बिजनेस स्टैंडर्ड - झारखंड की कपड़ा नीति सबसे अच्छी
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झारखंड की कपड़ा नीति सबसे अच्छी

शिखा शालिनी /  10 23, 2018

बीएस बातचीत

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का कहना है कि केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की वजह से राज्य में विकास की गति भी तेज हुई है जो कई सालों से राजनीतिक अस्थिरता का दंश झेलता रहा है। शिखा शालिनी के साथ हुई बातचीत के मुख्य अंश:

खनिज संपन्न होने के बावजूद निवेश के अनुकूल राज्यों में झारखंड क्यों शामिल नहीं है?

बिजनेस स्टैंडर्ड झारखंड की कपड़ा नीति सबसे अच्छीइसकी एक प्रमुख वजह राज्य की 14 साल तक की राजनीतिक अस्थिरता भी है। राज्य में 14 साल में 9 मुख्यमंत्री हो गए। आप यह मान सकती हैं कि 2014 से ही झारखंड अलग हुआ और यहां स्थिरता आई जब भाजपा की सरकार बनी।  राजनीतिक स्थिरता के बगैर विकास की बात करना बेमानी है। झारखंड में 2017 में एक वैश्विक निवेशक सम्मेलन का आयोजन कराया गया जिसमें बड़ी तादाद में समझौता ज्ञापनों (एएमयू) पर मुहर लगी। इन परियोजनाओं को पूरा होने में अभी दो-तीन साल लगेंगे। दूसरी वजह यह है कि झारखंड में इस्पात, तांबा और अन्य खनिज संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खनिजों का मूल्य दर कम हुआ है। राज्य में बुनियादी ढांचे से जुड़ी 490 अरब रुपये की योजना चल रही हैं। बिजली क्षेत्र में भी 200 अरब रुपये का काम चल रहा है। राज्य में शिक्षा-स्वास्थ्य में अच्छा निवेश हुआ है। देवघर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान खुलने जा रहा है। विकास के असंतुलन का अंदाजा आप इस बात से लगा सकती हैं कि 67 सालों में तीन मेडिकल कॉलेज बने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में पांच मेडिकल कॉलेज खुलने जा रहे हैं।  

कौन सी बड़ी कंपनियां झारखंड में निवेश कर रही हैं? अब तक कुल कितना निवेश हुआ है?

बड़ी कंपनियों का तो अपना महत्त्व है लेकिन मेरा ध्यान रोजगार आधारित मध्यम और लघु उद्योग पर हैं। जैसे वस्त्र उद्योग में एक करोड़ की पूंजी में 70 लोगों को रोजगार मिल जाता है। देश में सबसे अच्छी कपड़ा नीति झारखंड की है और इस क्षेत्र की नामी-गिरामी कंपनियां राज्य में काम कर रही हैं। इसी तरह 89 खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों में काम चल रहा है। नवंबर में रांची में शुरू हो रहे टेक्सटाइल पार्क में 4,000 नौकरियों के मौके तैयार होंगे। एनटीपीसी का पतरातु में ताप बिजली संयंत्र बन रहा है। अदाणी बिजली संयंत्र में 150 अरब रुपये का निवेश कर रही है।

राज्य में प्रति व्यक्ति आय कम होना क्या बड़ा संकट नहीं है?

स्वाभाविक रूप से यह कम है। लेकिन अगर आप वर्ष 2000 के प्रति व्यक्ति आय से तुलना करेंगी तो आपको अंदाजा होगा कि इसमें सुधार हुआ है। मैं सहमत हूं कि पहाड़ी क्षेत्र के जनजाति आदिवासी समाज की प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी नहीं हुई है जिस पर अब हम ध्यान दे रहे हैं।

आप राज्य के पहले गैर-आदिवासी समुदाय के मुख्यमंत्री हैं और ऐसे में क्या आपको लेकर इस वर्ग में असंतोष है?

आदिवासी वर्ग में मेरे गैर-आदिवासी होने के कारण कोई असंतुष्टि नहीं है। हमारा लक्ष्य सबका विकास करना है चाहे वह आदिवासी, गैर आदिवासी या मुसलमान हो। हमारे प्रधानमंत्री ने भी 'सबका साथ, सबका विकास' का मंत्र दिया है जिसका अक्षरश: पालन झारखंड में हो रहा है।

'पत्थलगड़ी आंदोलन' को क्या आप आदिवासी वर्ग की असंतुष्टि के रूप में नहीं देखते?

कुछ राज्य और विकास विरोधी शक्तियों ने इसे शुरू किया जो विकास के कामों में अवरोध ला रहे थे। इसमें ईसाई मिशनरी की बड़ी भूमिका थी जो स्कूल और अस्पताल के नाम पर जमीन का धंधा कर रहे हैं। अब यह सब खत्म हो गया है। देश के संविधान ने धर्म का प्रचार करने का अधिकार देश में दिया है लेकिन लालच देकर धर्मांतरण करना ठीक नहीं। झारखंड में हमने धर्मांतरण कानून की पहल की ताकि कोई लालच देकर धर्मांतरण न कराये। इस कानून में चार साल की सजा और एक लाख रुपये जुर्माना प्रावधान है। इससे भी उनकी बौखलाहट बढ़ी है।

राज्य में जनजातीय किरायेदारी कानून को लेकर आदिवासी वर्ग सहित आपके दल के नेताओं में नाराजगी क्यों बनी और इसमें सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन की शर्त को भी हटा दिया गया?

राज्य में दो किरायेदारी कानून चलते हैं, छोटा नागपुर किरायेदारी कानून (सीएनटी) और संथाल परगना किरायेदारी कानून (एसपीटी)। हमने विधानसभा में दोनों कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव रखा जिस पर कुछ विधायकों ने एतराज जताया तब इन प्रस्तावों को वापस ले लिया गया। इसके बाद राज्य में भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया और यह सीएनटी कानून में बदलाव नहीं था। इस संशोधन में यह प्रावधान किया गया कि सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन सरकारी योजनाओं के लिए जरूरी नहीं होगा, मसलन स्वास्थ्य, शिक्षा, आंगनबाड़ी, सड़क और ट्रांसमिशन लाइनें। हमने कहा कि सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन के बजाय ग्राम सभा के जरिये योजनाओं को मंजूरी दी जाए ताकि समय की बचत हो। लेकिन कुछ लोगों ने राजनीतिक फायदे के लिए आदिवासियों को भरमाने का काम किया। हमारा प्रस्ताव था कि सकारात्मक सामाजिक प्रभाव वाली योजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन की जरूरत नहीं है। लेकिन सभी निजी क्षेत्र योजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से जुड़ा 2013 का कानून ही लागू होगा। 

सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं को आधार से जोड़े जाने के बाद भुगतान और सेवाओं का लाभ न मिलने की काफी शिकायतें मिलीं, इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? 

प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के लागू होने से बिचौलिये और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा। 12.5 लाख फर्जी राशनकार्ड का पता लगा जिन पर रोक से 450 करोड़ रुपये की बचत हुई। मैं स्वीकार करता हूं कि कुछ जगहों पर आधार न होने से कुछ घटनाएं हुईं जिसकी हमने जांच की और पीडीएस दुकानदार को निलंबित कर दिया। अगर आप कोई व्यवस्था बदलती हैं जिससे किसी मंत्री, सचिव या नीचे के अधिकारी को लाभ हो रहा हो तो वह उस व्यवस्था को असफल करना चाहेगा। 

वर्ष 2017-18 में करीब 3 लाख पेंशनरों को फर्जी बताकर उन्हें हटाने की खबरें भी आईं...

सामाजिक सुरक्षा सुरक्षा योजना में करीब 86,000 पेंशनर वैध नहीं थे। जिनकी मौत हो गई उनका भी खाता चल रहा था। हमने ऐसे लोगों से पेंशन कार्ड वापस करने की गुजारिश भी की है और अब तक 22,000 कार्ड वापस किए गए हैं।

यशवंत सिन्हा की नाराजगी का झारखंड के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में उनका कोई असर दिख सकता है।

कोई असर नहीं पड़ेगा। झारखंड की जनता या देश की जनता पार्टी और पार्टी नेतृत्व को वोट देती है। 

क्या राज्य में उपचुनावों का असर लोकसभा चुनावों पर पड़ेगा और 2014 का प्रदर्शन दोहराया जा सकेगा?

उपचुनावों में उम्मीदवार का प्रभाव होता है और उससे देश या राज्य की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ सकता है। पिछली बार दो लोकसभा सीट 2014 में नहीं मिली थी, वे भी इस बार भाजपा के खाते में आएंगी क्योंकि अब आदिवासी सजग हो गए हैं। नौजवान विकास और रोजगार चाहते हैं और वे देख रहे हैं कि मोदी जी इस दिशा में प्रयासरत हैं। कांग्रेस देश तोडऩे वाली पार्टी है और यह देश की एकता एवं अखंडता को अपने स्वार्थ के लिए बरबाद करने में लगी है। देश के मतदाता अब सजग हैं।

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