बिजनेस स्टैंडर्ड - सरकारी बैंकों के कमजोर प्रदर्शन की संभावना
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सरकारी बैंकों के कमजोर प्रदर्शन की संभावना

श्रीपद ऑटे /  October 21, 2018

पिछली कई तिमाहियों के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद निवेशक अब यह मान रहे थे कि कर्ज के बोझ से दबे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के लिए बुरा समय बीत गया है। लेकिन ऐसा लगता है कि अभी उन्हें कुछ और समय इंतजार करना होगा। चूक में कुछ संभावित नरमी के बावजूद इन बैंकों के सितंबर तिमाही (इस वित्त वर्ष की दूसरी) में भी अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन करने की संभावना है। प्रावधान संबंधी दबाव और कोष की ज्यादा लागत की वजह से सितंबर तिमाही के आंकड़ों पर दबाव रह सकता है। इस तरह से कुल आय एक साल पहले की तुलना में दबाव में रहने की आशंका है और कई बैंक नुकसान दर्ज कर सकते हैं। हालांकि कुछ बैंक तिमाही आधार पर सुधार दर्ज कर सकते हैं। मोतीलाल ओसवाल सिक्योरिटीज के विश्लेषकों ने अपने आय अनुमान में कहा, 'सभी सरकारी बैंकों द्वारा कुल 300 करोड़ रुपये का मुनाफा दर्ज किए जाने की संभावना है। एक साल पहले सितंबर तिमाही के दौरान यह मुनाफा 2900 करोड़ रुपये था। बैंक ऑफ बड़ौदा (बीओबी) ऐसा एकमात्र सरकारी बैंक है जिसके कर बाद लाभ दर्ज करने की संभावना है।'

 
एमके ग्लोबल के विश्लेषकों का कहना है कि ताजा चूक की रफ्तार दूसरी तिमाही में धीमी रहने का अनुमान है, लेकिन कुल ऋण लागत (औसत ऋण बुक के प्रतिशत के तौर पर प्रावधान) ऊंचे स्तर पर बने रहने की आशंका है। हालांकि दिवालिया संकट से जूझ रही आईएलऐंडएफएस को दिए गए ऋण कुछ बैंकों के फंसे कर्ज में इजाफा कर सकते हैं, लेकिन पिछली दो तिमाहियों में फंसे कर्ज की पहचान में तेजी से मदद मिलने की संभावना है। फिर भी, फंसे कर्ज में तेजी से इजाफा हो रहा है जिससे बैंकों को प्रावधान के तौर पर अधिक रकम रखने की जरूरत है। विश्लेषकों का कहना है कि बैंकों को अपने बॉन्ड पोर्टफोलियो पर मार्क टु मार्केट नुकसान (एमटीएम यानी मौजूदा मूल्य पर कर्ज का फिर से मूल्यांकन) है जिसके कारण उनको प्रावधान बढ़ाना पड़ सकता है। इस तिमाही में नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) पहुंचे एनपीए के मामलों के समाधान की रफ्तार धीमी रही जबकि जून तिमाही में यह थोड़ी ठीक थी। हालांकि इसका मतलब यह होगा कि मझोले या छोटे कर्जदार खातों के लिए एनपीए समाधान पर अतिरिक्त प्रावधान कम ही करना पड़ेगा। 
 
सरकारी बैंकों पर बॉन्ड बाजार का दबाव बरकरार रहेगा, हालांकि जून तिमाही की तुलना में यह दबाव कम रहेगा। फिर भी, कुछ एमटीएम नुकसान दर्ज किया जा सकता है। इसके लिए बैंकों को अपने बॉण्ड कर्ज का फिर से मूल्यांकन करने की जरूरत होगी। ये बैंक सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सेक) में प्रमुख निवेशक हैं और आरबीआई के दिशा-निर्देशों के तहत उन्हें तिमाही आधार पर जी-सेक की बाजार वैल्यू में किसी भी तरह की गिरावट के लिए भरपाई या प्रावधान करने की जरूरत होगी। जी-सेक की वैल्यू बॉन्ड प्रतिफल से जुड़ी है। 10 वर्षीय बॉन्ड का प्रतिफल दूसरी तिमाही में 12 आधार अंक बढ़कर 8.02 प्रतिशत हो गया। इसके अलावा आरबीआई की अनुमति से एमटीएम नुकसान को अक्टूबर-दिसंबर 2017 की अवधि से चार तिमाहियों तक आगे ले जाने वाले कुछ बैंकों को अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है। 
 
शेयरखान के विश्लेषकों ने दूसरी तिमाही के पूर्वानुमान से संबंधित अपनी रिपोर्ट में कहा, 'सितंबर तिमाही के दौरान बॉन्ड प्रतिफल अस्थिर रहा है। खुदरा और कॉरपोरेट शुल्कों की रफ्तार भी धीमी बनी रहने की संभावना है जिससे सालाना आधार पर अन्य आय में कमजोरी बढ़ सकती है।' परिचालन की बात की जाए तो कई बैंकों द्वारा उधारी दर में वृद्घि के बावजूद सरकारी बैंकों को कोष की ऊंची लागत और धीमी ऋण वृद्घि की वजह से राजस्व पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि इस क्षेत्र में कुल ऋण सितंबर के अंत तक सालाना आधार पर 12.4 प्रतिशत बढ़ा। इसमें ज्यादा योगदान खुदरा क्षेत्र (लोगों के लिए ऋण) का रहने का अनुमान है। अगस्त तक यही रुझान देखने को मिला था। चूंकि कई सरकारी बैंकों का ऋण कंपनियों और थोक खातेदारों से जुड़ा है, इसलिए उनकी ऋण बुक क्षेत्र के औसत से नीचे रहने की संभावना है। अगस्त तक इस क्षेत्र को उधारी सालाना आधार पर महज 1.9 प्रतिशत बढ़ी।
 
प्रमुख सरकारी बैंकों में भारतीय स्टेट बैंक, बैंक आफ बड़ोदा, पंजाब नेशनल बैंक के दूसरी तिमाही के दौरान अग्रिमों में सालाना आधार पर 5 से 7 प्रतिशत की वृद्घि दर्ज करने की संभावना है। पंजाब नेशनल बैंक के लिए नुकसान तिमाही आधार पर घटने, जबकि लगातार तीन तिमाहियों तक नुकसान में रहने के बाद भारतीय स्टेट बैंक के मुनाफे की स्थिति में लौटने की संभावना है। हालांकि विश्लेषकों को बैंक आफ बड़ोदा द्वारा बढिय़ा मुनाफा वृद्घि दर्ज किए जाने की संभावना है। 
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