्रगति ही हुई है। पाकिस्तान ने साफ्टा के अधीन भारत के साथ कारोबार की एक विशिष्ट नकारात्मक सूची अवश्य बनाई है लेकिन भारत को वरीयता प्राप्त राष्ट्र का दर्जा देने या बाजार पहुंच के लिहाज से गैरभेदभाव वाले राजनीतिक रूप से स्वीकार्य कदम नहीं उठाए गए हैं।
 
दक्षिण एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं में एकीकरण का सवाल बरकरार है क्योंकि क्षेत्र के दो सबसे बड़े देशों के बीच शत्रुता का माहौल है। अल्पावधि में अथवा मध्यम अवधि में इस चुनौती से पार पाना आसान नहीं है। उस लिहाज से देखें तो वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार करना अधिक बेहतर होगा। बीबीआईएन (बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल) और बिम्सटेक  (बंगाल की खाड़ी में बहुक्षेत्रीय तकनीकी और क्षेत्रीय सहयोग) जैसी उपक्षेत्रीय पहल इसका उदाहरण हैं। भारत अगर पहल जारी रखे तो ये व्यवस्था रुचि रखने वाले साझेदारों को अधिक व्यवहार्य और लाभदायक आर्थिक एकीकरण और व्यापार संवद्र्धन व्यवस्था की ओर आगे ले जा सकती है।
 
(लेखिका जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन की प्रोफेसर हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूरी तरह निजी हैं।)
Keyword: world bank, business, GST, IBC,,
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