बिजनेस स्टैंडर्ड - जलवायु परिवर्तन को लेकर उचित कदम उठाने का वक्त
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जलवायु परिवर्तन को लेकर उचित कदम उठाने का वक्त

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  October 22, 2018

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) में ऐसे वैज्ञानिक शामिल हैं जिन्हें किसी भी दृष्टि से कट्टर या सामाजिक कार्यकर्ता नहीं कहा जा सकता। ये पारंपरिक वैज्ञानिक हैं जो पारंपरिक शोध संस्थानों में काम करते हैं। इनमें से अधिकांश समृद्ध देशों से आते हैं। ऐसे में अगर वे चेतावनी जारी करते हैं कि वैश्विक तापवृद्धि के प्राक्औद्योगिक युग के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने के हम पर भयावह परिणाम हो सकते हैं तो हमें इसे गंभीरता से लेना होगा। आईपीसीसी का कहना है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस वृद्धि से जुड़ी उसकी हालिया रिपोर्ट में शायद खतरों को कम करके आंका गया है। ऐसे में वैज्ञानिक कहते हैं कि रिपोर्ट में उन तमाम घटनाओं को शामिल नहीं किया गया है जो तापवृद्धि के कारण हमारे सामने आ सकती हैं। लब्बोलुआब यह कि खबर अच्छी नहीं है। अब वक्त आ गया है कि इसे समझकर जलवायु परिवर्तन के विज्ञान पर प्रश्न करना बंद कर दिया जाए।

 
आईपीसीसी ने अपने पिछले निष्कर्षों को संशोधित किया है। अब उसका कहना है कि वैश्विक तापवृद्धि का असर 1.5 डिग्री की बढ़ोतरी के पहले लगाए गए अनुमान की तुलना में कहीं अधिक होगा। इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है। तापमान में महज 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ ही गरीब विश्व को कई त्रासद प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है। याद रहे कि ऐसा तब है जबकि दुनिया भर में ऊर्जा खपत और उत्सर्जन में भारी असमानता है। असली चुनौती है इसे कम करना और गरीब देशों में ऊर्जा के उपयोग में इजाफा करना। 
 
आईपीसीसी के मुताबिक दुनिया में कार्बन डाई ऑक्साइड का शेष बजट (यानी 1.5 डिग्री सेल्सियस की तापवृद्धि के नीचे रहने के लिए कितनी कार्बन डाई ऑक्साइड व्यय की जा सकती है) करीब 420 गीगाटन से 580 गीगाटन के बीच है। मौजूदा उत्सर्जन दर से देखें तो यह 2030 में समाप्त हो जाएगा। याद रहे कि अगर दुनिया को 1.5 डिग्री सेल्सियस के दायरे के नीचे रहना है तो उसे उत्सर्जन को नकारात्मक करना होगा। ऐसे में विकासशील देशों का क्या होगा? उन लाखों लोगों की विकास संबंधी आवश्यकताओं का क्या होगा जिनकी ऊर्जा तक पहुंच नहीं रही और जिनको आज भी वृद्धि की जरूरत है। 
 
क्या इसका अर्थ यह हुआ कि दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर समता की बात बंद कर देनी चाहिए? अमेरिका लंबे समय से यही चाह रहा है। अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इसे और आगे ले गए हैं। भारत जैसे देश जो विकास का अधिकार चाहते हैं उन्हें ट्रंप समस्या मानते हैं। अमेरिका को प्रदूषण फैलाने का अधिकार जन्मसिद्ध अधिकार के रूप में मिलना चाहिए। वह यह सारी बात निर्ममता से कहते हैं।  जैसा कि आईपीसीसी की 1.5 डिग्री सेल्सियस वाली रिपोर्ट में भी कहा गया है, भारत जैसे देश जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाली श्रेणी में हैं। यह वक्त अब ऐसी बातों का नहीं है कि किसने समस्या खड़ी की और किसे इसे हल करना चाहिए? वह समय बीत चुका। कार्बन बजट को लेकर रोना रोने में भी कुछ नहीं रखा है। दुनिया के तमाम देशों ने उत्सर्जन करके उसे बेमानी कर दिया है। ऐसे में समता की बात करने का क्या अर्थ है? तथ्य यही है कि हमें समता को बदले हुए परिदृश्य में क्रियाशील करना होगा। इसके लिए जरूरत इस बात की है कि भारत समेत सभी देश मिलकर काम करें। परंतु इसके लिए यह भी आवश्यक है कि विकसित देश सहायता करें और ऊर्जा के मामले में कमजोर देशों को उत्सर्जन बढ़ाने के लिए आवश्यक वित्तीय और तकनीकी सहयोग मुहैया कराएं। संभव हो तो इसे अलग ढंग से अंजाम दिया जाए जहां कार्बन उत्सर्जन कम हो। अब इतना समय नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के पीडि़तों पर अंगुली उठाई जाए, भारत जैसे देशों की विकास करने की गुंजाइश की मांग पर सवाल उठाए जाएं। 
 
उत्सर्जन कम करने और वृद्धि मुहैया कराने के लिए संयुक्त रूप से राह निकालने के लिए वैश्विक नेतृत्व और चतुराई की आवश्यकता होगी। जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में न्याय से इनकार हमें कहीं नहीं ले जाएगा। प्रश्न यह है कि एक सुखद भविष्य का निर्माण कैसे होगा? सबसे पहली बात कि सन 2050 तक दुनिया की कुल बिजली में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 70 से 85 फीसदी होनी चाहिए। फिलहाल नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है। इसका भी अधिकांश हिस्सा जलविद्युत संयंत्रों से आता है। चुनौती बहुत बड़ी है। यह बदलाव कैसे आएगा? प्राकृतिक गैस के मिश्रण की हिस्सेदारी करीब 8 फीसदी है लेकिन इसमें भी कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (सीसीएस) शामिल होना जरूरी है। सन 2050 तक कोयले का इस्तेमाल शून्य करना होगा। इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं है क्योंकि दुनिया अभी भी बिजली उत्पादन के लिए ज्यादातर कोयले पर ही निर्भर है। क्या अमीर, क्या गरीब हर देश में यही हाल है। जरूरत यह है कि विकासशील विश्व के देश भी अपनी आबादी को बड़े पैमाने पर सस्ती बिजली मुहैया कराएं। वे कोयले का स्थानापन्न तलाशते हुए ऊर्जा सुरक्षा कैसे हासिल कर सकते हैं? यह एक बड़ा सवाल है। परंतु इसके साथ ही एक सवाल यह भी है कि विकसित देश अपनी बिजली को पूरी तरह कार्बन रहित कैसे करेंगे? वह भी टं्रप जैसे शासक के शासनकाल में? असली चुनौती महत्त्वाकांक्षा और उठाए जाने वाले कदमों में समानता की है। यानी जलवायु न्याय को ध्यान में रखते हुए उत्सर्जन में नाटकीय कमी। हमें इस पर निगाह रखनी होगी और तत्काल कदम उठाना होगा। टालमटोल का वक्त बीत चुका है।
Keyword: environment, world, india, IPCC, pollution, green house gas,,
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