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राज्यों की कृषि प्रसार एजेंसियों का करना होगा कायाकल्प

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  October 23, 2018

कृषि के प्रसार में इन दिनों आमूलचूल बदलाव देखा जा रहा है। इससे कृषि प्रसार को खेती के विकास में सबसे कमजोर कड़ी के तमगे से निजात पाने में मदद मिलेगी और यह कृषि विकास का वाहक बनकर उभर पाएगा। विरोधाभास है कि राज्यों में कृषि प्रसार सेवाओं में ऐसा कायांतरण नहीं हो पा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्रों के मामले में हमें ऐसा ही देखने को मिला है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की मदद एवं मार्गदर्शन में चलने वाले कृषि अनुसंधान संस्थान इन कृषि विज्ञान केंद्रों का संचालन करते हैं। राज्यों की कृषि प्रसार सेवाएं अब भी काफी हद तक डांवाडोल ही हैं। कृषि प्रसार के लिए तैनात कर्मचारी न केवल संख्या में कम हैं बल्कि उनके पास कृषि विकास के लिए जरूरी अद्यतन तकनीकी ज्ञान एवं दक्षता का भी अभाव है। लेकिन देश भर में चल रहे करीब 700 कृषि विज्ञान केंद्रों में से अधिकांश केंद्र नए आयाम जोड़कर प्रसार कार्यों को नई पहचान दे रहे हैं।

 
आईसीएआर के उप महानिदेशक और कृषि प्रसार एवं कृषि विज्ञान केंद्रों के प्रभारी ए के सिंह कहते हैं कि आधुनिक संदर्भ में प्रसार की अवधारणा तकनीक के हस्तांतरण से कहीं आगे जाती है। यह कृषि के तौर-तरीकों में तकनीक के समावेश को शामिल किए हुए है। इस लिहाज से प्रसार कार्यकर्ताओं में तमाम कौशल होने चाहिए ताकि वे किसानों को आर्थिक फायदा दिला सकने वाले नए तरीकों के इस्तेमाल के बारे में बता सकें। उनकी क्षमता और ज्ञान का आधार भी इतना व्यापक होना चाहिए कि वे एक साथ कई कामों को अंजाम दे सकें।
 
कृषि विज्ञान केंद्र कई तरह के काम करते हैं जिनमें स्थानीय परिस्थितियों के लिहाज से तकनीकों की प्रासंगिकता का आकलन और जरूरी होने पर उनमें वांछित बदलाव करना मूलभूत कार्य है। वे नई तकनीकों के प्रदर्शन के अलावा किसानों और प्रसार कार्यकर्ताओं को उनके इस्तेमाल का प्रशिक्षण भी देते हैं। इसके अलावा ये केंद्र कृषि विशेषज्ञता से संबंधित परियोजनाएं बनाने और उनके क्रियान्वयन के अलावा कृषि उत्पादों के मूल्य संवद्र्धन में कृषि उद्यमियों की मदद भी करते हैं। ये केंद्र उन्नत किस्म की फसलों के बीजों और पौधों का उत्पादन भी करते हैं जिन्हें किसानों को बांटा जाता है। एक कदम आगे बढ़कर ये केंद्र जिला स्तर की कृषि विकास योजनाएं बनाने में मदद भी करते हैं। इस तरह वे जिलों के लिए कृषि ज्ञान एवं संसाधनों के आभासी केंद्र के तौर पर भी काम करते हैं।
 
हाल ही में कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिये कुछ अनोखे एवं जरूरत के आधार पर बने कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं ताकि कृषि के विकास को तीव्र किया जा सके और कृषि आय में बढ़ोतरी भी हो। इसके अलावा इन कार्यक्रमों से पोषण स्तर सुधारने, महिला सशक्तीकरण और संबंधित क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक स्वरूप के सुधार का लक्ष्य भी रखा गया है। इन कृषि प्रोत्साहन योजनाओं में 'क्षमता', 'वाटिका' और 'नारी' सबसे अहम हैं। 'क्षमता' योजना के माध्यम से देश के आदिवासी बहुल 125 जिलों में लोगों की आर्थिक स्थिति एवं पोषण स्तर को सुधारने का लक्ष्य रखा गया है। इस उद्देश्य को परंपरागत कृषि साधनों को आधुनिक बनाकर हासिल करने की बात कही गई है। दूसरी तरफ 'वाटिका' योजना में कृषि उपज के मूल्य संवद्र्धन में युवाओं की मदद लेने और तकनीक-आधारित आर्थिक उद्यमों की स्थापना का जिक्र है। कृषि विज्ञान केंद्र इन योजनाओं को सफल बनाने के लिए हरसंभव मदद दे रहे हैं। इसमें परियोजनाओं का खाका तैयार करने से लेकर उन्हें अनुसंधान एवं विकास कार्यों में भरपूर सहयोग देना भी शामिल है। 
 
जहां तक नए अभियान 'नारी' का सवाल है तो पोषणयुक्त अनाजों, पोषण से भरी बागवानी और पोषक तत्त्वों से भरी फसलों को बढ़ावा देकर घरेलू पोषण स्तर को सुधारने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्यक्रम में महिलाओं को केंद्रीय स्थान दिया गया है क्योंकि परिवार को पोषक आहार देने में उनकी भूमिका बेहद अहम होती है। इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्रों को कृषि कल्याण अभियान के क्रियान्वयन के लिए मुख्य केंद्र भी बनाया गया है। इसके जरिये सरकार की तरफ से चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं के लाभ लक्षित किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। देश के 117 पिछड़े जिलों में छह लाख किसानों को महज डेढ़ महीने में ही इस कार्यक्रम में शामिल किया जा चुका है। किसानों को नए बीज एवं मृदा स्वास्थ्य कार्ड दिए जा रहे हैं और कृषि विज्ञान केंद्र कंपोस्ट खाद बनाने एवं मवेशियों को टीके लगाने में भी किसानों की मदद कर रहे हैं। गत 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर 25 अन्य पिछड़े जिलों को भी इस योजना के दायरे में लाया गया है। 
 
ऐसे में आश्चर्य नहीं है कि कृषि विज्ञान केंद्रों की प्रदर्शन रेटिंग करीब 90 फीसदी रही है। नीति आयोग की तरफ से दी गई इस रेटिंग में कृषि विज्ञान केंद्रों को अव्वल दर्जे की ए और बी श्रेणी में जगह मिली है। यह राज्य सरकारों को सबक सिखाता है कि कृषि विज्ञान केंद्रों की तर्ज पर कृषि प्रसार एजेंसियों का भी पुनर्गठन किया जा सकता है।
Keyword: agri, farmer, crop, monsoon,,
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