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बढ़ता ई-कॉमर्स

संपादकीय /  October 25, 2018

भारत का ई-कॉमर्स क्षेत्र अनिश्चित नीतिगत परिवेश होने के बावजूद बहुत तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2013 में कुल खुदरा कारोबार में ऑनलाइन खुदरा कारोबार की हिस्सेदारी एक फीसदी से भी कम थी लेकिन वर्ष 2018 तक यह तीन फीसदी को पार कर गई है। असल में, पर्सनल कंप्यूटर और स्मार्टफोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों के समूह में ई-कॉमर्स की बाजार हिस्सेदारी कहीं अधिक है। फर्नीचर और महंगे फैशन उत्पादों की भी वृद्धि दर जबरदस्त रही है। एमेजॉन और फ्लिपकार्ट ने हाल में नवरात्रों के दौरान आयोजित सेल के दौरान 5 अरब रुपये से भी अधिक राशि मार्केटिंग पर खर्च की है और दीवाली तक यह और बढ़ेगी। इस त्योहारी सीजन में पहले से अधिक प्रतिस्पद्र्धा देखने को मिल रही है। फ्लिपकार्ट के वॉलमार्ट की सहायक कंपनी बन जाने के बाद दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ऑनलाइन बाजार में सबसे बड़ी ऑनलाइन विक्रेता कंपनी एमेजॉन के साथ उसका सीधा मुकाबला हो रहा है। 

 
हालांकि ऑनलाइन खुदरा बाजार में बाकी कंपनियां भी खरीदारों को भारी छूट दे रही हैं। विश्लेषकों का दावा है कि नवरात्र की सेल के दौरान ऑनलाइन बिक्री का आंकड़ा 2.6 अरब डॉलर यानी 190 अरब रुपये तक पहुंच गया। यह एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले 1.4 अरब डॉलर अधिक है। बिक्री में इस तेजी का श्रेय दूसरे एवं तीसरे दर्जे के शहरों तक ऑनलाइन बाजार के विस्तार को दिया जा रहा है। एमेजॉन इंडिया के नए उपभोक्ताओं में छोटे शहरों की हिस्सेदारी 82 फीसदी तक है। अपने प्लेटफॉर्म को स्थानीय भाषा के अनुकूल बनाना और ग्रामीण क्षेत्र के हरेक पिन कोड तक डिलिवरी करने की एमेजॉन की प्रतिबद्धता के पीछे बड़ी वजह छोटे शहर ही हैं। फ्लिपकार्ट ने भी अपने नए उपभोक्ताओं में छोटे शहरों का हिस्सा 50 फीसदी से ऊपर होने का दावा किया है। 
 
ई-कॉमर्स के इस विस्फोट से निकलने वाले सकारात्मक पहलुओं पर गौर करना काफी रोचक है। देश के अलग-अलग शहरों में फ्लिपकार्ट और एमेजॉन के करीब 100 सुविधा केंद्र हैं। ये पोर्टल हजारों लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार दिए हुए हैं जिनमें डेटा एनालिसिस और मार्केटिंग से लेेकर डिलिवरी तक के काम शामिल हैं। ये पोर्टल भारत में कारोबार संचालित करने के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भी खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने आसान पहुंच वाले  वित्तीय-तकनीकी समाधानों को अपनाया है जिनमें पेटीएम, एमेजॉन पे और फोनपे शामिल है। इस तरह नोटबंदी की तुलना में 'कैशलेस' वाणिज्य को व्यापक स्वीकृति दिलाने में यह अधिक असरदार साबित हुए हैं। वहीं भुगतान के आसान विकल्पों के अलावा ई-कॉमर्स साइट उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत कम दाम पर उत्पादों की विस्तृत शृंखला मुहैया करा रहे हैं। इन पर बिकने वाले कई उत्पाद मझोले और छोटे शहरों के ऑफलाइन बाजार में उपलब्ध भी नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ई-कॉमर्स ने ग्रामीण एवं कस्बाई इलाकों में एक खुदरा क्रांति को जन्म दिया है। 
 
हालांकि नीतिगत अवरोध नहीं होने पर यह क्षेत्र अधिक तेजी से बढ़ा रहता। उस स्थिति में अधिक रोजगार अवसर पैदा होते और उपभोक्ताओं को कम कीमत चुकानी पड़ती। बहुलांश विदेशी शेयरधारिता वाली कंपनी को ऑनलाइन खुदरा विक्रेता बनने से रोकने से इस क्षेत्र को नुकसान हुआ है। अगर अधिक ब्रांडों के उत्पाद रखने पर लगी पाबंदियां हटा ली जाती हैं तो इसकी क्षमता बढ़ेगी जो बाजार को अधिक सशक्त बनाएगा। डेटा को भारत में ही रखने का प्रस्ताव आने से इस क्षेत्र की चिंता बढ़ी है। इसके अलावा रियायती मूल्य पर 'सनसेट' प्रावधान लगाने का प्रस्ताव भी परेशान कर रहा है। फिलहाल ई-कॉमर्स नीति के मसौदे की समीक्षा चल रही है। अगर ये पाबंदियां हटा ली जाती हैं या शिथिल कर दी जाती हैं तो यह उपभोक्ताओं एवं ई-कॉमर्स कंपनियों दोनों के लिए जीत की स्थिति होगी। 
Keyword: e commerce, flipkart, wallmart, amazone, retail,,
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