बिजनेस स्टैंडर्ड - संकटग्रस्त परिसंपत्ति और कर्जदार की मनोस्थिति
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संकटग्रस्त परिसंपत्ति और कर्जदार की मनोस्थिति

अजय शाह /  October 22, 2018

जब कोई फर्म दबाव में होती है तो सवाल यह उठता है कि उसका ऋणशोधन हो सकता है या वह अनकदीकृत रहेगी। इस जटिल विषय पर विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
इस आलेख में हम एक ऐसी फर्म की दृष्टि से चीजों को परखेंगे जो ऋण के निपटान में मुश्किलों का सामना कर रही है। एक कमजोर वित्तीय तंत्र के साथ नकदीकरण का दबाव काफी हद तक दिवालियापन की स्थिति ला सकता है।  जब भी कोई फर्म दबाव में होती है तो सबसे मूल प्रश्न यही होता है कि वह अनकदीकृत रहेगी या उसका ऋणशोधन संभव है। अनकदीकृत फर्म वह होती है जिसे भुगतान करना हो लेकिन उसके पास इसके लिए जरूरी नकदी न हो। ऐसा तब हो सकता है जबकि फर्म के पास अच्छी परिसंपत्तियां हों लेकिन उनका नकदीकरण न हो रहा हो। ऋणशोधन वाली फर्म वे हैं जो तमाम परिसंपत्तियों के धीमे और सावधानीपूर्वक नकदीकृत किए जाने के बावजूद अपनी देनदारियों को नहीं निपटा सकें। 
 
जब किसी फर्म पर बहुत अधिक कर्ज हो जाता है और उस पर भी अगर वह कर्ज अल्पावधि का हो तथा पुरानी उधारी की परिपक्वता अवधि करीब हो तो फर्म को हर वक्त अपने भुगतान निपटाने के लिए नकदी की आवश्यकता होती है। पुनर्वित्तीकरण की यह प्रक्रिया तब तक सुगमता से शुरू रह सकती है जबकि ऋणदाताओं को फर्म में भरोसा हो। ऑक्सीजन आपूर्ति ऋणदाताओं के हाथ में है। हर महीने या शायद हर सप्ताह फर्म को ऋणदाताओं के पास जाकर उन्हें आश्वस्त करना होता है कि वे उसे दोबारा ऋण दें। उन्हें खुश रखना उसके लिए अपने ग्राहकों को खुश रखने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है।
 
किसी वजह से अगर इन फर्म में आने वाला नया ऋण रुकता है या बाधित होता है तो इससे उस फर्म के लिए संकट उत्पन्न होता है। संकट से गुजर रही कंपनी के आकलन के वक्त इस बात को ध्यान में रखना आवश्यक है। ऋण अनुबंध के मूल में ही एक सूचनागत विसंगति होती है। ऋणदाता को पता नहीं होता कि कर्ज लेने वाले की स्थिति कैसी है। क्रेडिट रेटिंग इस मामले में कोई खास सहायता नहीं कर पातीं। इससे बाजार के मन में एक किस्म की आशंका उत्पन्न होती है। एकमात्र संकेत केवल उचित बाजार मूल्य का अनुमान ही है: अगर परिसंपत्ति को कल बाजार में बेचा जाए तो हमें क्या मूल्य मिलेगा? यहां पुराने तौर तरीके काम नहीं आएंगे। 
 
अगर कंपनी ऋणशोधन के लिए जाने वाली होगी तो शेयरधारक अपना पैसा और अधिक बरबाद नहीं करेंगे। ऋणदाता उस स्थिति में अतिरिक्त पूंजी की आपूर्ति करने में अधिक सहज महसूस करेंगे जबकि 10 या 20 फीसदी की राशि नई शेयर पूंजी के रूप में आई हो। गौरतलब है कि अगर कोई फर्म नकदीकरण के संकट से गुजर रही हो और अंशधारक उसमें नई शेयर पूंजी नहीं ला पाएं तो ऋणदाताओं के मन में आशंका मजबूत हो जाती है। बाजार की सामान्य प्रक्रिया की बात करें तो बड़ी आवश्यकता उच्च ब्याज दर को आमंत्रित करती है। चूंकि हमारे यहां सक्रिय बॉन्ड बाजार नहीं है इसलिए यह व्यवस्था काम भी नहीं करती। देश में उच्च ब्याज दर को लेकर भारी असहजता का माहौल है क्योंकि उससे निराशा के संकेत निकलते हैं। अगर कोई फर्म अप्रत्याशित रूप से ऊंची दर पर ऋण लेती है तो यह अच्छा संकेत नहीं है। कर्जदारों को तो नकदी की सख्त आवश्यकता होती है। वह अगर सामान्य दरों पर उपलब्ध नहीं होती तो वे उच्च ब्याज दर पर कर्ज लेते हैं लेकिन यह गलत नजीर पेश करता है। 
 
शेयर कीमतें एक मूल्यवान संकेत हैं। अगर घबराहट का माहौल बनता है या व्यापक गिरावट आती है तो सभी शेयरों की कीमतें लडख़ड़ाती हैं। हम इस समय जिन हालात से गुजर रहे हैं उसे दबाव की परीक्षा की घड़ी माना जाता है और इसमें शेयर बाजार का प्रदर्शन अंतर वाला है। कुछ कंपनियों के शेयरों की कीमत में भारी गिरावट आ रही है जबकि कुछ अन्य में धीमी गिरावट देखने को मिल रही है। हर रोज बाजार में काम करने वाले सटोरिये हर फर्म की कठिनाइयों का आकलन कर रहे हैं और अपना पैसा लगा रहे हैं। उन्हीं कंपनियों को ऋण मिलेगा जिन्होंने स्टॉक मार्केट की परीक्षा पास की होगी। 
 
मौजूदा ऋणदाता को यही विकल्प दिया जाता है कि या तो मुझे दोबारा कर्ज दो या फिर मैं देनदारी में चूक कर जाऊंगा। ऋण लेने वाले भी विचित्र स्थिति में होते हैं जहां एक ओर वे ऋण की मांग कर रहे होते हैं तो दूसरी ओर डिफॉल्ट करने की धमकी भी दे रहे होते हैं। अगर दोबारा पैसे देने पर सहमति बन जाती है तो इससे समस्या कुछ समय के लिए टल जाती है। अक्सर ऐसा निर्णय लेने वाले की सेवानिवृत्ति तक। देश का ऋण क्षेत्र अब जांच एजेंसियों की निगरानी में है। समिति के सदस्य भविष्य में ऐसे सवाल सामने आने से डर रहे हैं कि उन्होंने अमुक ऋण क्यों दिया जबकि समाचारपत्र और शेयर बाजार को मालूम था कि फर्म की हालत ठीक नहीं। 
 
अगला कदम है अपनी परिसंपत्तियां बेचकर ऋण चुकाना। हर कोई जानता है कि यह बिक्री मुसीबत में की जा रही है। यानी अच्छी संपत्ति कमजोर मूल्य पर बिकेगी। बिक्री पूरी होने के बाद विक्रेता के पास कम शेयर पूंजी होगी और ऋण की गुणवत्ता भी कमजोर होगी। इसके अलावा अच्छी परिसंपत्ति की सस्ती बिकवाली की खबर तेजी से फैलती है और नकारात्मक माहौल बनाती है। ऐसा लेनदेन अनकदीकृत विके्रता को ऋणशोधन की ओर अग्रसर करता है। ये सारी बातें बाजार नकदीकरण में समस्या बनकर उभरती हैं। 
 
गहराई भरे और नकदीकृत वित्तीय बाजार मूल्यवान होते हैं। वे सार्वजनिक संपत्ति की तरह होते हैं जिसे बनाने, संरक्षित करने या रखरखाव में किसी की रुचि नहीं होती। संकीर्ण निहित स्वार्थ बाजार की तरलता को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे नीतिगत कदम सामने आते हैं जो आम कारोबारियों को नुकसान पहुंचाते हैं।  देश के वित्तीय क्षेत्र में सुधार का डिजाइन 2007 से 2013 के बीच तैयार किया गया। मुद्रास्फीति को लक्ष्य बनाने, सेबी-एफएमसी के विलय और आईबीसी जैसे कुछ काम हो चुके हैं। बॉन्ड-मुद्रा डेरिवेटिव का गठजोड़ नहीं बना और सूक्ष्म नियमन में खामियां बनी रहीं। निस्तारण निगम, व्यवस्थित जोखिम डेटाबेस और व्यवस्थित जोखिम नियमन की व्यवस्था नहीं हो सकी। देश में आईबीसी की व्यवस्था फलफूल रही है जो गैर वित्तीय कंपनियों मसलन अचल संपत्ति या बुनियादी कंपनियों से निपट सकती है लेकिन वित्तीय कंपनियों से नहीं। सुधार के इस एजेंडे की खासियत हमें याद दिलाई जा रही है।
Keyword: firm, company, loan,,
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