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पुनर्खोज के दौर में विज्ञापन एजेंसियां

अजित बालकृष्णन /  October 24, 2018

वर्ष 1971 में भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कलकत्ता से स्नातक होने के बाद से अब तक मैं सात बार मंदियों से गुजर चुका हूं। इस दौरान मेरी सीख यह रही है कि सरकार 'मंदी' शब्द का इस्तेमाल करने से तब तक बचती है जब तक कि वह खत्म न हो गई हो और समाचारपत्र, पत्रिकाएं एवं टीवी पंडित (और अब वेबसाइट) तो मंदी के बारे में इस तरह सक्रिय चर्चा करते हैं कि वह कारोबारी तबके को भयभीत कर हालात बदतर कर देते हैं।

लेकिन मेरे लिए चार दशकों की इस अवधि में मुंबई के मरीन ड्राइव पर खाली होर्डिंग्स का दिखना एक अचूक संकेतक रहा है। नरीमन प्वाइंट से शुरू होकर उत्तर में चौपाटी तक के किनारे पर खाली होर्डिंग दिखने के बाद मंदी की आहट मान ली जाती है। जब मरीन ड्राइव पर दोबारा होर्डिंग्स लटकने शुरू हो जाते हैं तो वह कारोबारी गतिविधियों के दोबारा रफ्तार पकडऩे और कंपनियों की बिक्री एवं मुनाफे में तेजी का भी संकेत होता है। इस पृष्ठभूमि में मुझे यह बात परेशान कर रही है कि मरीन ड्राइव पर सारे होर्डिंग्स करीब एक साल से सूने पड़े हुए हैं।

मरीन ड्राइव से होते हुए रोजाना की तरह अपने काम पर जाते समय हाल ही में मेरा ध्यान खाली पड़े होर्डिंग्स पर गया और उसी समय अपने मोबाइल फोन पर कारोबारी जगत की पत्रिका ऐड एज का अवलोकन करते समय दुनिया की शीर्ष 10 विज्ञापन एजेंसियों से संबंधित एक रिपोर्ट पर मेरी नजर टिक गई। पहले पांच स्थानों पर डब्ल्यूपीपी, ओम्नीकॉम, पब्लिसिस, इंटरपब्लिक और देंतसू की मौजूदगी से कोई अचरज नहीं हुआ।

लेकिन उसके बाद एक्सेंचर, पीडब्ल्यूसी, आईबीएम और डेलॉयट के नाम देखकर मुझे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। मुझे लगा कि किसी पत्रकार ने विज्ञापन एजेंसियों की रैंकिंग को प्रबंधन सलाहकार फर्मों की रैंकिंग समझने की भूल तो नहीं कर दी? अगर वाकई में यह रिपोर्ट सही है तो क्या इसका यह मतलब है कि मार्केटिंग सेवा क्षेत्र में मंदी से इतर भी कहीं गहरे संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं?

इस विस्मयकारी बदलाव को पूरी तरह समझने के लिए इतिहास पर नजर डालना समीचीन होगा। एक उद्योग के तौर पर विज्ञापन का उदय अमेरिका में 20वीं सदी की शुरुआत में हुआ। बड़े पैमाने पर उत्पादन की तकनीकें आने के बाद उत्पादों को अलग पहचान देने के लिए विज्ञापन का इस्तेमाल होने लगा था। क्वेकर ओट्स कंपनी ने अपने ट्रेडमार्क के बजाय क्वेकर की छवि का ही इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। 

पियर्स साबुन, कैंपबेल सूप और कोका कोला ने भी इसका अनुसरण करते हुए अपना 'ब्रांड' बनाने के लिए दृश्य माध्यमों का उपयोग किया। 'ब्रांड' की अवधारणा ने किसी उत्पाद की एक खास छवि बनाने में मदद की जबकि उसका उत्पाद के भौतिक गुणों से कोई खास मेल नहीं होता था। इस तरह मार्केटिंग के चतुर खिलाडिय़ों ने उत्पादों के साथ सेवाओं को भी शख्सियत से जोड़ दिया। साबुन निर्माताओं ने ब्रांडिंग को रेडियो और टेलीविजन पर इस तरह अंजाम दिया कि यह समूची विधा ही 'सोप ओपेरा' कही जाने लगी। 

विज्ञापन एजेंसियों का उदय इसी रोमांचक दौर का नतीजा है। ये एजेंसियां उपभोक्ताओं तक वांछनीय 'ब्रांड मूल्य' पहुंचाने के लिए प्रिंट लेआउट एवं रेडियो जिंगल्स बनाने में महारत रखने के साथ ही समाचारपत्र, पत्रिकाओं और रेडियो पर इन प्रचार सामग्रियों को प्रकाशित-प्रसारित भी कराती थीं। सिनेमा और टेलीविजन के विकास के साथ ये माध्यम भी उनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा बन गए। 

इस क्षेत्र में पहला बड़ा बदलाव 1980 के दशक के मध्य में आया जब ऑगिल्वी, यंग और रुबिकेम जैसे इस उद्योग के संस्थापक महारथियों ने अपने काम को अलविदा कहना चाहा। पूरी तरह से पैसा कमाने के मकसद से आए मार्टिन सोरेल जैसे उद्यमी उनकी जगह लेने के लिए आगे आए और एजेंसियों को उबारने के लिए कर्ज का खूब इस्तेमाल किया। इससे विज्ञापन एजेंसियों की होल्डिंग कंपनियों का दौर शुरू हुआ जो लिए गए कर्जों के भुगतान के लिए मोटा मुनाफा कमाने को सर्वोच्च प्राथमिकता देती थीं। इसका नतीजा यह हुआ कि विज्ञापन एजेंसियों के व्यवसाय में प्रबंधन की चिंता अब 'ब्रांड' और 'पोजिंशनिंग' न होकर मुनाफा और लागत प्रबंधन तक सीमित रह गई।

विज्ञापन कारोबार में अगला विकास यह हुआ कि विज्ञापन संबंधी सभी सेवाएं एक साथ देने वाली एजेंसी का वजूद खत्म होने लगा। उसकी जगह ग्राहकों ने रचनात्मक सेवा, मीडिया सेवा एवं जन संचार सेवा जैसे कार्यों के लिए अलग-अलग सेवा-प्रदाताओं से अनुबंध करना शुरू कर दिया।

इंटरनेट मीडिया कंपनियों के आविर्भाव ने एक और दबाव डाला है। इंटरनेट सर्च इंजन, सोशल नेटवर्किंग साइट और एग्रीगेटर सेवा प्रदाता विज्ञापन संबंधी गतिविधियों के ऊध्र्वाधर समेकन की कोशिश कर रहे हैं। ये मीडिया एजेंसियों द्वारा अंजाम दी जाने वाली नियोजन एवं खरीद गतिविधियों को भी अपने हाथ में लेना चाहते हैं जिससे पारंपरिक विज्ञापन एजेंसियों एवं प्रकाशकों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो जाएगी। द न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार जैसे प्रकाशकों ने अब पूर्णकालिक विभाग बना दिए हैं जो विज्ञापन बनाने के साथ ही अन्य सेवाएं भी मुहैया कराते हैं। इस तरह उसके यहां विज्ञापन एजेंसियों की भूमिका ही खत्म हो गई है।

यह भी संभव है कि मार्केटिंग सेवाओं की दुनिया मध्यस्थहीनता के एक और दौर से गुजर रही है। इंटरनेट कई दूसरे उद्योगों में भी इस तरह की स्थिति पैदा कर चुका है। ट्रैवल एजेंसियों की जगह ट्रैवल साइट ने ले ली है, भर्ती एजेंसियों की जगह रोजगार सर्च साइट ने ले ली है और शेयर दलालों की जगह ऑनलाइन ट्रेडिंग साइट ले चुकी हैं। 

इसके अलावा संचार के अन्य माध्यमों के दर्शकों का मोबाइल फोन की तरफ तीव्र झुकाव भी देखने को मिला है। आखिर हम सभी अपने मोबाइल फोन को दिन के कई घंटे निहारते रहते हैं।

इसके अलावा भी विज्ञापन एवं समूचे मीडिया जगत के समक्ष कई और चुनौतियां आ सकती हैं। वह चुनौती सच को परोसने के ट्रूथ एवं पोस्ट-ट्रूथ ढांचे में संलिप्तता से जुड़ी हुई है। मान लीजिए, अगर अमिताभ बच्चन टीवी या प्रिंट के विज्ञापन में किसी ऑटो ब्रांड का प्रचार करते हुए दिखते हैं तो उससे जुड़ा उत्तर सत्य (पोस्ट-ट्रूथ) इस स्तर का भी सवाल खड़ा कर सकता है कि अमिताभ बच्चन ने वह वाहन खरीदने की सलाह देने के पहले क्या वाकई में उसे अपने पैसे से खरीदा, चलाया और उसकी खासियत एवं गुणवत्ता से रूबरू हुए? अगर इस तरह का परीक्षण किया जाता है तो फिल्मी सितारों की तरह क्रिकेट एवं खेल जगत के सितारों की संपन्नता का स्रोत भी रातोरात विलुप्त हो जाएगा। क्या यह संभव है कि विज्ञापन एजेंसियों को छोड़कर मीडिया के बाकी सभी माध्यमों की पुनर्खोज की प्रक्रिया चल रही है?

(लेखक द वेव राइडर, ए क्रॉनिकल ऑफ द इन्फॉर्मेशन एज पुस्तक के लेखक हैं)
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